खनिज नीलामी में सुधार की आवश्यकता: स्वीकृतियां, जनसुनवाइयां और निवेशकों के सामने चुनौतियां

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Chhattisgarh News: भारत की खनिज नीलामी व्यवस्था पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और सार्वजनिक संसाधनों से अधिकतम राजस्व सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाई गई थी। बीते एक दशक में कोयला और अन्य खनिज ब्लॉकों की नीलामी से राज्यों को रिकॉर्ड प्रीमियम प्राप्त हुए हैं और इससे ऊर्जा सुरक्षा व औद्योगिक विकास को बल मिला है। इसके बावजूद एक गंभीर संरचनात्मक कमी बनी हुई है, खनिज ब्लॉकों की नीलामी आवश्यक सामाजिक, भूमि और वैधानिक तैयारियों के बिना कर दी जाती है। यही कमी आज परियोजनाओं में देरी, जनसुनवाइयों के निरस्तीकरण और सामाजिक असंतोष का मुख्य कारण बन रही है।

नीलामी के बाद बोलीदाता पर दबाव

किसी भी कोयला या खनिज परियोजना के लिए ग्राम सभा एवं स्थानीय पंचायतों की सहमति, रेलवे, सिंचाई, वन, लोक निर्माण, राजस्व और खनन विभागों से अनापत्ति प्रमाण पत्र आवश्यक होते हैं। इसके अतिरिक्त, भूमि की उपलब्धता से संबंधित विस्तृत रिपोर्ट, जिसमें खसरा‑वार विवरण, भूमि स्वामित्व की स्थिति और खसरा मानचित्र शामिल हों, नीलामी सूचना (NIT) का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए।

किंतु व्यवहार में इन सभी दायित्वों को नीलामी के बाद सफल बोलीदाता पर छोड़ दिया जाता है, जबकि उसने पहले ही भारी प्रीमियम और दीर्घकालिक निवेश की प्रतिबद्धता कर ली होती है। इस व्यवस्था के कारण निवेशक उन परिस्थितियों का सामना करता है जिनके लिए वह स्वयं जिम्मेदार नहीं होता। नतीजतन, जनसंवायें जनसुनवाइयां, जो कि लोकतांत्रिक संवाद का माध्यम होनी चाहिए, टकराव और अव्यवस्था का केंद्र बनती जा रही हैं।

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आज कोयला हो या अन्य खनिज, सभी ब्लॉकों की नीलामी प्रीमियम पर की जाती है। इनसे प्राप्त प्रीमियम, रॉयल्टी, जिला खनिज फाउंडेशन (DMF), एनएमईटी तथा विभिन्न उपकरों की राशि का उपयोग स्थानीय विकास के लिए किया जाना है। डीएमएफ निधि विशेष रूप से खनन प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल, स्वच्छता, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, कौशल विकास और रोजगार सृजन के लिए निर्धारित है। कई जिलों में डीएमएफ की राशि नियमित जिला योजना से भी अधिक है।

किसानों के लिए आर्थिक सुरक्षा का अवसर

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भूमि अधिग्रहण को लेकर व्याप्त भ्रांतियों के विपरीत, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 तथा राज्य पुनर्वास नीतियां आज अत्यंत उदार मुआवज़ा सुनिश्चित करती हैं। रायगढ़ जैसे जिलों में निजी भूमि के लिए मुआवज़ा सामान्यतः ₹35–45 लाख प्रति एकड़ तक मिलता है। यदि इस राशि को सुरक्षित बैंक या डाकघर योजनाओं में निवेश किया जाए तो इससे ₹2.5–3.2 लाख की वार्षिक ब्याज आय होती है, जो ₹20,000–26,000 प्रतिमाह के बराबर है।

यह कृषि से प्राप्त शुद्ध आय की तुलना में तीन से पांच गुना अधिक है और इसमें मौसम या बाज़ार का जोखिम नहीं होता। इसके अतिरिक्त, प्रभावित परिवारों को व्यापक पुनर्वास लाभ भी मिलते हैं। 300 से 600 वर्गमीटर के आवासीय भू‑खंड, मकान निर्माण सहायता, जीविकोपार्जन अनुदान, परिवहन सहायता, पुनर्वास अनुदान तथा रोजगार, एकमुश्त भुगतान या दीर्घकालिक पेंशन जैसे विकल्प। कई परिवारों के लिए यह आर्थिक सुरक्षा का ऐतिहासिक अवसर होता है।

जनसुनवाइयां लगातार बाधित हो रही हैं

इन सभी प्रावधानों के बावजूद हाल के वर्षों में जनसुनवाइयां लगातार बाधित हो रही हैं। तमनार में गेरे पेलमा सेक्टर‑1 कोयला ब्लॉक की जनसुनवाई के बाद की घटनाएं, एमडीओ मॉडल से जुड़े कोयला ब्लॉकों की निरस्त सुनवाइयां तथा विभिन्न राज्यों में सीमेंट और एल्यूमिनियम परियोजनाओं की जनसुनवाइयों का रद्द होना इस प्रवृत्ति को दर्शाता है। अक्सर सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों के स्थानीय नेता प्रारंभिक स्तर पर विरोध को बढ़ावा देते हैं, जो बाद में उग्र रूप ले लेता है।

इसमें वोट‑बैंक राजनीति, गलत सूचना और अतिरिक्त लाभ प्राप्त करने की कोशिशें भी शामिल हो जाती हैं। इसका परिणाम गंभीर है, निवेश का भरोसा कमजोर होता है, रोजगार के अवसर टलते हैं और स्थानीय समुदाय विकास लाभों से वंचित रह जाते हैं। वैधानिक प्रक्रियाओं को बार‑बार बाधित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

Chhattisgarh News Today:‘जनसुनवाइयों को कानूनी संरक्षण दिया जाए’

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अब आवश्यकता है कि केंद्र सरकार इस व्यवस्था में सुधार करे। सबसे पहले, नीलामी से पहले सभी यथासंभव स्वीकृतियां अनिवार्य की जाएं, ग्राम सभा परामर्श, भूमि सत्यापन और विभागीय अनापत्तियां। दूसरा, जनसुनवाइयों को कानूनी संरक्षण दिया जाए, विरोध के लिए निर्धारित क्षेत्र तय हों और सुनवाइयों अथवा परियोजना स्थलों में बाधा डालने पर कड़ी कार्रवाई हो। तीसरा, संगठित और बार‑बार होने वाले अवरोधों को रोकने के लिए प्रभावी जवाबदेही तंत्र बनाया जाए।

लोकतंत्र में विकास और असहमति दोनों का स्थान है, लेकिन विकास को सुनियोजित अराजकता का बंधक नहीं बनाया जा सकता। भारत की खनिज संपदा जनता की है और इसका जिम्मेदार दोहन, उचित मुआवज़ा, प्रभावी पुनर्वास और कानूनसम्मत परामर्श के साथ क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को सशक्त बना सकता है। नीलामी व्यवस्था को इस दिशा में सुधारने का यही सही समय है।

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