दक्षिणी अमेरिकी या लैटिन अमेरिकी महाद्वीप के महत्वपूर्ण देश ब्राजील में जिस तरह चौथी बार वहां के राष्ट्रपति ‘लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा’ को विजय प्राप्त हुई है उससे अमेरिकी राष्ट्रपति श्री डोनाल्ड ट्रम्प की इस महाद्वीप में शक्ति निश्चित रूप से कम हुई है क्योंकि पिछले 18 महीने के दौरान लैटिन अमेरिका के सात देशों में दक्षिणपंथी शक्तियों के प्रतीक नेताओं को भारी सफलता मिली है। श्री लूला वामपंथी राष्ट्रीय शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं अतः उनकी जीत से ट्रम्प की इस महाद्वीप खासकर ब्राजील के बारे में योजनाओं को धक्का पहुंचा है।
ब्राजील में कच्चे पैट्रोलियम तेल व मुश्किल से उपलब्ध होने वाले खनिजों की भारी सम्पदा है जिसकी वजह से ट्रम्प की निगाह इस देश पर गड़ी हुई थी। ऐसे विरल खनिजों की सुलभता के लिए अमेरिका चीन पर आश्रित रहता है इसलिए ट्रम्प चाहते थे कि ब्राजील में अमेरिका के पक्ष में झुकी हुई दक्षिणपंथी पार्टी के नेता श्री बोल्सोनारो चुनाव जीतें मगर ऐसा हो नहीं सका। ब्राजील की चुनाव प्रणाली के अनुसार राष्ट्रपति चुनाव प्रत्यक्ष मतदान वरीयता क्रम में दो दौर में होता है।
पहले दौर में श्री लूला को बोल्सोनारो से 2 प्रतिशत मत कम मिले थे मगर गत रविवार को जब दूसरे दौर का मतदान हुआ तो लूला को 51.8 प्रतिशत और बोल्सोनारो को 48.2 प्रतिशत मत मिले। जबकि पहले दौर में लूला बोल्सोनारो के 47 प्रतिशत मतों के मुकाबले 45 प्रतिशत मत पाकर पिछड़ गये थे। 1985 के बाद यह पहला मौका है जब पहले दौर में पिछड़े प्रत्याशी ने दूसरे दौर के चुनावों में मात दी हो। 1985 तक ब्राजील में सैनिक शासन था। 81 वर्षीय श्री लूला ब्राजील के ऐसे राष्ट्रपति हैं जो बचपन में जूता पालिश करके अपनी गरीबी में गुजारा करते थे।
युवा होने पर उन्होंने वामपंथी राजनीतिक विचारों से प्रेरित होकर अपनी राजनीति की शुरूआत की और जनता के दिलों में अपनी जगह बनाई। प्रथम दौर के चुनावों के बाद यह माना जा रहा था कि श्री बोल्सोनारो चुनाव जीत जायेंगे मगर दूसरे दौर के चुनाव में जनता ने बाजी पलट दी और श्री लूला को जिता दिया। हालांकि ब्राजील में बोल्सोनारो के पिता भी राष्ट्रपति रह चुके हैं। उनके शासन के दौरान ब्राजील की नीतियां अमेरिका परस्त भी हो गई थीं। मगर चार वर्ष पहले दक्षिणपंथी सीनियर बोल्सोनारो ने ब्राजील में तख्ता पलट का प्रयास किया था जिसकी वजह से उन्हें जेल जाना पड़ा।
मगर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बोल्सोनारो के परिवार को सहारा दिया और दक्षिणपंथी शक्तियों को मजबूती देने का प्रयास भी किया। ब्राजील लैटिन अमेरिका की सबसे तेज गति से विकसित होने वाली अर्थव्यवस्था का देश है और ब्रिक्स संगठन के संस्थापक सदस्य देशों में से एक है। 2006 में स्थापित ब्रिक्स संगठन के गठन का उद्देश्य अमेरिका व पश्चिमी यूरोपीय देशों के विश्व आय स्रोतों पर चल रहे कब्जे में सन्तुलन लाना था परन्तु श्री लूला को ऐसे समय अपने देश में विजय मिली है जब अमेरिका के साथ पश्चिमी यूरोपीय देशों जैसे जर्मनी व फ्रांस में दक्षिण पंथियों की ताकत बढ़ रही है और लैटिन अमेरिका के भी महत्वपूर्ण देशों जैसे चिली, अर्जेंटीना व पेरू में भी ये शक्तियां ही राज कर रही हैं।
श्री लूला की विजय से एक तरफ जहां चीन व रूस जैसे देशों को ढांढस बंधा है वही पूर्व गुटनिरपेक्ष देशों या दक्षिण के राष्ट्रों को भी संबल मिला है। ब्राजील गुटनिरपेक्ष संगठन का भी महत्वपूर्ण देश रहा है। श्री लूला की नीतियां अमेरिका की आर्थिक साम्राज्यवादी नीतियों से उलट रही हैं इसीलिए ट्रम्प ने इस देश पर 50 प्रतिशत आयात शुल्क दरें लागू करने की घोषणा की थी। श्री लूला ने ट्रम्प की इस शुल्क नीति का जमकर विरोध किया था जहां तक भारत का सम्बन्ध है तो ब्राजील के साथ इसके सम्बन्ध बहुत मधुर रहे हैं और पूरे लैटिन अमेरिका में यह उसका सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है।
वर्ष 2025 में दोनों देशों के बीच 15 अरब 21 करोड़ का कारोबार हुआ था जिसे अगले पांच साल में 20 अरब डाॅलर करने का लक्ष्य है। इसके साथ ही ब्राजील ने सुरक्षा परिषद में भारत को स्थायी सदस्यता देने का भी शुरू से समर्थन किया है और श्री लूला भारत के पक्ष में समय-समय पर बोलते रहे हैं। मगर ब्राजील के अलावा दूसरा अजूबा पूर्वी यूरोप के देश सर्बिया में हुआ है जहां विद्यार्थियों या जेन-जी के आन्दोलनकारियों ने सत्ता पर अपना कब्जा चुनावों के जरिये बना लिया है। स्टूडेंटलिस्ट नाम की उनकी पार्टी ने 14 साल से सत्ता पर काबिज राष्ट्रपति अलेक्जेंडर को बुरी तरह पराजित कर दिया है जबकि युवा छात्रों का कोई घोषित नेता भी नहीं है।
अलेक्जेंडर बुविच भी दक्षिणपंथी पार्टी के नेता थे और अमेरिका के समर्थक समझे जाते थे। सर्बिया वही देश है जिसके नेता कभी गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के मसीहा युगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टीटो हुआ करते थे परन्तु सोवियत संघ का जब विघटन हुआ तो उसके कुछ साल बाद ही युगोस्लाविया को भी पश्चिमी शक्तियों ने कई देशों में विभक्त कर दिया। सर्बिया उनमें सबसे बड़ा देश है।
इस देश में इस राजनीतिक बदलाव को चुनावों के जरिये मूक क्रान्ति समझा जा रहा है क्योंकि पिछले दो वर्षों से छात्र यहां बेहतर सुविधाओं को लेकर आन्दोलनरत थे। हालांकि बुविच को रूसी राष्ट्रपति श्री पुतिन का समर्थन प्राप्त था परन्तु बुविच को करारी शिकस्त का सामना इसके बावजूद करना पड़ा। इस प्रकार इन दोनों देशों की घटनाओं को देखकर लगता है कि लोगों में अब दक्षिणपंथी झुकाव के प्रति नीरसता पैदा हो रही है।


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