कैसे मिले जीवन में असली खुशी? ‘परम सुख’ पुस्तक में पढ़ें स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज के अनमोल वचन

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Vrindavan News: देश की पावन भूमि वृन्दावन धाम के प्रसिद्ध संत स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज एक बार फिर चर्चा में हैं। वे श्री राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त माने जाते हैं और उनके उपदेशों को देशभर में श्रद्धा से सुना जाता है। हाल ही में उनके जीवन और शिक्षाओं पर आधारित एक नई पुस्तक ‘परम सुख’ प्रकाशित हुई है, जिसने भक्तों और पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है। यह पुस्तक उस समय चर्चा में आई जब स्वामी जी के आश्रम श्री हित राधा केलि कुंज में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू उनसे मिलने पहुंचीं। इस विशेष मुलाकात…

Vrindavan News: देश की पावन भूमि वृन्दावन धाम के प्रसिद्ध संत स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज एक बार फिर चर्चा में हैं। वे श्री राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त माने जाते हैं और उनके उपदेशों को देशभर में श्रद्धा से सुना जाता है। हाल ही में उनके जीवन और शिक्षाओं पर आधारित एक नई पुस्तक ‘परम सुख’ प्रकाशित हुई है, जिसने भक्तों और पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है। यह पुस्तक उस समय चर्चा में आई जब स्वामी जी के आश्रम श्री हित राधा केलि कुंज में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू उनसे मिलने पहुंचीं। इस विशेष मुलाकात के अगले ही दिन इस पुस्तक का विमोचन हुआ, जिससे इसकी महत्ता और भी बढ़ गई।

Vrindavan News: पुस्तक के लेखक और विशेष योगदान

‘परम सुख’ पुस्तक के लेखक और संपादक राधेकृष्ण हैं, जिन्होंने स्वामी जी के जीवन को सरल और रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक के निर्माण में आईपीएस अधिकारी घनश्याम चौरसिया का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यह पुस्तक स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज के जीवन और उनके उपदेशों पर केंद्रित पहली विस्तृत रचना मानी जा रही है। पुस्तक का प्रकाशन ईकोक्रेजी कम्युनिकेशन्स द्वारा किया गया है, जबकि इसके वितरण और प्रचार की जिम्मेदारी सृजन प्रकाशन को सौंपी गई है।

पुस्तक की संरचना

  • यह पुस्तक दो भागों में विभाजित है।
  • पहले भाग में स्वामी जी के जन्म से लेकर उनके आध्यात्मिक जीवन तक की पूरी यात्रा का वर्णन किया गया है।
  • दूसरे भाग में उनके लगभग 400 उपदेशों को शामिल किया गया है, जो जीवन को सही दिशा देने का संदेश देते हैं।
  • कुल 320 पृष्ठों की इस पुस्तक में उनके जीवन के हर महत्वपूर्ण पहलू को विस्तार से बताया गया है।

प्रारंभिक जीवन और आध्यात्मिक झुकाव

स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज का जन्म कानपुर के एक साधारण धार्मिक परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम अनिरुद्ध कुमार पाण्डेय था। बचपन से ही उनका मन भगवान की भक्ति में लगता था। वे स्कूल और घर की तुलना में मंदिर में अधिक समय बिताते थे। वे मंदिर की साफ-सफाई करते, पूजा-पाठ में हिस्सा लेते और गांव में आने वाले साधु-संतों की सेवा करते थे। धीरे-धीरे उनके मन में वैराग्य की भावना मजबूत होती गई और उनका झुकाव पूरी तरह से आध्यात्मिक जीवन की ओर हो गया।

13 वर्ष की उम्र में घर त्याग

पुस्तक में बताया गया है कि जब वे मात्र 13 वर्ष के थे, तब उन्होंने एक बड़ा निर्णय लिया। वे बिना किसी को बताए घर छोड़कर भगवान की खोज में निकल पड़े। कुछ समय बाद उनके पिता शंभू पाण्डेय उनसे मिले और उन्हें घर वापस आने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने लौटने से मना कर दिया। तब उनके पिता ने उनसे तीन वचन लि—

  • वे केवल वही स्वीकार करेंगे जो कोई स्वेच्छा से देगा।
  • वे कभी किसी के घर में नहीं जाएंगे और न ही वहां ठहरेंगे।
  • संन्यास लेने के बाद वे फिर कभी गृहस्थ जीवन में नहीं लौटेंगे।
  • स्वामी जी आज तक इन तीनों वचनों का पालन कर रहे हैं।

काशी में तपस्या और साधना

घर छोड़ने के बाद वे काशी पहुंचे, जहां उन्होंने गंगा तट पर भगवान भोलेनाथ की कठोर साधना की। उनका जीवन पूरी तरह तप और भक्ति में समर्पित हो गया। काशी में उन्होंने लंबे समय तक साधना की और अपने आत्मिक लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते रहे।

वृन्दावन की ओर यात्रा

पुस्तक में यह भी बताया गया है कि कैसे महादेव के भक्त स्वामी जी रासलीला से प्रभावित होकर काशी से वृन्दावन पहुंचे। वहां पहुंचकर उनका जीवन पूरी तरह बदल गया। उन्होंने श्री राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व मान लिया और खुद को उनका दास घोषित कर दिया। इसके बाद उनका जीवन भक्ति, सेवा और उपदेशों के माध्यम से लोगों का मार्गदर्शन करने में बीतने लगा।

स्वामी जी के प्रमुख उपदेश

पुस्तक के दूसरे भाग में उनके लगभग 400 उपदेश दिए गए हैं, जो जीवन को बेहतर बनाने का मार्ग दिखाते हैं। उनका पहला उपदेश यह है कि मनुष्य जीवन बहुत दुर्लभ है और इसे व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। उनका मानना है कि जीवन का मुख्य उद्देश्य भगवान को प्राप्त करना होना चाहिए, जो नाम जप, भजन और सत्संग के माध्यम से संभव है। वे कहते हैं कि भगवान तक पहुंचने का सबसे सरल मार्ग नाम जप है।

जीवन और कर्म पर विचार

स्वामी प्रेमानन्द जी के अनुसार, केवल वही कर्म सही है जो धर्म के अनुसार हो। बाकी सभी कर्म व्यर्थ या गलत हैं। वे यह भी कहते हैं कि हमें अपने हर कार्य को पूरा करने के बाद भगवान को समर्पित कर देना चाहिए। ऐसा करने से व्यक्ति गलत रास्ते पर नहीं जाता। उनका मानना है कि ईश्वर से इच्छाएं मांगना अज्ञानता का संकेत है। हमें केवल कर्म करना चाहिए और फल भगवान पर छोड़ देना चाहिए।

युवाओं के लिए संदेश

स्वामी जी युवाओं को संयम और अनुशासन का पालन करने की सलाह देते हैं। वे कहते हैं कि सफलता के लिए केवल मेहनत ही नहीं, बल्कि आत्मसंयम भी जरूरी है। उन्होंने विशेष रूप से युवाओं को ब्रह्मचर्य का पालन करने और अपने जीवन को सही दिशा में ले जाने का संदेश दिया है। स्वामी जी ने अभिभावकों से अपील की है कि वे अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दें। उनका मानना है कि मजबूत संस्कार ही एक अच्छे समाज का निर्माण करते हैं।

महिलाओं के प्रति सम्मान

अपने उपदेशों में उन्होंने महिलाओं के सम्मान पर भी जोर दिया है। उन्होंने मासिक धर्म को पवित्र प्रक्रिया बताया और कहा कि इस समय महिलाओं का विशेष ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने युवतियों को भी सावधान करते हुए कहा कि वे भावनाओं में आकर गलत निर्णय न लें और अपने आत्मसम्मान को बनाए रखें।

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Amit Kumar

अमित कुमार पिछले 3 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। उन्हें विदेश, बिजनेस, ऑटो, टेक और गैजेट्स से जुड़ी खबरें लिखने का अच्छा अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बैचलर ऑफ मास कम्युनिकेशन, आईआईएमसी से पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा और उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है। पत्रकारिता की शुरुआत उन्होंने वेबसाइट पर लिखने से की। इसके बाद इंडिया डेली न्यूज़ चैनल और न्यूज़ इंडिया 24x7 में हिंदी सब-एडिटर के तौर पर काम किया। वर्तमान में वह पंजाब केसरी, दिल्ली में हिंदी सब-एडिटर के पद पर कार्यरत हैं।