अनधिकृत कॉलोनी : भाजपा-आप सरकारों का नासमझी भरा निर्णय : लवली

Summary :

लवली की माने तो 1731 कॉलोनियों को नियिमत करने वाले मामले मेें 7-ए नामक कॉलम भी जोड़ा गया जिसके अंतर्गत आने वाली कॉलोनियों को मान्यता नहीं दी जाएगी, लेकिन दिल्ली की जनता इससे बेखबर है।

दिल्ली सरकार में शहरी विकास मंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके अरविंदर सिंह लवली ने अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने और लाखों निवासियों को मालिकाना हक मिलने की बात को महज चुनावी शगूफा करार दिया है। लवली की माने तो 1731 कॉलोनियों को नियिमत करने वाले मामले मेें 7-ए नामक कॉलम भी जोड़ा गया जिसके अंतर्गत आने वाली कॉलोनियों को मान्यता नहीं दी जाएगी, लेकिन दिल्ली की जनता इससे बेखबर है। 
लवली का दावा है कि बिना ले आउट प्लान तैयार किए इन कॉलोनियों का पूर्ण विकास संभव नहीं है। कच्ची कॉलोनियों के नियमितिकरण को लेकर आनन-फानन में की जा रही प्रक्रिया पर उन्होंने केन्द्र में बैठी भाजपा सरकार और दिल्ली की आम आदमी पार्टी (आप) सरकार को आड़े हाथ लिया। पेश है पंजाब केसरी से अरविंदर सिंह लवली की विशेष बातचीत…

दिल्ली में अनधिकृत कॉलोनियां नियमित किए जाने की प्रकिया शुरू हो चुकी है और रजिस्ट्री भी होने जा रही है। इस विषय में आप क्या कहना चाहेंगे?
सच बात यह है कि इस पूरे मामले में केन्द्र की भाजपा सरकार और इनके मंत्री ने ऐसा भ्रम पैदा कर दिया है कि पूरे मामले की खिचड़ी पक गई है। कॉलोनियों के बारे में बिना जाने एवं समझे निर्णय लिये गये, इस मुद्दे पर वहां के लोगों से चर्चा की जानी चाहिए थी। आप की सरकार तो केवल बयानबाजी के लिए ही रह गई है। यह दिल्ली की जनता का दुर्भाग्य है कि केन्द्र और दिल्ली दोनों की सरकार का हाल, ‘हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजाम ए गुलिस्तां क्या होगा’ वाला हो गया है। 
अनधिकृत कॉलोनी के निवासियों की ऐसी हालत इन दोनों पार्टी ने कर दी है। इन्हें यह समझना होगा कि ये कॉलोनी नियमित करने जा रहे हैं। देश में आजादी के बाद कई कॉलोनियों को नियमित किया गया है। 1971, 1977 और 1989 में भी कॉलोनियां पक्की की गईं। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय में नियमित हुई कॉलोनियों को सबसे बेहतर माना जाता है। 
सबसे बड़ी बात यह है कि संसद में कॉलोनियों को नियमित करने का प्रस्ताव लाया गया, दूसरा डीडीए नियमित थोड़े ही करेगा, कॉलोनियां तो राजस्व विभाग द्वारा पक्की होती हैं और सब रजिस्ट्रार करता है। नया काम शुरू कर दिया गया है। समझना होगा कि कच्ची कॉलोनी निवासियों की समस्या केवल रजिस्ट्री ही नहीं है।
तीन बार कांग्रेस की सरकार रही और शीला सरकार ने प्रोविजनल सर्टिफिकेट भी बांटे तो ऐसा क्या कारण है, जो कि कॉलोनियां पक्की न हो सकीं?
देखिए हमारे ऊपर बार-बार आरोप लगते हैं। केजरीवाल जी ने भी बयान दिया कि शीला सरकार ने प्रोविजनल सर्टिफिकेट बांटे थे। मुझे तकलीफ होती है बिना वास्तविकता के बयान जारी कर दिये जाते हैं। अगर किसी बात की जानकारी न हो तो उसकी गहराई में जाना चाहिए। हम लोगों की सरकार के समय वहां पर रोज बुलडोजर खड़े रहते थे। इसके बाद आरडब्ल्यूए से नक्शे मंगवाए गए थे जिसके आधार पर तोड़फोड़ रुकवाई गई थी। 
प्रोविजनल सर्टिफिकेट जारी करने के बाद कॉलोनियों में बिजली-पानी, सड़क और नालियों की व्यवस्था करवाई गई। मैंने अपने कार्यकाल 2012 में शहरी विकास मंत्री रहते हुए सीवर डाले जाने का निर्णय लिया था। मैं पूछना चाहता हूं कि जब कांग्रेस सरकार कॉलोनी नियमित किए जाने की प्रक्रिया लगभग पूरी कर चुकी थी  तो दिल्ली सरकार ने न जाने क्यों दोबारा प्रक्रिया नए सिरे से शुरू की। इनसे सवाल पूछा जाना चाहिए।
आपने कहा कि 180 दिन में यदि केन्द्र सरकार ले आउट की प्रक्रिया को पूरा कर लेती है तो मैं राजनीतिक जीवन से संन्यास ले लूंगा, ऐसा क्यों कहा?
मैंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि लोगों को गुमराह किया जा रहा है। कॉलोनी की बाउंड्री होने तक उसकी कोई सीमा ही नहीं है। सीमा तय होगी, ले आउट प्लान बनेगा और मकानों पर नंबर डाले जाएंगे। इसके बाद ही सब रजिस्ट्रार रजिस्ट्री करेगा। बिना प्लान के कुछ तय नहीं हो पाएगा। यह प्रक्रिया कम से कम छह माह की है। डीडीए कॉलोनी की फिजिकल वेरिफिकेशन भला कैसे कर सकता है। 180 दिनों की बात इसलिए की जा रही है जिससे आने वाले दिनों में चुनाव की अधिसूचना लागू हो जाएगी और मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा। 
सेक्शन 7-ए के कारण क्या कुछ कॉलोनियां नियमित होने की प्रक्रिया से बाहर हो जाएंगी?
यह पूरी प्रक्रिया अपने आप में बड़ी धोखेबाजी है। चुनाव के मद्देनजर लोगों की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास किया जा रहा है। एक तरफ आप 1731 कॉलोनियों के लोगों को मालिकाना हक देने की बात कर रहे हो और उन्हें उम्मीद जगा रहे हो। उसी कॉलम में एक पैरा जोड़ दिया गया 7-ए का, जो यह कहता है कि ओ-जोन, एएसआई, रीवर बेल्ट और हाईटेंशन के नीचे वाली भूमि पर बनी और राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़ी कॉलोनी नियमित नहीं होंगी। फिर यह स्पष्ट क्यों नहीं किया गया कि ऐसी कौन-कौन सी कॉलोनियां हैं। मेरे अनुसार ऐसी 40-45 फीसद तक कॉलोनियां हैं जिन पर 7-ए का प्रभाव रहेगा। हमारी पहली मांग है कि इसे तुरंत हटाया जाना चाहिए।  ऐसी सूची जारी होनी चाहिए कि 7-ए के तहत कौन-कौन सी कॉलोनियां हैं।
आम आदमी पार्टी की सरकार कहती है कि उन्होंने 2015 में केन्द्र के पास कॉलोनियों को पक्का किए जाने का प्रस्ताव भेजा था, इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
दिल्ली सरकार ने इस सारी प्रक्रिया का सत्यानाश केन्द्र सरकार को कॉलोनियों का प्रस्ताव भेजकर किया है। जो 2020 तक का मास्टर प्लान 2007 में आया था तो मनमोहन सिंह की सरकार ने सभी अधिकार शहरी विकास मंत्रालय और राजस्व विभाग को सौंप दिए थे। इस बारे में परिभाषा भी हमें ही तय करनी थी कि कौन सी कॉलोनी किस भूमि पर बनी हुई है। 895 कॉलोनी की अधिसूचना जारी की गई थी। 
मैं केजरीवाल सरकार से पूछना चाहता हूं कि जो बात-बात पर बोलते हैं कि केन्द्र सरकार काम नहीं करने देती है तो फिर ये केन्द्र सरकार के पास कच्ची कॉलोनियों के विषय में करने क्या गए थे। ये तो अपने अधिकार खुद केन्द्र को देने चले गए। 49 दिनों की सरकार में शहरी विकास मंत्रालय के सचिव ने ऑर्डर जारी किया था कि कॉलोनियों की चारदीवारी दिल्ली सरकार को बनानी है तो फिर 2015 में केन्द्र सरकार के पास क्या करने चले गए। सबसे बड़े गुनाहगार तो ये ही हैं।
आप दिल्ली के शहरी विकास मंत्री रह चुके हैं ऐसे मे इस मामले को किस दृष्टि से देखते हैं?
यह दो नासमझ सरकारों का नासमझी भरा निर्णय है। इन्हें पहले कॉलोनियों के स्टेक होल्डर को बुलाकर समस्याओं के बारे में पूछना चाहिए था। जनता के हितों को देखते हुए हम राजनीति नहीं करते। पूर्व सरकारों के मंत्रियों से रायशुमारी करनी चाहिए थी। कम से कम पूर्व अधिकारियों से सलाह-मशवरा तो करना चाहिए था। कॉलोनी वालों की समस्या बिल्कुल अलग है। ये शुरुआत में 100 रजिस्ट्री करने की बात कर रहे हैं, अधिक से अधिक 500 लोग आ जाएंगे। जो प्रक्रिया बनाई गई है उससे ज्यादा लाभ नहीं मिलेगा। 
सैनिक फार्म और अमलतास जैसी कॉलोनी में भी दस से पन्द्रह फीसद लोगों के पास रजिस्ट्री है। मालिकाना हक तो जनता को ही मिला ही हुआ है, जमीन तो जनता ने किसान या सेकेंड पार्टी से खरीदी है। विषय है निर्माण कार्य के लिए रोकटोक न हो और रिश्वत न देनी पड़े। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के समय में भी कॉलोनी पक्की की गई थीं। आजादी के बाद पहली बार कोई सरकार मालिकाना हक देने का संसद में बिल लेकर आयी है। आज भी दिल्ली में कई कॉलोनी में रजिस्ट्री होती हैं।
प्रभावित होने वाली विधानसभाएं-कॉलोनियां
इससे ओखला विधानसभा, आली विहार, बदरपुर विधानसभा की अधिकांश कॉलोनियां, खिड़की एक्सटेंशन, नेब सराय, छतरपुर की कॉलोनियां, सोनिया विहार, बुलंद मस्जिद शास्त्री पार्क, मुस्तफाबाद, घौंडा, करावल नगर, तुगलकाबाद किले के साथ जुड़ी कॉलोनियां एएसआई लैंड के कारण, संगम विहार कॉलोनी फॉरेस्ट लैंड के कारण नियमित नहीं हो पाएंगी। 
देवली, अंबेडकर नगर, नजफगढ़, मोहन पार्क, नगली में हाईटेंशन तारों के नीचे कॉलोनियां बसी हुई हैं। जब अक्षरधाम मंदिर और कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए क्लीयरेंस मिल सकती है तो फिर इन कॉलोनियों के साथ सौतेला व्यवहार क्यों किया जा रहा है।
जनता से कोई अपील या संदेश देना चाहेंगे?
मैं इन कालोनियों की जनता से यह कहना चाहूंगा कि इन दोनों सरकारों ने मोहम्मद बिन तुगलक की तर्ज पर तुगलकी फरमान जारी कर 500 कॉलोनियों को खतरे की दहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया है। जनता को चाहिए कि गुमराह करने वालों को कभी माफ न करे।

Desk Team