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Rajasthan के कारीगरों की कला को UAE के पहले हिंदू मंदिर में मिली जगह

Rajasthan: पिछले चार वर्षों से संगमरमर के टुकड़ों को तराशकर उन्हें स्तंभों के साथ ही भगवान राम एवं भगवान गणेश जैसे हिंदू देवताओं की मूर्तियों में तब्दील करने वाले राजस्थान के कारीगर अत्यंत गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं, क्योंकि उनकी कला को अबू धाबी के पहले हिंदू मंदिर में जगह मिली है। इस मंदिर का उद्घाटन 14 फरवरी को होने वाला है।

Highlights:

  • Rajasthan के कारीगरों की कला को यूएई के पहले हिंदू मंदिर में मिली जगह
  • ‘हम आजीविका के लिए पत्थरों को तराशने हैं’
  • ‘मैंने मंदिर के लिए 83 टुकड़ों पर काम किया’

 

‘हम आजीविका के लिए पत्थरों को तराशने हैं’

राजस्थान के मकराना के गांवों के कारीगरों ने भव्य मंदिर की कल्पना को साकार करने के लिए अपनी मूर्तिकला के साथ 2019 में एक रचनात्मक यात्रा शुरू की थी, जो कोविड-19 महामारी के दौरान भी जारी रही। राम किशन सिंह ने मकराना से ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ‘‘मैं तीसरी पीढ़ी का मूर्तिकार हूं और हम आजीविका के लिए पत्थरों को तराशने का काम करते हैं। मैं अबू धाबी में एक हिंदू मंदिर के विचार को लेकर बहुत उत्साहित था। भाईचारे और सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश देने के लिए इससे बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है?’’

‘मैंने मंदिर के लिए 83 टुकड़ों पर काम किया’

उन्होंने कहा, ‘‘मैंने मंदिर के लिए 83 टुकड़ों पर काम किया है।’’ मंदिर का निर्माण बीएपीएस स्वामीनारायण संस्था द्वारा दुबई-अबू धाबी शेख जायद राजमार्ग पर अल रहबा के पास अबू मुरीखा में 27 एकड़ की जगह पर किया जा रहा है। मंदिर के अग्रभाग पर बलुआ पत्थर की पृष्ठभूमि पर उत्कृष्ट संगमरमर की नक्काशी है, जिसे राजस्थान और गुजरात के कुशल कारीगरों द्वारा 25,000 से अधिक पत्थर के टुकड़ों से तैयार किया गया है। मंदिर के लिए बड़ी संख्या में गुलाबी बलुआ पत्थर उत्तरी राजस्थान से अबू धाबी ले जाये गए थे।

‘50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी टिके पत्थरों का चयन’

सोम सिंह ने कहा, ‘‘पचास डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी टिके रहने के लिए जाने जाने वाले इन पत्थरों का चयन, संयुक्त अरब अमीरात की जलवायु के लिए व्यावहारिक विचारों को दर्शाता है। भव्यता सुनिश्चित करने के लिए मंदिर के निर्माण में इतालवी संगमरमर का उपयोग किया गया है।’’ सोम सिंह राजस्थान के एक कारीगर हैं, जिन्होंने मंदिर के लिए मूर्तियां गढ़ीं और बाद में स्थल पर काम करने के लिए संयुक्त अरब अमीरात चले गए।

 

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