जमानत प्रणाली में बड़े सुधार की मांग! डॉ. अजय कुमार पांडेय ने मुख्य न्यायाधीश को भेजा प्रस्ताव, जानें क्या है पूरा मामला

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Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश की जेलों में बंद बड़ी संख्या में विचाराधीन कैदियों की स्थिति को लेकर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अजय कुमार पांडेय ने देश के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर जमानत व्यवस्था में सुधार की मांग की है। उन्होंने विशेष रूप से यह प्रस्ताव रखा है कि जब भी किसी आरोपी की जमानत याचिका खारिज हो, तो उसकी अनिवार्य रूप से उच्च स्तर पर समीक्षा होनी चाहिए। उनका कहना है कि मौजूदा व्यवस्था के कारण बड़ी संख्या में ऐसे लोग जेल में हैं, जिनका अपराध अभी सिद्ध भी नहीं हुआ है। Uttar Pradesh News: उत्तर…

Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश की जेलों में बंद बड़ी संख्या में विचाराधीन कैदियों की स्थिति को लेकर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अजय कुमार पांडेय ने देश के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर जमानत व्यवस्था में सुधार की मांग की है। उन्होंने विशेष रूप से यह प्रस्ताव रखा है कि जब भी किसी आरोपी की जमानत याचिका खारिज हो, तो उसकी अनिवार्य रूप से उच्च स्तर पर समीक्षा होनी चाहिए। उनका कहना है कि मौजूदा व्यवस्था के कारण बड़ी संख्या में ऐसे लोग जेल में हैं, जिनका अपराध अभी सिद्ध भी नहीं हुआ है।

Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश में विचाराधीन कैदियों की गंभीर स्थिति

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश की जेलों में बंद कैदियों में लगभग 72 प्रतिशत ऐसे हैं जिनका मुकदमा अभी चल रहा है। यानी वे दोषी साबित नहीं हुए हैं, फिर भी वर्षों से जेल में बंद हैं। लखनऊ, प्रयागराज (नैनी), आगरा और वाराणसी की केंद्रीय जेलें अपनी तय क्षमता से कहीं अधिक कैदियों को संभाल रही हैं।

कई मामलों में गैंगस्टर एक्ट, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA), रासुका और एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामलों में जमानत मिलना और भी कठिन हो जाता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी कई बार टिप्पणी की है कि निचली अदालतें जमानत देने से बचती हैं और मामले को उच्च न्यायालय पर छोड़ देती हैं। इससे उच्च अदालतों पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है।

न्यायपालिका में भय का माहौल

पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने सार्वजनिक मंच पर कहा था कि कई न्यायाधीशों को जमानत देने में डर लगता है। उन्हें आशंका रहती है कि उनके फैसले पर सवाल उठ सकते हैं। ऐसे में वे सुरक्षित रास्ता चुनते हुए जमानत याचिका खारिज कर देते हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि न्यायाधीशों को साहस के साथ निर्णय लेना चाहिए, जैसे एक चिड़िया अपने पंखों पर भरोसा करके डाल पर बैठती है। लेकिन व्यवहार में देखा गया कि जो न्यायाधीश संवैधानिक भावना के अनुसार जमानत देते हैं, उन्हें आलोचना या दबाव का सामना करना पड़ता है। डॉ. पांडेय का कहना है कि यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि इससे संविधान की भावना कमजोर होती है।

चौंकाने वाले आंकड़े

देशभर में लगभग 5.5 लाख विचाराधीन कैदी जेलों में बंद हैं, जो कुल कैदी संख्या का लगभग 76 प्रतिशत है। हर साल करीब 70,000 जमानत याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचती हैं। पूर्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ के कार्यकाल में लगभग 24,000 जमानत याचिकाओं का निस्तारण किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि इनमें से कई मामले निचली अदालतों में ही सुलझाए जा सकते थे। इन आंकड़ों से साफ है कि जमानत व्यवस्था में कहीं न कहीं गंभीर समस्या है।

सुधार के लिए पांच महत्वपूर्ण सुझाव

डॉ. पांडेय ने अपने पत्र में पांच ठोस प्रस्ताव रखे हैं:

जमानत अस्वीकृति की अनिवार्य समीक्षा

यदि किसी अदालत ने जमानत याचिका खारिज की है, तो उसका स्वतः वरिष्ठ न्यायाधीश द्वारा परीक्षण किया जाए।

त्रैमासिक निगरानी

उच्च न्यायालय नियमित रूप से जमानत अस्वीकृति के मामलों की समीक्षा करे और पैटर्न की जांच करे।

फास्ट-ट्रैक जमानत पीठ

लखनऊ, प्रयागराज, आगरा और वाराणसी जैसे शहरों में विशेष पीठ बनाई जाए, जहां 72 घंटे के भीतर प्राथमिक सुनवाई हो सके।

न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षा

जो न्यायाधीश संविधान के अनुरूप जमानत देते हैं, उन्हें संस्थागत सुरक्षा और समर्थन दिया जाए।

राष्ट्रीय स्तर की समिति

मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में एक निगरानी समिति गठित की जाए, जो पूरे देश में विचाराधीन कैदियों की स्थिति पर नजर रखे और सुधार के सुझाव दे।

सरकार और न्यायपालिका से अपील

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी न्यायपालिका से अपील कर चुके हैं कि विचाराधीन कैदियों के मामलों में तेजी लाई जाए। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी कई बार अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हवाला दिया है। इसके बावजूद, उत्तर प्रदेश में जमीनी हालात में बड़ा बदलाव नहीं दिख रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक जमानत व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं बढ़ेगी, तब तक यह संकट बना रहेगा। डॉ. पांडेय ने कहा है कि वे इस विषय पर आवश्यक डेटा उपलब्ध कराने, दिशा-निर्देश तैयार करने और किसी भी समिति के सामने अपनी बात रखने के लिए तैयार हैं। उनका उद्देश्य न्याय व्यवस्था को अधिक संवेदनशील और प्रभावी बनाना है, ताकि निर्दोष लोगों को अनावश्यक रूप से जेल में न रहना पड़े।

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Amit Kumar

अमित कुमार पिछले 3 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। उन्हें विदेश, बिजनेस, ऑटो, टेक और गैजेट्स से जुड़ी खबरें लिखने का अच्छा अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बैचलर ऑफ मास कम्युनिकेशन, आईआईएमसी से पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा और उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है। पत्रकारिता की शुरुआत उन्होंने वेबसाइट पर लिखने से की। इसके बाद इंडिया डेली न्यूज़ चैनल और न्यूज़ इंडिया 24x7 में हिंदी सब-एडिटर के तौर पर काम किया। वर्तमान में वह पंजाब केसरी, दिल्ली में हिंदी सब-एडिटर के पद पर कार्यरत हैं।