हिंदू समाज में एकता की जरूरत, भारत एक संस्कृति : मोहन भागवत

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भारत एक संस्कृति, भौगोलिक सीमा से परे : मोहन भागवत

पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले के साई ग्राउंड में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि हिंदू समाज में एकता की जरूरत है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित करना है। भारत किसी भौगोलिक सीमा से परिभाषित नहीं है। भारत एक संस्कृति है। भारत प्राचीन काल से इस संस्कृति को लेकर चल रहा है। विविधता में एकता इस संस्कृति की एक विशेषता है, जबकि पर्यावरण के साथ तालमेल बैठाना और पर्यावरण की रक्षा करना भारतीय संस्कृति की विशेषता है। जो लोग इस संस्कृति के साथ खुद का सामंजस्य नहीं बना पाए, वे भारत से अलग हो गए।

भागवत ने आगे कहा कि बाहरी ताकतों ने हम पर बार-बार हमला किया है। विविधता के बावजूद एकता भारत की ताकत है। हिंदू धर्म दुनिया की विविधता को स्वीकार करता है। सभी भारतीय समुदायों के लोग हिंदू हैं। हिंदू धर्म कोई भाषा, जाति या समूह नहीं है। हर समाज की अपनी समस्याएं हैं, हर देश की अपनी समस्याएं हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देश में 17 हजार से ज्यादा शाखाएं हैं, जो देश के लोगों को संगठित करने का काम कर रही हैं। संघ संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन बनाना चाहता है। संघ को समझना हो तो संघ में शामिल हो जाएं। यह दुनिया का सबसे बड़ा संगठन है।

उन्होंने आगे कहा कि भारत एक प्राचीन देश है। यह अंग्रेजों द्वारा बनाया गया देश नहीं है। अंग्रेजों के आने से पहले भी भारत एक देश था। हिंदू संस्कृति भारत में एक है, भले ही यहां लोग अलग-अलग भाषाएं बोलते हों। छोटी-मोटी समस्याएं आएंगी। यह देखना चाहिए कि हम समस्या से उबरने के लिए कितना तैयार हैं। उन्होंने आगे कहा कि इस देश के लिए जिम्मेदार समाज हिंदू समाज है। यह दुनिया की विविधता को स्वीकार करके आगे बढ़ता हैं। भारत की एक प्रकृति है और जिन्होंने सोचा कि वे उस प्रकृति के साथ नहीं रह सकते, उन्होंने अपना अलग देश बना लिया।

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