नई दिल्ली, 27 मार्च (आईएएनएस)। पाकिस्तान अचानक बढ़ते अमेरिका-ईरान संघर्ष में अपने डिप्लोमैटिक संबंधों का फायदा उठाकर एक मीडिएटर के तौर पर सामने आया है। हालांकि, अफगानिस्तान के साथ उसका अपना चल रहा युद्ध, इलाके के दूसरे देशों की मध्यस्थता की कई कोशिशों के बावजूद अभी तक सुलझा नहीं है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान अमेरिका-ईरान के बीच तनाव को कम करने के लिए बातचीत को आसान बनाने की कोशिश कर रहा है ताकि एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध को टाला जा सके।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान, तुर्किए और मिस्र के जरिए हुई ‘सकारात्मक’ अप्रत्यक्ष कूटनीति के बाद ईरान के ऊर्जा ढांचे पर हमलों में पांच दिन की सीमित रोक लगाने की घोषणा की। इस कदम के साथ ही इस्लामाबाद खुद को एक अहम मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है और अमेरिका-ईरान के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच सीधी बातचीत की मेजबानी की पेशकश कर रहा है।
पाकिस्तान के आर्मी चीफ असीम मुनीर ने व्हाइट हाउस के साथ अपने बेहतर होते संबंधों और सऊदी अरब, यूएई और तुर्किए जैसे क्षेत्रीय ताकतों के साथ पाकिस्तान के लंबे समय से चले आ रहे संबंधों का फायदा उठाकर इस कोशिश को आगे बढ़ाया है।
इस्लामाबाद की यह जल्दबाजी काफी हद तक हाल के विवादों के बाद वैश्विक अहमियत बढ़ाने की जरूरत और मिडिल ईस्ट की अस्थिरता के बीच आर्थिक फायदा हासिल करने से उपजी है।
अफगानिस्तान के साथ चल रहे झगड़े के बावजूद, अमेरिका-ईरान युद्ध में बीचबचाव करने की पाकिस्तान की इच्छा, जरूरी रणनीतिक, आर्थिक और प्रतिष्ठा की जरूरतों से पैदा हुई है। इस कदम से इस्लामाबाद को घरेलू और क्षेत्रीय संकटों के बीच खुद को एक जिम्मेदार वैश्विक खिलाड़ी के तौर पर पेश करने का मौका मिलता है।
जनरल मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस्लामाबाद को एक तटस्थ मंच के रूप में सामने रखा है, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भी सहमति मिली है, ताकि भारत, ईरान और अब अफगानिस्तान के साथ तनाव के बाद पाकिस्तान अपनी अहमियत फिर से स्थापित कर सके।
पाकिस्तान अब खुद को काफी हद तक ‘जरूरी’ स्टेटस में दिखाने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि वह अभी तक अमेरिका-ईरान के बीच सीधे संपर्क की पुष्टि नहीं होने के बावजूद दबाव में संदेश दे रहा है।
इसी बीच, पाकिस्तान ने काबुल के खिलाफ ‘खुली जंग’ का ऐलान कर दिया है, जिसमें राजधानी समेत कई अफगान शहरों पर एयरस्ट्राइक किए गए, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। हाल में काबुल के एक ड्रग रिहैबिलिटेशन सेंटर में हुए बम धमाके में 400 से ज्यादा लोग मारे गए। यह लड़ाई 2,600 किमी से ज्यादा लंबे विवादित डूरंड लाइन बॉर्डर से जुड़ी है, जिसे अफगानिस्तान पश्तून जमीन का कॉलोनियल बंटवारा मानकर खारिज करता है।
पाकिस्तान, तालिबान पर आरोप लगाता है कि वह 2021 में दोहा में किए गए उन वादों को पूरा करने में नाकाम रहा है, जिसमें कथित तौर पर अफगानी जमीन का इस्तेमाल करने वाले आतंकी समूहों पर रोक लगाने की बात कही गई थी, जिसके कारण कथित उग्रवादी ढांचों पर एयर स्ट्राइक जैसी जवाबी कार्रवाई हुई।
अक्टूबर में कतर-तुर्किए की मध्यस्थता से हुए सीजफायर से पहले 2025 में हुई एक छोटी सी झड़प में 17 आम लोग मारे गए थे, लेकिन लड़ाई फिर से शुरू हो गई।
अफगानिस्तान-पाकिस्तान के संबंधों में दरार गहरे अविश्वास और संप्रभुता के दावों की वजह से आई है, जिससे हफ्तों तक चली लड़ाई में सैकड़ों लोग मारे गए। इस तरह, ईरान युद्ध में पाकिस्तान की मध्यस्थ की भूमिका, अफगान के साथ अपने तनाव के बावजूद, हताशा भरी डिप्लोमेसी को दिखाती है।
रक्षा मामलों के विशेषज्ञ और लेखक ब्रह्मा चेलानी ने गुरुवार को फेसबुक पर पोस्ट किया, “असीम मुनीर, जिन्हें राष्ट्रपति ट्रंप ने अपना ‘पसंदीदा फील्ड मार्शल’ कहा था, ने कुछ दिन पहले ही अफगानिस्तान के सबसे बड़े ड्रग रिहैबिलिटेशन अस्पताल पर बमबारी करके सैकड़ों लोगों को मार डाला।”
काबुल अस्पताल में हुए बम धमाके ने सच में इस्लामाबाद की इमेज खराब कर दी। ऐसे में पाकिस्तान अपनी छवि सुधारने और अपनी अहमियत साबित करने के लिए अमेरिका-ईरान के बीच उच्च स्तरीय मध्यस्थता के जरिए संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।
उन्होंने याद दिलाया, “मुनीर की मिलिट्री लीडरशिप में ही पाकिस्तान ने जनवरी 2024 में ईरान के साथ हाई-प्रोफाइल स्ट्राइक की थी।”
अब, जबकि इस्लामाबाद अपनी बॉर्डर की दिक्कतों के लिए थर्ड-पार्टी सॉल्यूशन को मना कर रहा है, वह खुद को अमेरिका-ईरान बातचीत के लिए एक न्यूट्रल जगह के तौर पर पेश कर रहा है। एक सफल मीडिएशन पाकिस्तान को बहुत जरूरी मदद, ट्रेड डील, बैन में राहत दिला सकता है, जो अंदरूनी संकटों और आतंकी फंडिंग के लिए एफएटीएफ की ग्रे-लिस्टिंग के बीच जरूरी हैं। पाकिस्तान अभी अलगाववादी ताकतों, राजनीतिक उथल-पुथल और आर्थिक तंगी का सामना कर रहा है।
एक्सपर्ट ने चेतावनी दी, “ट्रंप के 15-पॉइंट प्लान को बताने से तेहरान के साथ मुनीर का भरोसा ही कम होगा।”
इलाके के हिसाब से, पाकिस्तान के लिए सुरक्षा के खतरे बढ़ते हैं, जबकि ईरान से एनर्जी के झटके इस्लामाबाद की अर्थव्यवस्था के लिए खतरा हैं। ईरान में कामयाबी काबुल के खिलाफ बढ़त बना सकती है, लेकिन नाकामी इस्लामाबाद को और अकेला कर सकती है।
–आईएएनएस
केके/एबीएम
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