इस्लामाबाद, 15 जुलाई (आईएएनएस)। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए काम करने वाले एक प्रमुख संगठन ने देश के ईशनिंदा (ब्लास्फेमी) कानूनों के दुरुपयोग पर गहरी चिंता व्यक्त की है। संगठन का आरोप है कि इन कानूनों का इस्तेमाल बढ़ते हुए व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने, संपत्ति हड़पने और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है।
वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी (वीओपीएम) के अनुसार, 9 जुलाई को कराची में एक बार फिर ऐसा ही चिंताजनक मामला सामने आया। आरोप है कि कुरान का एक कथित रूप से अपवित्र किया गया पन्ना एक दुकान पर डाक के जरिए भेजा गया, जिसके साथ एक ईसाई व्यक्ति अजीम जावेद और उनकी मां की तस्वीरें भी थीं। इस घटना के बाद इलाके में भारी आक्रोश फैल गया। गुस्साई भीड़ मौके पर जमा हो गई, पुलिस पर पथराव किया गया और कई ईसाई परिवार अपने घरों में फंसकर रह गए।
घटना की निंदा करते हुए मानवाधिकार संगठन ने कहा, “यह केवल स्वतःस्फूर्त जनाक्रोश नहीं था। यह एक सुनियोजित साजिश जैसा प्रतीत होता है। आखिर कोई व्यक्ति कुरान का जला हुआ पन्ना अपनी ही तस्वीर और पहचान पत्र के साथ क्यों भेजेगा?”
परिवार के एक करीबी सूत्र के हवाले से वीओपीएम ने कहा, “कोई भी व्यक्ति जानबूझकर खुद को इतने गंभीर अपराध में नहीं फंसाएगा।”
संगठन का कहना है कि यह घटना अजीम जावेद को झूठे मामले में फंसाने की एक सोची-समझी कोशिश लगती है, जिसके पीछे व्यक्तिगत या वित्तीय विवाद हो सकता है।
वीओपीएम ने कहा, “यही पाकिस्तान के ईशनिंदा कानूनों की सबसे बड़ी समस्या है। किसी आरोप को हिंसा भड़काने के लिए सबूत की जरूरत नहीं होती, यहां तक कि तर्क की भी जरूरत नहीं होती। केवल भीड़ और माहौल काफी होता है। कराची की यह घटना 2023 के जरानवाला कांड से काफी मिलती-जुलती है, जहां फर्जी ईशनिंदा आरोपों के बाद चर्चों और ईसाई घरों को जला दिया गया था। भीड़ ने पहले कार्रवाई की और अदालतें बाद में सक्रिय हुईं – कई बार तब तक बहुत देर हो चुकी थी।”
संगठन ने आगे कहा, “दोनों मामलों में सरकार ने तब कार्रवाई की जब हालात बेकाबू हो चुके थे। यह सुशासन नहीं, बल्कि केवल क्राइसिस मैनेजमेंट है।”
पिछले सप्ताह वीओपीएम ने चेतावनी दी थी कि पाकिस्तान में ईशनिंदा कानूनों से जुड़ी स्थिति अब और अधिक खतरनाक तथा जटिल हो गई है। संगठन के अनुसार, 2023 से 2026 तक के आंकड़े बताते हैं कि ईशनिंदा के मामलों में लगातार वृद्धि, भीड़ द्वारा हिंसा में इजाफा और डिजिटल माध्यमों से लगाए जाने वाले आरोपों में तेजी आई है, जिनकी सत्यता की जांच करना अधिक कठिन और उनका दुरुपयोग करना अधिक आसान हो गया है।
संगठन ने कहा, “आंकड़े खुद इस स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं। वर्ष 2024 में लगभग 213 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर लगभग 250 हो गई। वर्ष 2026 के शुरुआती आंकड़े भी इसी बढ़ते रुझान की ओर संकेत करते हैं। इसके साथ ही भीड़ की हिंसा का सिलसिला भी जारी है। 2024 में कम से कम पांच लोगों की भीड़ द्वारा हत्या की गई और 2026 में भी ऐसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। ये अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि कानूनी दुरुपयोग और भीड़ द्वारा कानून हाथ में लेने की प्रवृत्ति पर नियंत्रण करने में व्यवस्था की व्यापक विफलता को दर्शाती हैं।”
बिगड़ती स्थिति पर चिंता जताते हुए वीओपीएम ने कहा कि पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून लंबे समय से विवादों में रहे हैं, लेकिन अब इनका दुरुपयोग पहले की तुलना में अधिक संगठित और व्यापक हो गया है।
संगठन ने कहा, “जो पहले केवल दुरुपयोग था, वह अब अधिक संगठित और व्यापक रूप ले चुका है। फर्जी या छेड़छाड़ की गई ऑनलाइन सामग्री, सुनियोजित तरीके से लोगों को फंसाने की कोशिशों और जवाबदेही की कमी ने ईशनिंदा के आरोपों को एक हथियार बना दिया है। जब तक मजबूत कानूनी सुरक्षा, भीड़ हिंसा पर कड़ी कार्रवाई और साक्ष्यों के लिए सख्त मानक लागू नहीं किए जाते, तब तक यह दुष्चक्र जारी रहेगा।”
–आईएएनएस
केआर/
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