लंदन, 7 नवंबर (आईएएनएस)। पाकिस्तान में ‘मेडिकल एंड डेंटल कॉलेज एडमिशन टेस्ट’ (एमडीसीएटी) के लिए आवेदन करने वाले छात्रों की संख्या में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, यह सिर्फ प्रवेश संख्या में कमी नहीं है, बल्कि देश के मेडिकल शिक्षा क्षेत्र में मौजूद गहरी समस्याओं की ओर भी इशारा करता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान मेडिकल एसोसिएशन (पीएमए) ने इस गिरावट की वजह मेडिकल शिक्षा की बढ़ती लागत और डॉक्टरों को मिलने वाले कम वेतन को बताया है। वहीं पाकिस्तान मेडिकल एंड डेंटल काउंसिल (पीएमडीसी) का कहना है कि मेडिकल स्नातकों की संख्या और उन्हें मिलने वाले उच्च स्तर के प्रशिक्षण (पोस्टग्रेजुएट ट्रेनिंग) के अवसरों के बीच बड़ा अंतर है।
ब्रिटिश अखबार ‘एशियन लाइट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में कई पीढ़ियों से डॉक्टर बनना सिर्फ एक पेशा नहीं बल्कि सामाजिक सम्मान, आर्थिक सुरक्षा और समाज सेवा का प्रतीक माना जाता रहा है। लेकिन मेडिकल प्रवेश परीक्षा के लिए घटती आवेदन संख्या यह दिखाती है कि अब युवा इस पेशे को पहले जैसी नजर से नहीं देख रहे हैं।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, एमडीसीएटी के लिए पंजीकरण में लगभग 32 प्रतिशत की गिरावट आई है। जहां 2022 में 2,04,253 छात्रों ने पंजीकरण कराया था, वहीं 2026 में यह संख्या घटकर 1,38,158 रह गई। पाकिस्तान मेडिकल एसोसिएशन ने चेतावनी दी है कि मेडिकल कॉलेजों की ऊंची फीस और डॉक्टरों की आमदनी को लेकर बढ़ती चिंताएं युवाओं को इस पेशे से दूर कर रही हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह जरूरी नहीं कि हर छात्र एक ही कारण से मेडिकल क्षेत्र छोड़ने का फैसला कर रहा हो। लेकिन लगातार गिर रही आवेदन संख्या ने पूरे मेडिकल शिक्षा तंत्र को सवालों के घेरे में ला दिया है। यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब डॉक्टर बनने के इच्छुक युवाओं को कड़ी प्रतिस्पर्धा, महंगी शिक्षा, प्रवेश परीक्षाओं को लेकर बार-बार होने वाले विवादों और पोस्टग्रेजुएट प्रशिक्षण को लेकर अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, अब कई छात्रों के सामने सवाल सिर्फ मेडिकल कॉलेज में सीट पाने का नहीं रह गया है, बल्कि यह भी है कि डॉक्टर बनने के लिए कई सालों तक समय और पैसा खर्च करना वास्तव में फायदेमंद रहेगा या नहीं।
मेडिकल डिग्री हासिल करना एक लंबी और महंगी प्रक्रिया है, खासकर उन परिवारों के लिए जो निजी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला लेना चाहते हैं। ट्यूशन फीस के अलावा रहने का खर्च, परिवहन, किताबें, परीक्षा की तैयारी और अन्य दैनिक खर्च मिलाकर कुल लागत काफी बढ़ जाती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कई परिवारों के लिए यह बोझ और बढ़ जाता है क्योंकि उन्हें कई वर्षों तक लगातार पैसे खर्च करने पड़ते हैं, जबकि इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि पढ़ाई पूरी होने के बाद बच्चों को अच्छी नौकरी या पर्याप्त आय मिलेगी।
जो छात्र सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीट नहीं पा पाते, उनके सामने अक्सर दो ही विकल्प बचते हैं। पहला, निजी कॉलेजों की भारी फीस का खर्च उठाना और दूसरा, किसी दूसरे विषय में पढ़ाई करना। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि पाकिस्तान के मेडिकल शिक्षा क्षेत्र में फीस की असमानता को लेकर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं।
अगस्त 2026 में पाकिस्तान की नेशनल असेंबली की स्थायी समिति ने संबंधित मंत्रालय और पीएमडीसी से मेडिकल कॉलेजों में खाली सीटों, अलग-अलग कॉलेजों की फीस में अंतर और ज्यादा फीस वसूलने वाले संस्थानों की निगरानी की समीक्षा करने को कहा था।
रिपोर्ट के अनुसार, इस हस्तक्षेप ने एक बड़ी समस्या को उजागर किया। एक तरफ मेडिकल कॉलेजों में सीटें उपलब्ध हैं, लेकिन दूसरी तरफ बड़ी संख्या में छात्र और उनके परिवार इतनी महंगी शिक्षा का खर्च उठाने या उसे उचित मानने को तैयार नहीं हैं।
–आईएएनएस
एवाई/डीकेपी
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