Drone Protection Shield : एयरपोर्ट, परमाणु संयंत्र, अंतरिक्ष केंद्र और तेल रिफाइनरी समेत देश के 370 से अधिक संवेदनशील प्रतिष्ठानों की सुरक्षां अब आसमान से आने वाले ड्रोन खतरों को ध्यान में रखकर और मजबूत की जाएगी। संदिग्ध ड्रोन की समय रहते पहचान व उसकी गतिविधियों पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर उसे निष्क्रिय करने की क्षमता बढ़ाने के लिए केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) ने ड्रोन फेडरेशन ऑफ इंडिया (डीएफआई) के साथ हाथ मिलाया है। दोनों मिलकर काउंटर-ड्रोन सिस्टम की तैनाती से लेकर जवानों की ट्रेनिंग और ड्रोन घटनाओं की फोरेंसिक जांच तक की व्यवस्था विकसित करेंगे।
सीआईएसएफ मुख्यालय में शुक्रवार को हुए कार्यक्रम में बल की ओर से डीआईजी एवं एमपीआरटीसी बहरोड़ के प्रिंसिपल डॉ. सी.डी. नायक और डीएफआई के अध्यक्ष स्मित शाह ने समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए। इस दौरान सीआईएसएफ महानिदेशक प्रवीर रंजन और अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। सीआईएसएफ महानिदेशक प्रवीर रंजन ने कहा कि इस साझेदारी से वास्तविक और लगातार बदलते ड्रोन खतरों के बीच बल अपनी मौजूदा सुरक्षा प्रणालियों और जवाबी कार्रवाई को परख सकेगा। वहीं डीएफआई अध्यक्ष स्मित शाह ने कहा कि सीआईएसएफ की जरूरतों को स्वदेशी ड्रोन तकनीक से जोड़कर आत्मनिर्भर सुरक्षा व्यवस्था तैयार करने पर काम किया जाएगा।
दरअसल, सुरक्षा एजेंसियों के सामने ड्रोन तेजी से नई चुनौती बनकर उभरे हैं। खासकर एयरपोर्ट, परमाणु और अंतरिक्ष प्रतिष्ठानों जैसे स्थानों के आसपास किसी अनधिकृत ड्रोन की मौजूदगी गंभीर सुरक्षा खतरा पैदा कर सकती है। ऐसे महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर हवाई खतरों से निपटने के लिए सीआईएसएफ को नोडल एजेंसी की जिम्मेदारी दी गई है। इसी के मद्देनजर बल अब अपनी ड्रोन और एंटी-ड्रोन क्षमता का विस्तार कर रहा है। सीआईएसएफ इस दिशा में पहले ही बड़े स्तर पर तैयारी शुरू कर चुका है। बल के 3,000 से अधिक कर्मियों को ड्रोन और एंटी-ड्रोन प्रोटोकॉल का विशेष प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जबकि करीब 80 यूनिटों में निगरानी, खतरे की पहचान और प्रशिक्षण के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया जा रहा है। ड्रोन तकनीक को सुरक्षा अभियानों से जोड़ने के लिए विशेषज्ञों की अलग टीम भी बनाई गई है।
नए समझौते के बाद सीआईएसएफ की सुरक्षा वाले प्रतिष्ठानों पर काउंटर-ड्रोन सिस्टम लगाने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी), तैनाती का ढांचा और पायलट प्रोजेक्ट तैयार किए जाएंगे। संदिग्ध ड्रोन मिलने या घुसपैठ की घटना होने पर उसकी गतिविधियों और तकनीकी पहलुओं की जांच के लिए स्वदेशी फोरेंसिक उपकरण और प्रक्रियाएं विकसित की जाएंगी। सबसे अहम पहल संयुक्त अभ्यास की होगी। सीआईएसएफ और डीएफआई ‘रेड-टीमिंग’ अभ्यास के जरिए वास्तविक खतरे जैसी परिस्थितियां तैयार कर यह जांचेंगे कि कोई संदिग्ध ड्रोन सुरक्षा घेरे में घुसने की कोशिश करे तो उसे कितनी जल्दी पहचाना और ट्रैक किया जा सकता है तथा उसके खिलाफ जवाबी कार्रवाई कितनी प्रभावी है। इसके आधार पर सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को भी दूर किया जाएगा।


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