ट्रंप सरकार का पाकिस्तान को बढ़ावा देना अमेरिका को ही पड़ेगा महंगा : रिपोर्ट

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तेल अवीव, 4 जुलाई (आईएएनएस)। पाकिस्तान ऐसी परिस्थिति में पहुंच सकता है, जहां इतिहास बताता है कि अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक अहमियत रखने वाले देशों की सरकारों पर अक्सर उनकी घरेलू शासन संबंधी नाकामियों के बावजूद बाहरी दबाव अपेक्षाकृत कम रहता है। हाल के समय में अमेरिका पाकिस्तान को काफी करीब लेकर आया। ऐसे में एक रिपोर्ट में हवाला दिया गया है कि पाकिस्तान को बढ़ावा देना अमेरिका को ही भारी पड़ सकता है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, चाहे अमेरिका का पाकिस्तान के प्रति नरम रुख हो या फिर मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोपों के बावजूद यूरोपीय संघ से जीएसपी-प्लस का दर्जा जारी…

तेल अवीव, 4 जुलाई (आईएएनएस)। पाकिस्तान ऐसी परिस्थिति में पहुंच सकता है, जहां इतिहास बताता है कि अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक अहमियत रखने वाले देशों की सरकारों पर अक्सर उनकी घरेलू शासन संबंधी नाकामियों के बावजूद बाहरी दबाव अपेक्षाकृत कम रहता है। हाल के समय में अमेरिका पाकिस्तान को काफी करीब लेकर आया। ऐसे में एक रिपोर्ट में हवाला दिया गया है कि पाकिस्तान को बढ़ावा देना अमेरिका को ही भारी पड़ सकता है।

ताजा रिपोर्ट के अनुसार, चाहे अमेरिका का पाकिस्तान के प्रति नरम रुख हो या फिर मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोपों के बावजूद यूरोपीय संघ से जीएसपी-प्लस का दर्जा जारी रखना, अंतरराष्ट्रीय साझेदार क्षेत्रीय रणनीतिक महत्व के कारण इस्लामाबाद की खुलकर आलोचना करने से बचते नजर आते हैं।

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यह रुझान जारी रहा, तो इसके गंभीर राजनीतिक और सामाजिक परिणाम सामने आ सकते हैं। इसका असर राजनीतिक विरोधियों, जातीय अल्पसंख्यकों और व्यापक क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ने की आशंका है।

इटली के राजनीतिक सलाहकार, लेखक और भू-राजनीतिक विशेषज्ञ सर्जियो रेस्टेली ने ‘टाइम्स ऑफ इजरायल’ के लिए अपने लेख में कहा, “इतिहास अक्सर खुद को दोहराता है और दूरदृष्टि की कमी वाले नेता अपने पूर्ववर्तियों की गलतियों को दोहराते हैं। ट्रंप सरकार का पाकिस्तान को प्रोत्साहन देना ऐसी ही एक भूल है, जिसकी भारी कीमत अमेरिका को चुकानी पड़ेगी।”

उन्होंने आगे लिखा, “1979 में अमेरिका और सऊदी अरब ने जनरल जिया-उल-हक के नेतृत्व वाले पाकिस्तान का इस्तेमाल अफगानिस्तान में सोवियत संघ (यूएसएसआर) के खिलाफ एक प्रॉक्सी युद्ध शुरू करने के लिए रणनीतिक रूप से किया था। इसके बाद के दशकों में पाकिस्तान ने दोनों पक्षों के साथ अपने हित साधे और इसी रणनीतिक गलती का अंतिम परिणाम 11 सितंबर 2001 का आतंकी हमला रहा।”

उन्होंने कहा, “आतंक के खिलाफ लड़ाई के दौरान पाकिस्तान पर अमेरिका की लगातार निर्भरता ने न सिर्फ काबुल को तालिबान के हाथों में सौंप दिया, बल्कि अमेरिका को भी भारी कीमत चुकानी पड़ी।”

विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने के बावजूद, पाकिस्तान ने अफगान बॉर्डर पर सैन्य ऑपरेशन जारी रखा है, जिससे तालिबान अधिकारियों के साथ तनाव बढ़ गया। सीमा पार हमलों और हथियारों से होने वाली मुठभेड़ों की बढ़ती संख्या ने इस बात की चिंता बढ़ा दी है कि इस्लामाबाद अपने पड़ोस में डिप्लोमैटिक बातचीत को लेकर जबरदस्ती कर रहा है।

पाकिस्तान के बिगड़ते घरेलू राजनीतिक हालात के बीच, रेस्टेली ने कहा कि आलोचक तेजी से यह तर्क दे रहे हैं कि देश के अंदर की राजनीति पर सेना का प्रभाव एक ऐसे सिस्टम में बदल रहा है, जहां राजनीतिक प्राधिकरण असल में पाकिस्तानी आर्मी चीफ मुनीर के नेतृत्व वाली सेना के हाथों में है।

उन्होंने कहा, “राजनीतिक कार्रवाई बलूचिस्तान में बढ़ती अशांति के साथ हुई है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ने जाने-माने बलूच कार्यकर्ता महरंग बलूच समेत दूसरे कार्यकर्ताओं को सजा सुनाए जाने की कड़ी आलोचना की है। संगठन का कहना है कि शांतिपूर्ण राजनीतिक असहमति को तेजी से आपराधिक बनाया जा रहा है। पाकिस्तानी अधिकारी इन आरोपों को खारिज करते हैं और कहते हैं कि केस कानून के मुताबिक चलाए जाते हैं। फिर भी, यह सोच कि राजनीतिक विरोध और जातीय शिकायतों को मुख्य रूप से दबाव डालकर सुलझाया जा रहा है, इससे बलूच समुदायों के और अलग-थलग पड़ने का खतरा है।”

रेस्टेली ने चेतावनी देते हुए कहा कि विदेश में पाकिस्तान की कूटनीतिक हालात देश में लोकतांत्रिक गिरावट के लिए पॉलिटिकल कवर दे सकती है और दक्षिण एशिया में एक नई तानाशाही की ओर बढ़ने को बढ़ावा दे सकती है।

–आईएएनएस

केके/एबीएम

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