कोलकाता उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा दायर याचिका पर अंतिम सुनवाई 28 और 29 जनवरी को तय की, जिसमें 77 समुदायों के अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) वर्गीकरण को रद्द करने के कोलकाता उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई है। न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि वह 28 और 29 जनवरी को मामले की सुनवाई करेगी। पश्चिम बंगाल राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पीठ से अनुरोध किया कि वह अगले शैक्षणिक वर्ष की शुरुआत से पहले मामले का फैसला करे।
आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं
न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि मई में गर्मी की छुट्टियों के लिए अदालत बंद होने से पहले मामले का फैसला किया जाएगा। इससे पहले, शीर्ष अदालत ने कहा था कि आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं हो सकता। सर्वोच्च न्यायालय कलकत्ता उच्च न्यायालय के 22 मई, 2024 के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें पश्चिम बंगाल में 2010 से दी गई कई जातियों को ओबीसी का दर्जा रद्द कर दिया गया था। पिछले साल, सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल सरकार से ओबीसी सूची में शामिल की गई नई जातियों के सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में उनके अपर्याप्त प्रतिनिधित्व पर मात्रात्मक डेटा प्रदान करने के लिए कहा था।
2010 के बीच दिए गए 77 वर्गों का आरक्षण रद्द
कोर्ट ने सरकार से एक हलफनामा दायर करने के लिए भी कहा था, जिसमें 37 जातियों, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम समूह हैं, को ओबीसी सूची में शामिल करने से पहले उसके और राज्य के पिछड़े वर्ग पैनल द्वारा किए गए परामर्शों,का विवरण दिया गया हो। उच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में कई जातियों के ओबीसी दर्जे को रद्द कर दिया था और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों और राज्य द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों में उनके लिए आरक्षण को अवैध ठहराया था। फैसले में कहा गया, वास्तव में इन समुदायों को ओबीसी घोषित करने के लिए धर्म ही एकमात्र मानदंड रहा है। उच्च न्यायालय ने अप्रैल, 2010 और सितंबर, 2010 के बीच दिए गए 77 वर्गों के आरक्षण को रद्द कर दिया था।

पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा) (सेवाओं और पदों में रिक्तियों का आरक्षण) अधिनियम, 2012 के तहत ओबीसी के रूप में दिए गए 37 वर्गों को भी रद्द कर दिया। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा, मुसलमानों के 77 वर्गों को पिछड़ा वर्ग के रूप में चुनना पूरे मुस्लिम समुदाय का अपमान है। उच्च न्यायालय ने राज्य के 2012 के आरक्षण कानून और 2010 में दिए गए आरक्षण के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया था कि हटाए गए वर्गों के नागरिक, जो पहले से ही सेवा में थे या आरक्षण का लाभ उठा चुके थे या राज्य की किसी भी चयन प्रक्रिया में सफल हुए थे, उनकी सेवाएँ इस फैसले से प्रभावित नहीं होंगी।


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