Rajya Sabha: राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने शनिवार को वर्ष 2026 के द्विवार्षिक चुनावों में नवनिर्वाचित एवं नामनिर्देशित सदस्यों के लिए आयोजित दो दिवसीय विषयबोध कार्यक्रम ‘प्रारंभ’ का उद्घाटन किया। इस अवसर पर राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, राज्यसभा के महासचिव पी.सी. मोदी, अनेक सांसद तथा राज्यसभा सचिवालय के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत उपसभापति हरिवंश के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने कहा कि नए सांसद ऐसे समय में संसद में प्रवेश कर रहे हैं, जब देश ‘अमृत काल’ की यात्रा पर अग्रसर है। उन्होंने विश्वास जताया कि नव-निर्वाचित सदस्य ‘विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने सदस्यों को याद दिलाया कि संसद का दायित्व केवल कानून बनाना ही नहीं, बल्कि सरकार को जवाबदेह ठहराना, जनहित के मुद्दे उठाना, रचनात्मक आलोचना करना तथा नीतिगत सुझाव देना भी है। अपने उद्घाटन संबोधन में सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने नवनिर्वाचित सदस्यों को बधाई देते हुए बताया कि इस बार 67 सदस्य पहली बार राज्यसभा का हिस्सा बने हैं। उन्होंने कहा कि सप्ताहांत होने के बावजूद प्रशिक्षण कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति संसदीय दायित्वों के प्रति उनकी गंभीर प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
उन्होंने राज्यसभा को भारत के संघीय लोकतंत्र की आधारशिला बताते हुए कहा कि यह सदन विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों की आवाज़ों को राष्ट्रीय मंच प्रदान करता है। उन्होंने कहा, “हम एक दस्तावेज़-संविधान, एक दृष्टिकोण-राष्ट्र प्रथम और एक लक्ष्य-विकसित भारत 2047 से जुड़े हुए हैं।” सभापति ने संसदीय परंपराओं और लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर जोर देते हुए कहा कि किसी भी विषय पर मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं, लेकिन हर सांसद की सर्वोच्च प्रतिबद्धता संविधान और जनता के प्रति होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “वाद-विवाद, चर्चा या यहां तक कि व्यवधान भी निर्णयोन्मुखी होने चाहिए।” उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे व्यवधान, जो किसी सार्थक निष्कर्ष या निर्णय तक नहीं पहुंचाते, लोकतांत्रिक उद्देश्य की पूर्ति नहीं करते।
उन्होंने प्रश्नकाल और शून्यकाल को सांसदों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर बताते हुए कहा कि इनकी गरिमा और प्रभावशीलता बनाए रखना सभी सदस्यों की सामूहिक जिम्मेदारी है। साथ ही उन्होंने नियम 267 का उल्लेख करते हुए कहा कि इस नियम का प्रयोग केवल अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में और व्यापक सहमति के आधार पर ही किया जाना चाहिए। जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर बोलते हुए उन्होंने कहा, “चुनाव वोटों से जीते जाते हैं, लेकिन सम्मान जनसेवा से अर्जित होता है।” उन्होंने कहा कि संसद में पूछा गया प्रत्येक प्रश्न, पारित किया गया प्रत्येक कानून, बनाई गई हर नीति और प्रत्येक बहस करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत 2047 के विजन का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान पीढ़ी के सांसदों के पास देश को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का ऐतिहासिक अवसर है।
अपने संसदीय अनुभव साझा करते हुए राधाकृष्णन ने बताया कि लोकसभा सदस्य और वस्त्र संबंधी संसदीय उपसमिति के संयोजक के रूप में कार्य करते समय समिति की सिफारिशों के आधार पर प्रौद्योगिकी उन्नयन निधि योजना (टीयूएफएस) लागू की गई, जिसने देश के वस्त्र उद्योग के आधुनिकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि प्रश्नकाल, शून्यकाल या संसदीय समितियों में दिया गया छोटा-सा सुझाव भी बड़े नीतिगत बदलाव का कारण बन सकता है।
उन्होंने सदस्यों को संसदीय नियमों, विधायी प्रक्रियाओं, बजटीय व्यवस्था, समिति प्रणाली और संसदीय आचरण का गहन अध्ययन करने की सलाह दी। उन्होंने यह भी बताया कि वे स्वयं प्रत्येक बैठक से पहले दिनभर के कार्य और संबंधित नियमों का विस्तार से अध्ययन करते हैं। सभापति ने राज्यसभा सचिवालय द्वारा तैयार किए गए प्रशिक्षण कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि इसमें पहली बार आधुनिक आईटी टूल्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित कार्यशालाओं को भी शामिल किया गया है। उन्होंने बताया कि ‘वाणी सेतु’ जैसे एआई-संचालित प्लेटफॉर्म अब राज्यसभा में विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच वास्तविक समय में अनुवाद की सुविधा उपलब्ध करा रहे हैं।
उन्होंने नए सांसदों से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (एनएलपी) जैसी उभरती तकनीकों को अपनाने का आह्वान किया। अपने संबोधन के अंत में सी.पी. राधाकृष्णन ने सभी नवनिर्वाचित सदस्यों को सफल संसदीय जीवन और राष्ट्र निर्माण की दिशा में प्रभावी योगदान देने के लिए शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती सांसदों की सक्रिय भागीदारी, संसदीय मर्यादाओं के पालन और जनहित के प्रति समर्पण पर निर्भर करती है।



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