Sandeepa Dhar: ऐसी दुनिया में जहाँ परफेक्शन की सराहना तो होती है, लेकिन उसके पीछे छिपी भावनाओं को शायद ही कोई समझना चाहता है, वहां संदीपा धर ‘दो दीवाने सहर में’ में नैना के एक बेहद संवेदनशील किरदार के साथ सामने आ रही हैं। नैना एक ऐसी युवती है, जो बाहर से पूरी तरह सुलझी हुई, आत्मविश्वासी और परफेक्ट दिखती है, लेकिन भीतर ही भीतर अपनी पहचान, अकेलेपन और अपेक्षाओं के बोझ से जूझ रही है। विशेष रूप से सलीके से सजी मुस्कान और सहज अंदाज़ के पीछे छिपी एक ऐसी कहानी, जो अपने अस्तित्व के साथ हर हाल में “ठीक दिखने” की थकान को बयां करती है।
Sandeepa Dhar: परफेक्ट मुस्कान के पीछे उम्मीदों के बोझ को तलाशती

अपने किरदार ‘नैना’ के बारे में बात करते हुए संदीपा कहती हैं, “नैना वो लड़की है, जिसमें हममें से बहुत से लोग खुद को देख सकते हैं। वो मुस्कुराती है, हर ज़िम्मेदारी निभाती है और बाहर से लगता है कि सब कुछ कंट्रोल में है। लेकिन अंदर ही अंदर वो खुद से कटी हुई है, जैसे वो अपनी ही ज़िंदगी में एक किरदार निभा रही हो और असली ‘खुद’ को भूल चुकी हो। हालांकि आज के समय में ये दबाव बहुत आम बात है, जहां हर हाल में ठीक दिखने की अपेक्षा की जाती है, फिर चाहे आपके अंदर कुछ भी चल रहा हो।”

फिल्म की भावनात्मक गहराई पर बात करते हुए संदीपा आगे कहती हैं, “’दो दीवाने सहर में’ मुझे इसलिए खास लगी क्योंकि यह नज़रअंदाज़ होने की भावना को बेहद खूबसूरती से दिखाती है। कई बार जितना ज़्यादा आप परफेक्ट दिखते हैं, उतना ही मुश्किल हो जाता है ये स्वीकार करना कि अंदर कुछ टूट रहा है। सच खून तो नैना की जर्नी आईने के सामने खड़े होने और शायद पहली बार खुद से ईमानदार होने की है।”
अपने किरदार से जुड़ी उम्मीदों पर संदीपा कहती हैं, “मुझे यकीन है कि फिल्म देखने के बाद लोग खुद से ये ज़रूर पूछेंगे कि दुनिया की उम्मीदों से परे वे कौन हैं ? हालांकि मेरी कोशिश है कि वे खुद को देखा हुआ महसूस करें, क्योंकि हर शांत और सधे हुए चेहरे के पीछे एक कहानी होती है, जो हमेशा सुनी नहीं जाती।”


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