Safdarjung Tomb/ आशुतोष शांडिल्य : राजधानी के ऐतिहासिक सफदरजंग मकबरे के संरक्षण और सौंदर्यीकरण हो रहा है। वर्ल्ड मॉन्यूमेंट्स फंड (डब्ल्यूएमएफ) और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के सहयोग से चल रही इस पुनरुद्धार परियोजना का उद्देश्य स्मारक की मूल भव्यता को संरक्षित करना और पर्यटकों को बेहतर अनुभव प्रदान करना है। पुनरुद्धार कार्य में राजस्थान के धौलपुर का लाल बलुआ पत्थर उपयोग में लाया जा रहा है, जबकि जालियों और सीढ़ियों की मरम्मत के लिए राजस्थान के मकराना पत्थर का इस्तेमाल किया जा रहा है। एएसआई ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को अंतिम सितंबर से पहले पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
संरक्षण कार्य के तहत मकबरे के प्रथम तल की दीवारों, जालियों, प्लास्टर, सजावटी हिस्सों तथा अन्य क्षतिग्रस्त संरचनाओं की मरम्मत की जा रही है। परियोजना में ऐतिहासिक स्वरूप और पारंपरिक निर्माण तकनीकों को विशेष महत्व दिया गया है, ताकि स्मारक की मूल पहचान और वास्तुशिल्पीय विशेषताएं सुरक्षित रह सकें। कार्य पूरा होने के बाद पर्यटकों को मकबरा और इसकी दीवारें अधिक आकर्षक तथा अपने मूल स्वरूप के करीब दिखाई देंगी।
दीवारों को पारंपरिक तकनीकों से हो रहा संरक्षण कार्य
सफदरजंग मकबरे के दीवारों की मरम्मत और संरक्षण के लिए चुना, सुरखी, बेलगिरी, बबूल का गोंद, उड़द की दाल और बेल जैसे प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग किया जा रहा है। इसके अलावा राजस्थान और मध्य प्रदेश के अनुभवी कारीगरों की सेवाएं ली जा रही हैं, जो पारंपरिक पद्धति से संरक्षण कार्य को अंजाम दे रहे हैं।
एएसआई अधिकारियों के अनुसार, ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण में पारंपरिक सामग्री और तकनीकों का प्रयोग अधिक प्रभावी माना जाता है। ये प्राकृतिक तत्व न केवल इमारतों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में सहायक होते हैं, बल्कि तापमान और मौसम में होने वाले बदलावों से भी संरचना की रक्षा करते हैं।
अधिकारियों का कहना है कि यह परियोजना केवल मरम्मत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य देश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित करना भी है। कार्य पूरा होने के बाद सफदरजंग मकबरा अपनी पुरानी भव्यता के साथ पर्यटकों को दिल्ली के समृद्ध इतिहास और मुगल स्थापत्य कला की अनूठी झलक प्रदान करेगा।
दिल्ली के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल सफदरजंग मकबरा 18वीं शताब्दी की मुगल स्थापत्य कला का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। इसका निर्माण वर्ष 1754 में अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने अपने पिता तथा मुगल सम्राट मुहम्मद शाह के शक्तिशाली वजीर सफदरजंग की स्मृति में कराया था। मकबरे परिसर में सफदरजंग और उनकी बेगम की कब्रें स्थित हैं। इसे मुगल वास्तुकला की अंतिम भव्य कृतियों में से एक माना जाता है।



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