राजधानी का संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज अपनी विश्वस्तरीय चिकित्सा और अकादमिक उत्कृष्टता के लिए जाना जाता है। लेकिन हाल ही में नर्सिंग ऑफिसर और हॉस्पिटल अटेंडेंट भर्ती परीक्षा के दौरान जो लापरवाही सामने आयी है, उसने संस्थान के शीर्ष नेतृत्व और प्रशासनिक क्षमता के रीढ़ की कलई खोलकर रख दी है। बीते दिनों परीक्षा केंद्रों पर हुआ हंगामा और महज एक तकनीकी खराबी का नतीजा नहीं है, बल्कि यह संस्थान के निदेशक और उनके प्रशासनिक तंत्र की घोर लापरवाही, का जीता-जागता प्रमाण है।
सीधा प्रशासनिक तानााषाही का नतीजा
शासन ने पहले ही लिखित रूप में आपत्ति जताई थी कि तय योग्यता न रखने वाले अधिकारियों को इतनी बड़ी और संवेदनशील परीक्षा की कमान न सौंपी जाए। इसके बावजूद, प्रशासनिक नियमों को ताक पर रखकर चहेते अधिकारियों को जिम्मेदारी की रेवड़ी बांटी गई। यह सीधा-सीधा प्रशासनिक तानााषाही का नतीजा है। जब संस्थान का मुखिया ही शीर्ष स्तर से मिलने वाले निर्देशों को दरकिनार कर अपनी मनमानी पर उतर आए, तो नीचे का पूरा तंत्र पंगु होना लाजमी है।
बड़ा सवाल यह है कि आखिर पीजीआई प्रशासन के पास अपनी भर्ती परीक्षा आयोजित करने की क्या विशेषज्ञता है? उत्तर प्रदेश में प्रतियोगी परीक्षाओं को शुचितापूर्ण ढंग से कराने के लिए उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग और अधीनस्थ सेवा चयन आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाएं मौजूद हैं। इसके पहले केजीएमयू की 2023 नर्सिंग भर्ती में भी ठीक यही गलती की गई थी, जिसका हश्र पूरी दुनिया ने देखा और मामला जांच के दायरे में चला गया। उस इतिहास से सबक लेने के बजाय पीजीआई के निदेशक और प्रशासनिक विंग ने स्वयं परीक्षा कराने की आत्मघाती जिद पकड़ी।
असली मकसद क्या था
इस जिद के पीछे का असली मकसद क्या था? क्या प्रशासनिक अधिकारी अपने चहेतों को पिछले दरवाजे से एंट्री दिलाना चाहते थे? या फिर कोई और मकसद? कर्मचारियों को निदेशक के इस दूसरे कार्यकाल में उम्मीद थी कि संस्थान में नए कीर्तिमान स्थापित किये जायेंगे, लेकिन इसके उलट यह कार्यकाल प्रशासनिक ब्लंडर्स और घोटालों की भेंट चढ़ता दिख रहा है। कर्मचारी संगठनो ने भी निदेषक के खिलाफ आक्रोष व्यक्त किया,जो कि सोषल मीडिया पर वायरल है।
फिलहाल अस्पताल के जिम्मेदारों के सामने हर अभ्यार्थी बस यही सवाल खड़ा करता दिखाई दे रहा है कि ष्षासन ने जब पहले ही आपत्ति लगायी थी कि तो उस आपत्ति को निदेषक की ओर से अनदेखा क्यों किया गया शासन की आपत्तियों को कूड़ेदान में क्यों फेंका गया? भर्तियों के लिए विशेषज्ञ भर्ती एजेंसियां जैसे यूपीपीएससी व यूपीएसएसएससी से दूरी क्यों बनायी गयी ? वहीं जब इस संबध में निदेषक से फोन पर संपर्क करने की कोषिष की गयी तो उनका फोन नहीं उठा।
पारदर्शी तरीके से आयोजित किया जाएगा
उधर अस्पताल के कर्मचारियों और अधिकारियों में चर्चा है कि इस घटनाक्रम को लेकर निदेशक प्रो. आर.के. धीमन ने बयान जारी कर असुविधा के लिए खेद व्यक्त किया है, और आश्वासन दिया है कि 1 महीने के भीतर (संभवतः दिसंबर की शुरुआत तक) इस परीक्षा को दोबारा पारदर्शी तरीके से आयोजित किया जाएगा। नई तारीखों की घोषणा जल्द ही पीजीआई की आधिकारिक वेबसाइट पर की जाएगी।


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