नीट यूजी 2026 की काउंसलिंग से ठीक पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार के एक शासनादेश पर अंतरिम रोक लगाते हुए सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने अम्बेडकर नगर, कन्नौज, जालौन और सहारनपुर स्थित चार राजकीय मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की 85 सीटों में से 62 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित करने वाले आदेश को अगले आदेश तक स्थगित कर दिया है। यह आदेश रिट-सी संख्या 9943/2026 सचिन सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में 16 सितंबर को पारित किया गया।
हाईकोर्ट की रोक पर वकील का बयान”
मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कोर्ट के सामने दलील दी कि चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा एक सितंबर 2026 को जारी शासनादेश पूरी तरह से गैरकानूनी है। इस शासनादेश में हर कॉलेज की 85 सीटों में से 62 सीटें एससी, पांच सीटें एसटी, 11 सीटें ओबीसी और महज सात सीटें अनारक्षित वर्ग के लिए रखी गई हैं, जो उत्तर प्रदेश शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में आरक्षण अधिनियम 2006 का खुला उल्लंघन है। अधिनियम में एससी के लिए 21 प्रतिशत, एसटी के लिए दो प्रतिशत और ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत की सीमा तय है और कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता।
कोर्ट के आदेश के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “यह केवल आरक्षण का मामला नहीं है, यह न्यायालय के आदेश और सरकार द्वारा स्वयं दी गई अंडरटेकिंग की पवित्रता का मामला है।
जब डिवीजन बेंच ने स्पष्ट रूप से कहा था कि 2026-27 से आरक्षण 2006 के अधिनियम के अनुसार यानी 21% एससी, 2% एसटी और 27% ओबीसी ही रहेगा और सरकार ने खुद कोर्ट में यह वचन दिया था, तो फिर से 85 में से 62 सीटें केवल एक वर्ग के लिए आरक्षित कर देना पूरी तरह से असंवैधानिक, मनमाना और अवमाननापूर्ण है। हाईकोर्ट ने हमारे तर्कों को स्वीकार करते हुए इस मनमाने क्लॉज पर रोक लगाकर मेरिट के छात्रों को बड़ी राहत दी है।”
“60% से अधिक आरक्षण अवमानना”- हाईकोर्ट
दरअसल यह विवाद नया नहीं है। पिछले साल भी इन्हीं चार कॉलेजों में 79 प्रतिशत तक एससी आरक्षण दिए जाने पर सबरा अहमद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में एकल पीठ ने 25 अगस्त 2025 को सुनवाई करते हुए 2010 से 2015 के बीच जारी सभी संबंधित शासनादेशों को रद्द कर दिया था और कहा था कि आरक्षण 2006 के अधिनियम के अनुसार ही देना होगा।
सरकार इस फैसले के खिलाफ विशेष अपील लेकर डिवीजन बेंच में गई थी और वहां सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि पहले चरण की काउंसलिंग पूरी हो चुकी है और दस हजार से अधिक छात्रों ने दाखिला ले लिया है, ऐसे में यदि अभी पूरा सीट मैट्रिक्स बदला गया तो पूरे प्रदेश में अफरा-तफरी मच जाएगी। इसी आधार पर सरकार ने कोर्ट में मौखिक अंडरटेकिंग दी थी कि वह 2026-27 के शैक्षणिक सत्र से हर हाल में 2006 के अधिनियम के अनुसार ही आरक्षण लागू करेगी।
खंडपीठ ने अपने ताजा आदेश में कहा कि सरकार ने अपनी ही दी हुई अंडरटेकिंग से मुकरते हुए एक बार फिर 60 प्रतिशत से अधिक आरक्षण वाला शासनादेश जारी कर दिया है, जो एकल पीठ और डिवीजन बेंच दोनों के आदेशों के साथ-साथ अदालत में दी गई अंडरटेकिंग का सीधा उल्लंघन है और प्रथम दृष्टया न्यायालय की अवमानना के दायरे में आता है। सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से पेश अपर महाधिवक्ता अनुज कुदेसिया इस कदम को सही ठहराने के लिए कोई कानूनी आधार नहीं रख सके।
कोर्ट ने फिलहाल विवादित क्लॉज 6(क)(ii) के क्रियान्वयन पर अगले आदेश तक रोक लगाते हुए सरकार को यह छूट दी है कि वह चाहे तो 2006 के अधिनियम में तय आरक्षण के अनुसार प्रवेश प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है। साथ ही अपर मुख्य सचिव चिकित्सा शिक्षा को निर्देश दिया है कि वह दस दिन के अंदर व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर स्पष्ट करें कि अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद ऐसा आदेश कैसे पारित किया गया। हलफनामा आने के बाद अवमानना की कार्यवाही पर विचार किया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को नियत की गई है।


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