सैन्य-पुस्तक पर विवादों का बवंडर

Summary :

तो क्या यह मान लिया जाए सेना के भूतपूर्व अधिकारी अवकाश प्राप्त के बाद केवल गोल्फ-क्लब या ‘मिल्ट्री लिटरेचर फेस्टीवल तक ही सीमित रहेंगे? ऐसा नहीं है लेकिन अवकाश प्राप्त सेना-अधिकारी भी संयम व गरिमा बनाए रखें तो उन्हें ही बेहतर प्रतिष्ठा मिलेगी। हाल ही में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल रहमान-नरवणे की एक प्रकाशनाधीन पुस्तक ‘फोर स्टार्स डेस्टिनी के प्रकाशन पर प्रतिरक्षा मंत्रालय ने फिलहाल रोक लगा रखी है। प्रतिरक्षा मंत्रालय गत एक वर्ष से इस पुस्तक की समीक्षा कर रहा है। कुछेक वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, ऐसी पुस्तकों में यदि कुछ संवेदनशील सामग्री है तो उसकी जांच के बिना उसे…

तो क्या यह मान लिया जाए सेना के भूतपूर्व अधिकारी अवकाश प्राप्त के बाद केवल गोल्फ-क्लब या ‘मिल्ट्री लिटरेचर फेस्टीवल तक ही सीमित रहेंगे? ऐसा नहीं है लेकिन अवकाश प्राप्त सेना-अधिकारी भी संयम व गरिमा बनाए रखें तो उन्हें ही बेहतर प्रतिष्ठा मिलेगी।
हाल ही में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल रहमान-नरवणे की एक प्रकाशनाधीन पुस्तक ‘फोर स्टार्स डेस्टिनी के प्रकाशन पर प्रतिरक्षा मंत्रालय ने फिलहाल रोक लगा रखी है। प्रतिरक्षा मंत्रालय गत एक वर्ष से इस पुस्तक की समीक्षा कर रहा है। कुछेक वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, ऐसी पुस्तकों में यदि कुछ संवेदनशील सामग्री है तो उसकी जांच के बिना उसे प्रकाशित नहीं किया जाना चाहिए। यह पुस्तक वस्तुत: आत्मकथा है मगर जनरल नरवणे, जिस सर्वोच्च सैनिक पद पर रहे हैं, जाहिर है उस पद पर रहते हुए अनेक महत्वपूर्ण दस्तावेज उनके सामने से गुजरे होंगे। ऐसा नहीं कि उक्त प्रकाशनाधीन पुस्तक पर कोई प्रतिबंध लगाया गया है लेकिन प्रकाशन के पूर्व ही प्रतिपक्षी नेता राहुल गांधी ने सदन में पुस्तक के कुछ अंशों को लेकर हंगामा खड़ा किया, वह भी उचित नहीं ठहराया जा सकता।
इससे पूर्व भी अवकाश प्राप्त सेनानायकों की अनेक पुस्तकें प्रकाशित की हुई हैं और विवादों के केंद्र में भी रही हैं। ऐसी ही कृति एक अवकाश प्राप्त मेजर जनरल वीके सिंह की एक कृति ‘इंडियाज़ एक्सटर्नल: सीक्रेट्स आफ रिसर्च एंड एनेलिसिस वर्ष 2007 में प्रकाशित हुई थी। उस पुस्तक को लेकर जनरल वीके सिंह के विरुद्ध सीबीआई ने ‘सरकारी गुप्त सूचना-कानून (ओएसए) के अंतर्गत मुकदमा भी दर्ज कर लिया था। मेजर जनरल वर्ष 2004 तक चार वर्ष की अवधि के लिए ‘रॉ में कार्यरत भी रहे थे। उनकी इस पुस्तक में अनेक ऐसे गुप्त दस्तावेज़ों की भी चर्चा है जिन्हें सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए था। जनरल के गुरुग्राम स्थित आवास से सीबीआई ने अनेक ‘गुप्त दस्तावेज भी बरामद किए और उनका पासपोर्ट भी जब्त कर लिया गया।
यद्यपि अधिकृत रूप में अभी कुछ भी नहीं कहा गया है लेकिन सामान्य रूप में यही माना जाता है कि अनेक संवेदनशील एवं अति महत्वपूर्ण पदों पर रहने वाले सैन्य-अधिकारियों को अवकाश प्राप्ति के बाद भी राष्ट्रपति से जुड़ी सामग्री को सार्वजनिक करने से परहेज रखना चाहिए।
मेजर जनरल वीके सिंह (रिटायर्ड) की पुस्तक का विवाद अभी भी निपटा नहीं है, जबकि यह सर्वविदित है कि ‘सेना-सेवा नियम-1954 की धारा 21 के अनुसार, सेना में सेवारत अधिकारियों पर बिना सरकारी अनुमति कुछ भी सार्वजनिक करने पर प्रतिबंध है लेकिन रिटायर्ड अधिकारियों पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है मगर विशेषज्ञों का कहना है कि कुछेक नियम, परम्परा व सैन्य-सभ्याचार से भी जुड़े होते हैं, इसलिए सेवारत रहते हुए या रिटायर होने के बाद भी कुछ आचार संहिताओं का पालन कर लेना चाहिए। सैन्य सेवा के साथ अक्सर राष्ट्र के अनेक महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील मामले जुड़े होते हैं, उन्हें सामान्य या सतही रूप में सार्वजनिक करना भी राष्ट्र-हित में नहीं होगा।
इसी शृंखला में कुछ अन्य प्रकाशनों पर भी पुनर्विचार का क्रम जारी है लेकिन ‘विवादास्पद अथवा संवेदनशील सामग्री को सार्वजनिक करने की छूट पर अभी भी बहस जारी है। यद्यपि विवादास्पद सामग्रियां प्रकाशन से पूर्व ही सार्वजनिक हो जाती हैं और उनका सियासी उपयोग करने का लोभ संवरण कुछ राजनेता नहीं कर पाते। उनके लिए ऐसी सामग्री राजनीतिज्ञों के लिए एक हथियार बन जाती है, मगर उन्हें भी यह सोचना होगा कि राष्ट्र-हित दलगत हितों से कहीं ऊपर होता है। ऐसी सनसनी के आधार पर सिर्फ दो-चार दिन खबरें छपती हैं, मगर इससे राजनेताओं को भी कोई दूरगामी लाभ नहीं पहुंच पाता।
अतीत में ‘जीप-स्केंडल, ‘ताबूत स्कैंडल आदि अनेक विवाद भी उछले, मगर उनका कोई स्थायी प्रभाव दिखाई नहीं दिया। बेहतर है सत्तापक्ष व प्रतिपक्ष, दोनों ही राष्ट्र-हित को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।
अवकाश प्राप्त सैनिक अधिकारियों को यह भी शायद स्मरण रहता होगा कि उन्हें अन्य वीर जवानों के लिए कैंटीन व्यवस्था व चिकित्सा सुविधाएं सेवानिवृत्ति के बाद भी सम्मान के रूप में जारी रहती हैं।
अब तो उसी सम्मान के मद्देनजर ‘दिल्ली-कैंट व कुछ अन्य स्थलों के नाम भी वीर जवानों की स्मृति को ही समर्पित कर दिए गए हैं। दुर्गम स्थलों पर उनके लिए हर संभव सुविधाएं जुटाना भी हमारा राष्ट्र अपना दायित्व समझता है। यह सब एक कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से सेवा व समर्पण के प्रतीक हैं। इनके अतिरिक्त भी समय पूर्व अवकाश प्राप्ति के बाद उन्हें बैंकों व अन्य सार्वजनिक संस्थानों में भी प्राथमिकता के आधार पर सेवा-अवसर मिल जाते हैं।
सेना के एक प्रवक्ता के अनुसार, भारतीय सेना ने 246 सड़कों के नामों से पूर्ववर्ती बर्तानवी सरकारों द्वारा दिए गए नाम बदल दिए हैं।
अम्बाला छावनी में पैटर्सन रोड क्वाटर्रज का नाम ‘धनसिंह थापा-एन्क्लेव रख दिया गया है। दिल्ली छावनी में एक सड़क का नाम ऊरूशा खेत्रपाल मार्ग रखा गया है। मथुरा छावनी में एक सड़क का नाम ‘अब्दुल हमीद लाइन्स रखा गया है। कुल मिलाकर 124 सड़कों के नाम वीर जवानों की स्मृतियों को समर्पित किए गए हैं जबकि 77 सैन्य-आवास कॉलोनियों के नाम भी दिवंगत सेनानायकों की स्मृतियों को समर्पित किए गए हैं जबकि 27 भवनों, 18 पार्कों व खेल-मैदानों के नाम भी वीर सैनिकों को समर्पित किए गए हैं।
ऐसे माहौल में यदि अग्रणी पूर्व सेनानायक सेना की सेवा को विवादों में घसीट लेते हैं तो सेना की गरिमा पर कुछ खरोंचें तो आएंगी।

Dr. Chander Trikha