संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की निष्क्रियता से यूएन में जनता का विश्वास कमजोर पड़ रहा : भारत

Summary :

संयुक्त राष्ट्र, 15 जुलाई (आईएएनएस)। भारत ने चेतावनी दी है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार करने में विफलता के कारण लोगों का संयुक्त…

संयुक्त राष्ट्र, 15 जुलाई (आईएएनएस)। भारत ने चेतावनी दी है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार करने में विफलता के कारण लोगों का संयुक्त राष्ट्र (यूएन) पर भरोसा लगातार कम होता जा रहा है। भारत ने कहा कि सुरक्षा परिषद को ऐसा सक्षम बनाया जाना चाहिए, जो संघर्षों को समाप्त करने और मानवीय पीड़ा को खत्म करने में प्रभावी भूमिका निभा सके।

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरिश ने मंगलवार को कहा, “हाल के वर्षों में संयुक्त राष्ट्र (यूएन) को लेकर लोगों की धारणा नकारात्मक हुई है। इसका मुख्य कारण यह है कि सुरक्षा परिषद दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी भीषण संघर्षों में सार्थक हस्तक्षेप करने में विफल रही है।”

उन्होंने कहा, “सुरक्षा परिषद प्रभावित आबादी की मानवीय पीड़ा को समाप्त करने में प्रभावी साबित नहीं हुई है।” इससे अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के अपने मूल दायित्व को निभाने की उसकी क्षमता पर भी सवाल उठते हैं।

हरिश वर्ष 2024 में विश्व नेताओं के शिखर सम्मेलन में अपनाए गए ‘पैक्ट फॉर द फ्यूचर’ के लक्ष्यों में शामिल ‘भविष्य के अनुरूप बहुपक्षवाद को सक्षम बनाना’ विषय पर आयोजित मंत्रिस्तरीय गोलमेज बैठक को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 80 वर्ष पहले बनाई गई संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा संरचना आज की वैश्विक चुनौतियों के लिए पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा, “सामूहिक रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के मुद्दे पर कोई ठोस प्रगति नहीं कर पाया है।”

उन्होंने खेद जताते हुए कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार को लेकर चल रही अंतर-सरकारी वार्ताएं (आईजीएन) केवल “पहले से तैयार बयानों के अंतहीन दौर” तक सीमित रह गई हैं।

हरिश ने कहा कि इसी कारण ‘पैक्ट फॉर द फ्यूचर’ के एक्शन प्वाइंट 39 से 42- जिनमें हिंसा, नस्लवाद और विदेशी-विरोधी मानसिकता (ज़ेनोफोबिया) को समाप्त करने, लैंगिक समानता को बढ़ावा देने तथा सुरक्षा परिषद द्वारा प्रभावी शांति स्थापना रणनीतियां तैयार करने का आह्वान किया गया है- अधिकतर केवल कागजों तक ही सीमित रह गए हैं।

उन्होंने कहा, “यह स्थिति स्वीकार्य नहीं है और इसमें बदलाव होना चाहिए।”

हरिश ने बताया कि “इन एक्शन प्वाइंट्स को लेकर भारत की गंभीर आपत्तियां थीं।” हालांकि उन्होंने कहा, “भारत की रचनात्मक भावना ने हमें व्यापक रूप से इस ‘पैक्ट’ के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।”

उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार के अलावा संयुक्त राष्ट्र महासभा को अधिक प्रभावी बनाना और आर्थिक एवं सामाजिक परिषद (ईकोसॉक) की भूमिका को आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय—सतत विकास के तीनों आयामों में मजबूत करना भी आवश्यक है।

वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) के आर्थिक विकास का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, “हमारी प्रतिबद्धता अटूट है कि किसी को भी पीछे न छोड़ा जाए, संसाधनों को वहां उपलब्ध कराया जाए जहां उनकी सबसे अधिक आवश्यकता है, और हम स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करें।”

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों पर बोलते हुए हरिश ने कहा कि उन्हें भी समय के साथ बदलना होगा और “अपने मूल दायित्वों को बनाए रखते हुए अधिक प्रतिनिधिक, अधिक जवाबदेह और विकासोन्मुख बनना होगा।”

उन्होंने कहा, “सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) की प्राप्ति के लिए पर्याप्त, सस्ती और पूर्वानुमान योग्य वित्तीय व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है।”

अपने संबोधन के अंत में हरिश ने कहा, “भारत अपनी सभ्यतागत सोच ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ अर्थात पूरी दुनिया एक परिवार है- के सिद्धांत पर आधारित इसी दृष्टिकोण को आगे बढ़ा रहा है।”

–आईएएनएस

पीएम

(This content is sourced from a syndicated feed and is published as received. Punjab Kesari assumes no responsibility or liability for its accuracy, completeness, or content.)

News Desk