सिख धर्म के पांच तख्तों में से एक, तख्त सचखंड श्री हजूर अबचल नगर साहिब, नांदेड़ का स्थान सिख इतिहास और धार्मिक परंपराओं में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह वह पवित्र स्थान है जहां दशम पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने अपने जीवन का अंतिम समय व्यतीत किया और श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को जीवित गुरु के रूप में मान्यता प्रदान की। ऐसे ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले स्थान की प्रबंधकीय व्यवस्था केवल प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि करोड़ों सिखों की आस्था, सम्मान और धार्मिक अधिकारों से जुड़ा संवेदनशील मामला है। आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब श्री हजूर साहिब गुरुद्वारा बोर्ड की बहाली को लेकर न्यायालय के निर्देश सामने आ चुके हैं, तो महाराष्ट्र सरकार इस प्रक्रिया को पूरा करने में देरी क्यों कर रही है? आखिर ऐसी कौन-सी प्रशासनिक या राजनीतिक बाधा है, जिसके कारण सिख समाज को अपने धार्मिक संस्थान के प्रबंधन के लिए बार-बार आवाज उठानी पड़ रही है? श्री हजूर साहिब गुरुद्वारा बोर्ड की प्रबंधकीय व्यवस्था लंबे समय से विवादों और चर्चाओं का विषय रही है। बोर्ड के संचालन में सरकारी हस्तक्षेप, प्रशासनिक नियुक्तियों और सिख प्रतिनिधित्व को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। श्री हजूर साहिब के जत्थेदार ज्ञानी कुलवंत सिंह सहित पांच प्यारे सिंह साहिबान भी कई बार प्रस्ताव पास कर सरकार को भेज चुके हैं कि तख्त साहिब के प्रबन्ध की जिम्मेवारी 17 सदस्यी बोर्ड और उसके द्वारा चयनित प्रधान के द्वारा ही की जानी चाहिए जिन्हें सिख धर्म की मर्यादा और परंपरा की पूरी तरह से जानकारी रहती है मगर न जाने क्यों सरकार इसमें दखलंदाजी कर किसी भी शख्स को इसकी जिम्मेवारी सौंपने की सोच रखती है। सरकार को चाहिए कि बिना देरी के तख्त सचखंड श्री हजूर साहिब का प्रबन्ध बोर्ड को सौंप देना चाहिए, अगर राजनीति पक्ष को ध्यानपूर्वक देखें तो पंजाब की राजनीति में भी इस मुद्दे की गूंज सुनाई दे सकती है। पंजाब में सिख धार्मिक संस्थाओं, तख्त साहिबान और गुरुद्वारा प्रबंधन से जुड़े विषयों का विशेष महत्व रहा है, यदि महाराष्ट्र सरकार सिख समाज की भावनाओं के अनुरूप समय रहते उचित कदम नहीं उठाती तो इसका राजनीतिक संदेश पंजाब तक पहुंचना स्वाभाविक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेतृत्व ने अनेक अवसरों पर सिख गुरुओं की शिक्षाओं, सिख इतिहास और समाज के योगदान के प्रति सम्मान व्यक्त किया है। श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के शहीदी पर्व तथा श्री गुरु गोबिंद सिंह जी से जुड़े ऐतिहासिक आयोजनों के माध्यम से भी सिख विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता दी गई है, ऐसे में यह अपेक्षा और बढ़ जाती है कि धार्मिक सम्मान केवल भाषणों और आयोजनों तक सीमित न रहे, बल्कि सरकारी निर्णयों और प्रशासनिक कार्यप्रणाली में भी दिखाई दे। सिख समाज के लिए सम्मान का वास्तविक अर्थ केवल ऐतिहासिक कार्यक्रम आयोजित करना नहीं, बल्कि उसके धार्मिक संस्थानों की गरिमा, मर्यादा और प्रबंधकीय अधिकारों का सम्मान करना भी है। बोर्ड की बहाली के साथ-साथ उसकी भविष्य की कार्यप्रणाली को लेकर स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए। सरकार के सामने अवसर है कि वह इस संवेदनशील मुद्दे का समाधान टकराव के बजाय संवाद और कानून सम्मत कार्रवाई के माध्यम से यदि सरकार समय रहते सकारात्मक निर्णय लेती है, तो इससे न केवल सिख समाज में विश्वास बढ़ेगा, बल्कि यह संदेश भी जाएगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में धार्मिक भावनाओं और न्यायिक निर्देशों का सम्मान सर्वोपरि है। अंततः सवाल केवल श्री हजूर साहिब गुरुद्वारा बोर्ड की बहाली का नहीं, बल्कि इस बात का है कि क्या सरकार सिख समाज की धार्मिक स्वायत्तता, ऐतिहासिक विरासत और संवैधानिक अधिकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को व्यवहार में सिद्ध करने के लिए तैयार है? महाराष्ट्र सरकार को अब शब्दों से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने चाहिए।
42 साल बाद भी सिखों को इंसाफ का इंतजार : इतिहास के पन्नों पर कुछ ऐसी घटनाएं दर्ज होती हैं, जिनका दर्द समय बीतने के साथ कम होने के बजाय और गहरा होता जाता है। 1984 में सिखों का कत्लेआम भी भारतीय इतिहास का ऐसा ही एक काला अध्याय है जिसे 42 साल बीत जाने के बाद भी भुलाया नहीं जा सकता। हर साल जब नवंबर का महीना आता है तो हजारों निर्दोष सिखों की चीखें, उजड़े परिवारों की पीड़ा और न्याय की प्रतीक्षा में बूढ़ी हो चुकी आंखें एक बार फिर सवाल खड़े करती हैं कि आखिर इन पीड़ितों को इंसाफ कब मिलेगा? पीड़ित परिवारों में तीसरी चौथी पीड़ी आ चुकी है और ज्यादातर पीड़ित इन्साफ का इन्ताज करते हुए संसार को अलविदा कह चुके हैं मगर फिर भी उन्हें इन्साफ नहीं मिल पाया। सबसे दु:खद पहलू यह है कि जिस समय देश में यह सब हुआ, उस समय राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह थे जो स्वयं एक सिख थे। यह तथ्य अपने आप में उस त्रासदी की गंभीरता को और बढ़ा देता है। सिख राष्ट्रपति के कार्यकाल में सिख समुदाय के हजारों लोगों का इस तरह मारा जाना भारतीय व्यवस्था के सामने एक ऐसा सवाल छोड़ गया, जिसका नैतिक उत्तर आज भी देश को तलाशना है। सिख समुदाय ने इतिहास में अनेक कठिन दौर देखे हैं। मुगल शासन के समय सिख गुरुओं और उनके अनुयायियों ने धार्मिक स्वतंत्रता, मानवता और न्याय की रक्षा के लिए असहनीय यातनाएं सहीं। वर्ष 1947 में देश के विभाजन के दौरान भी पंजाब की धरती ने भयानक रक्तपात और विस्थापन का दर्द झेला। उस समय भी असंख्य सिख परिवार उजड़े और हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई। लेकिन वर्ष 1984 की त्रासदी का घाव इसलिए भी गहरा है कि इसमें सिखों को उन लोगों की हिंसा का सामना करना पड़ा, जिन्हें वह अपना मानते थे। दंगाइयों को देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो उन्हें हुक्म देने वालों ने सिर्फ पगड़ी देखकर कत्लेआम करने को कहा गया था। कुछ सिख नेताओं ने पीड़ितों को इन्साफ दिलाने का बीड़ा उठाया और आज तक संघर्ष करते आ रहे हैं। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के पूर्व सदस्य गुरलाद सिंह काहलो जैसे अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं की भूमिका भी उल्लेखनीय रही है, जिन्होंने पीड़ितों को कानूनी लड़ाई में मदद की। हाल ही में एक संगोष्ठी में गुरलाद सिंह काहलो ने एक नवंबर को 1984 की हिंसा में मारे गए निर्दोष सिखों की स्मृति में हर घर में एक दीप जलाने की अपील की। यह अपील केवल श्रद्धांजलि का आह्वान नहीं है, बल्कि उन परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करने का संदेश भी है, जिनके घाव आज तक नहीं भरे हैं। इसी प्रकार कुलदीप सिंह भोगल भी 1984 के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए दिल्ली और कानपुर आदि शहरों मे काम करते आ रहे हैं।
ननकाना साहिब विश्वविद्यालय के अंतर्राष्ट्रीय सलाहकार बोर्ड से सिख जगत की उम्मीदें : पाकिस्तान स्थित बाबा गुरु नानक विश्वविद्यालय, ननकाना साहिब ने अंतर्राष्ट्रीय सलाहकार बोर्ड के कार्यक्षेत्र का विस्तार करते हुए आठ नए सदस्यों को शामिल किया है जिसमें भारत, अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा से जुड़े शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञों को स्थान दिया गया है। इनमें दिल्ली से शिरोमणि अकाली दल दिल्ली के प्रधान परमजीत सिंह सरना भी शामिल हैं। बोर्ड का उद्देश्य विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा के स्तर को बेहतर बनाना, अंतर्राष्ट्रीय शैक्षणिक सहयोग बढ़ाना, शोध परियोजनाओं को प्रोत्साहित करना, विद्यार्थियों के लिए नए अवसर उपलब्ध कराना और विश्वविद्यालय के विकास के लिए सहयोग जुटाना है। ननकाना साहिब केवल एक ऐतिहासिक स्थान नहीं, बल्कि सिख जगत की आस्था और गुरु नानक देव जी की महान विरासत का प्रतीक है, इसलिए यहां स्थापित विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी भी विशेष है। उसे आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ पंजाबी भाषा, गुरमुखी लिपि, सिख इतिहास और गुरमत अध्ययन को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय सलाहकार बोर्ड का गठन एक सकारात्मक पहल हो सकता है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता सदस्यों की सूची से नहीं, बल्कि उनके काम और परिणामों से तय होगी। विश्वविद्यालय को पारदर्शिता, जवाबदेही और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए। सिख जगत को उम्मीद करनी चाहिए कि यह पहल केवल औपचारिकता बनकर न रह जाए। यही गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं और उनकी विरासत के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता होगी।
श्री हजूर साहिब बोर्ड बहाली में देरी से सरकार की मंशा पर सवाल
Summary :
सिख धर्म के पांच तख्तों में से एक, तख्त सचखंड श्री हजूर अबचल नगर साहिब, नांदेड़ का स्थान सिख इतिहास और धार्मिक परंपराओं में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह वह पवित्र स्थान है जहां दशम पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने अपने जीवन का अंतिम समय व्यतीत किया और श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को जीवित गुरु के रूप में मान्यता प्रदान की। ऐसे ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले स्थान की प्रबंधकीय व्यवस्था केवल प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि करोड़ों सिखों की आस्था, सम्मान और धार्मिक अधिकारों से जुड़ा संवेदनशील मामला है। आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब…


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