नई दिल्ली, 14 मार्च (आईएएनएस)। देश के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए वर्ष 2025 का 60वां सम्मान प्रतिष्ठित तमिल कवि, गीतकार और लेखक आर. वैरामुथु को प्रदान किए जाने की घोषणा की गई है। यह घोषणा भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा की गई। तमिल साहित्य में उनके दीर्घकालीन और महत्वपूर्ण योगदान, रचनात्मकता तथा विशिष्ट काव्यात्मक अभिव्यक्ति को ध्यान में रखते हुए उन्हें इस प्रतिष्ठित सम्मान के लिए चुना गया है। यह निर्णय भारतीय ज्ञानपीठ की चयन समिति की बैठक में लिया गया।
चयन समिति की अध्यक्षता प्रसिद्ध लेखिका प्रतिभा राय ने की। समिति में अन्य प्रमुख साहित्यकार और विद्वान भी शामिल थे, जिनमें माधव कौशिक, दामोदर माउजो, डॉ. सुरंजन दास, डॉ. ए. कृष्णा राव, प्रफुल्ल शिलेदार, डॉ. केसुभाई देसाई, डॉ. जानकी प्रसाद शर्मा, डॉ. के. श्रीनिवास राव और ज्ञानपीठ के वरिष्ठ प्रकाशन अधिकारी डॉ. महेश्वर शामिल रहे। बैठक के दौरान दिवंगत साहित्यकारों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए दो मिनट का मौन भी रखा गया।
तमिल भाषा के सुप्रसिद्ध कवि और गीतकार आर. वैरामुथु का जन्म 13 जुलाई 1953 को तमिलनाडु में हुआ था। वे समकालीन तमिल साहित्य के प्रमुख रचनाकारों में गिने जाते हैं। उनकी कविताओं और रचनाओं में मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक सरोकारों और प्रकृति के प्रति गहरी संवेदनशीलता का प्रभावशाली चित्रण देखने को मिलता है। वैरामुथु ने कविता, गीत और गद्य- तीनों विधाओं में उल्लेखनीय योगदान दिया है। उनकी रचनाएं अपनी मौलिकता, भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक चेतना के कारण पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय रही हैं।
उन्होंने अब तक 37 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें कविता संग्रह, उपन्यास और अन्य साहित्यिक कृतियां शामिल हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में कल्लिकाडू इथिहासम, करुवाची काव्यम, तन्नी देसम और मौद्रम उलागा पोर (तीसरा विश्व युद्ध) जैसी चर्चित रचनाएं शामिल हैं। अपने लगभग चार दशक से अधिक लंबे साहित्यिक और रचनात्मक करियर में वैरामुथु को कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है। उन्हें सात बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ गीतकार) प्राप्त हो चुका है।
इसके अलावा, भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2003 में पद्म श्री और वर्ष 2014 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। वर्ष 2003 में उन्हें उनके प्रसिद्ध उपन्यास कल्लिकाडू इथिहासम के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्रदान किया गया था। तमिलनाडु सरकार ने भी उन्हें कला और साहित्य में योगदान के लिए ‘कलैमामणि’ सम्मान से सम्मानित किया है।
ज्ञानपीठ की प्रवर परिषद ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि तमिल एक समृद्ध और महत्वपूर्ण भारतीय भाषा है, लेकिन इसके बावजूद अब तक इस भाषा के केवल दो लेखकों—पी. वी. अखिलन (1975) और डी. जयकांतन (2002)—को ही ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। ऐसे में आर. वैरामुथु को दिया गया यह सम्मान तमिल साहित्य की समृद्ध परंपरा को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक प्रतिष्ठा दिलाने का कार्य करेगा।
बता दें कि ज्ञानपीठ पुरस्कार भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान माना जाता है, जो भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य सृजन करने वाले लेखकों को प्रदान किया जाता है। इस सम्मान के अंतर्गत 11 लाख रुपये की पुरस्कार राशि, वाग्देवी (सरस्वती) की कांस्य प्रतिमा तथा प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया जाता है।
–आईएएनएस
पीकेटी/डीकेपी
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