फ्रांस में नकाबपोश उपद्रवी कौन? शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के बीच ‘कैसर्स’ पर नजर

Summary :

पेरिस, 1 नवंबर (आईएएनएस)। लगातार तीसरे वीकेंड फ्रांस की सड़कों पर महंगाई, आर्थिक असमानता और सरकारी नीतियों के खिलाफ हजारों लोग सड़क पर उतरे। ज्यादातर जगहों पर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन शनिवार को जैसे ही रैलियां खत्म होने लगीं, पेरिस समेत कई शहरों में नकाब पहने लोगों के समूह पुलिस से भिड़ गए। सवाल उठ रहा है कि आखिर ये नकाबपोश कौन हैं, जो आम लोगों के विरोध प्रदर्शन को हिंसक टकराव में बदल देते हैं? फ्रांस में ऐसे उपद्रवियों के लिए एक खास शब्द इस्तेमाल होता है—’कैसर्स’। फ्रांसीसी भाषा में इसका अर्थ है ‘तड़फोड़ करने वाले’। ये कोई एक…

पेरिस, 1 नवंबर (आईएएनएस)। लगातार तीसरे वीकेंड फ्रांस की सड़कों पर महंगाई, आर्थिक असमानता और सरकारी नीतियों के खिलाफ हजारों लोग सड़क पर उतरे। ज्यादातर जगहों पर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन शनिवार को जैसे ही रैलियां खत्म होने लगीं, पेरिस समेत कई शहरों में नकाब पहने लोगों के समूह पुलिस से भिड़ गए। सवाल उठ रहा है कि आखिर ये नकाबपोश कौन हैं, जो आम लोगों के विरोध प्रदर्शन को हिंसक टकराव में बदल देते हैं?

फ्रांस में ऐसे उपद्रवियों के लिए एक खास शब्द इस्तेमाल होता है—’कैसर्स’। फ्रांसीसी भाषा में इसका अर्थ है ‘तड़फोड़ करने वाले’। ये कोई एक पंजीकृत संगठन या औपचारिक राजनीतिक दल नहीं हैं, बल्कि अलग-अलग छोटे समूहों में सक्रिय ऐसे लोग हैं, जो प्रदर्शनों के दौरान हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और पुलिस के साथ संघर्ष में शामिल होते हैं।

फ्रांस की राजनीति और विरोध प्रदर्शनों पर नजर रखने वाले विश्लेषकों के मुताबिक, इन समूहों में अक्सर युवा और कट्टर वामपंथी विचारधारा से जुड़े कार्यकर्ता शामिल होते हैं। इन्हें कई बार अल्ट्रा-लेफ्ट समूहों के रूप में भी पहचाना जाता है। इनकी कोई केंद्रीय सदस्यता सूची या एक साझा नेतृत्व भी सामने नहीं आया है।

‘द लोकल’ की 19 अक्टूबर की पड़ताल के अनुसार, फ्रांस में कैसर्स अक्सर बड़े प्रदर्शनों के किनारे या उनके अंतिम पड़ाव पर सक्रिय होते हैं। ये आमतौर पर शांतिपूर्ण रैली का हिस्सा बनकर अपनी मांगें रखने के बजाय पुलिस के साथ टकराव और तोड़फोड़ की घटनाओं में शामिल होते हैं। कुछ लोग पहले भी ऐसे प्रदर्शनों में देखे जा चुके हैं।

इनकी पहचान छिपाने के लिए नकाब, चश्मे और काले कपड़ों का इस्तेमाल भी चर्चा में रहा है। कई बार इनके पास हथौड़े, आतिशबाजी के सामान और पेट्रोल बम बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री भी पाई गई है। बैंकों, रियल एस्टेट कार्यालयों और बड़े कारोबारी प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना इनके विरोध के तरीकों में शामिल बताया जाता है। हालांकि, हिंसा में शामिल सभी लोगों की पृष्ठभूमि एक जैसी नहीं है।

31 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों में भी यही पैटर्न देखने को मिला। फ्रांस के गृह मंत्रालय के मुताबिक, देशभर में करीब 3.20 लाख लोगों ने प्रदर्शन किया, जिनमें लगभग 70 हजार अकेले पेरिस में थे। अधिकांश रैलियां शांतिपूर्ण रहीं, लेकिन पेरिस में पोर्टे डी शारांटों के आसपास काले कपड़े पहने दर्जनों नकाबपोश लोगों ने हथौड़ों से सड़क के पत्थर उखाड़े और पुलिस पर फेंके। सुरक्षा बलों पर एक आग लगाने वाला उपकरण भी फेंका गया। पुलिस ने आंसू गैस, स्टन ग्रेनेड और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया।

फ्रांस की पुलिस के मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान कुछ सौ उपद्रवियों का एक समूह पुलिस पर लगातार हमले कर रहा था। अधिकारियों ने पेरिस में 400 से 800 कट्टर वामपंथी कार्यकर्ताओं की मौजूदगी की आशंका जताई थी। हालांकि, यह संख्या अनुमान थी, न कि गिरफ्तार लोगों की प्रमाणित पहचान।

इस बार हिंसा के बीच हैलोवीन का त्योहार भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बन गया। कई प्रदर्शनकारी स्पाइडरमैन, फ्रैंकेंस्टाइन और अन्य किरदारों की पोशाक में सड़कों पर उतरे। कुछ ने चेहरे ढकने के लिए हैलोवीन के मुखौटों का इस्तेमाल किया। फ्रांस के गृह मंत्री लॉरां नूनेज ने चेतावनी दी थी कि पहचान छिपाने के लिए चेहरा ढकने वालों पर जुर्माना लगाया जा सकता है। सरकार को सोशल मीडिया पर ऐसे संदेश भी मिले थे, जिनमें हैलोवीन की रात लोगों से सड़कों पर उतरकर ‘क्रांति’ शुरू करने की अपील की गई थी।

फ्रांस में हिंसा की घटनाओं के बाद इस सवाल ने भी राजनीतिक बहस को हवा दी है। हालांकि, ‘द लोकल’ की पड़ताल में सामने आया कि कैसर्स को सीधे तौर पर अप्रवासी समुदाय से जोड़ने का कोई ठोस आधार नहीं है। ऐसे हिंसक समूहों में बड़ी संख्या में फ्रांसीसी नागरिक और कट्टर वामपंथी विचारधारा से जुड़े युवा शामिल बताए गए हैं। इसलिए नकाबपोशों की पहचान को प्रवासियों या किसी एक समुदाय से जोड़कर देखना तथ्यों से परे होगा।

फ्रांस में मौजूदा विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत महंगाई, जीवनयापन की बढ़ती लागत, आर्थिक असमानता और सार्वजनिक सेवाओं की खराब होती स्थिति के खिलाफ हुई थी। इसमें छात्र, ट्रेड यूनियन और येलो वेस्ट आंदोलन से जुड़े लोग शामिल हैं। बाद में पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के घायल होने की घटनाओं के बाद नागरिक स्वतंत्रता और विरोध करने के अधिकार की मांग भी आंदोलन का हिस्सा बन गई।

17 अक्टूबर को प्रदर्शनों के पहले बड़े दौर में कई शहरों में दुकानों में लूटपाट और सार्वजनिक इमारतों में आगजनी हुई थी। इसके बाद 31 अक्टूबर को तीसरे सप्ताहांत के प्रदर्शनों के दौरान भी हिंसा की घटनाएं सामने आईं। गृह मंत्रालय के अनुसार, 31 अक्टूबर को दोपहर तक ही पुलिस 217 गिरफ्तारियों के मुकाबले 511 लोगों को गिरफ्तार कर चुकी थीं।

इस बीच, छात्र संगठनों ने नवंबर के पहले सप्ताह में स्कूलों और विश्वविद्यालयों को बंद कराने तथा 5 नवंबर को मजदूर संगठनों के साथ प्रदर्शन में शामिल होने का ऐलान किया है।

–आईएएनएस

केआर/

(This content is sourced from a syndicated feed and is published as received. Punjab Kesari assumes no responsibility or liability for its accuracy, completeness, or content.)

IANS Agency

The Indo-Asian News Service (IANS) is a private news agency providing round-the-clock, in-depth coverage of politics, business, entertainment, and world affairs from India and South Asia.