यह न फ्रांस है, न बांग्लादेश

Summary :

वैसे तो यूरोप के कई देशों में असंतोष फैल गया है, पर फ्रांस की स्थिति विशेष तौर पर अराजक है। पेरिस से शुरू हुए हिंसक प्रदर्शन सारे देश में फैल चुके हैं। लाखों सड़कों पर हैं। ख़तरनाक नारा है, “अगर हम जलेंगे तो तुम भी साथ जलोगे”। जगह-जगह आगजनी हो रही है। हाई ब्रैंड की दुकानें लूटी जा चुकी हैं। प्रदर्शन फ्रांस के हाई स्कूलों की बुरी हालत को लेकर शुरू हुए थे, पर शीघ्र ही यह महंगाई और कठिन दैनिक जीवन और ईंधन की बढ़ती कीमतों को लेकर एक विशाल आंदोलन में बदल गए। छात्रों के साथ प्रवासी और…

वैसे तो यूरोप के कई देशों में असंतोष फैल गया है, पर फ्रांस की स्थिति विशेष तौर पर अराजक है। पेरिस से शुरू हुए हिंसक प्रदर्शन सारे देश में फैल चुके हैं। लाखों सड़कों पर हैं। ख़तरनाक नारा है, “अगर हम जलेंगे तो तुम भी साथ जलोगे”। जगह-जगह आगजनी हो रही है। हाई ब्रैंड की दुकानें लूटी जा चुकी हैं। प्रदर्शन फ्रांस के हाई स्कूलों की बुरी हालत को लेकर शुरू हुए थे, पर शीघ्र ही यह महंगाई और कठिन दैनिक जीवन और ईंधन की बढ़ती कीमतों को लेकर एक विशाल आंदोलन में बदल गए। छात्रों के साथ प्रवासी और दूसरे असंतुष्ट शामिल हो गए जिन्हें सम्भालना फ्रांस की सरकार के लिए बहुत कठिन हो रहा है। एक प्रकार से सत्ता को ही चुनौती दी जा रही है। उनके शिक्षा मंत्री का कहना है कि दो दर्जन स्कूल जला दिए गए हैं। आगजनी के डर से लूव्रजहां मोना लीज़ा की प्रसिद्ध पेंटिंग भी है, जैसे संग्राहलय बंद कर दिए गए हैं।
बेल्जियम, इटली, अल्बानिया, पुर्तगाल सब में भारी तनाव है। एक कारण है वहां भारी संख्या में प्रवासी है। विशेष तौर पर मुस्लिम प्रवासी समाज के हाशिया पर हैं। रोज़गार नहीं मिलता और आम समाज उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं देता जिससे वह भड़क जाते हैं, लेकिन यूरोप के संकट का यही कारण नहीं। असली कारण है कि रोज़मर्रा की ज़िन्दगी मुश्किल होती जा रही है। एक सर्वेक्षण के अनुसार 80% फ्रांसीसी अपने भविष्य को लेकर निराश हैं। द इकानिमिस्ट के अनुसार “आर्थिक परेशानियां भी जनाक्रोश की बड़ी वजह है”। एक और बड़ा कारण बढ़ती असमानता है जैसे सट्रासबर्ग के छात्र ह्यूगो वैटरल ने कहा है, “हमारे और इलीट (कुलीन वर्ग) के बीच बहुत फ़ासला है”। यह ईर्ष्या और टकराव पैदा करता है।
क्या फ्रांस और यूरोप के देशों का घटनाक्रम भारत में दोहराया जा सकता है ? या यहां बांग्लादेश जैसा ‘रिजीम चेंज’ हो सकता है, जैसे स्टूडेंट लीडर नेहा बोरा ने चाहा है? भारत-फ्रांस नहीं है। फ्रांस का लम्बा क्रान्तिकारी इतिहास है। जुलाई 14, 1789 को पेरिस के हथियारबंद लोगों ने कुख्यात बेस्टिल जेल पर हमला किया था जो फ्रांसीसी क्रांति की शुरूआत थी। तब से लेकर कुछ-कुछ अंतराल के बाद वहां प्रदर्शन होते रहते हैं। हमारे साथ समानता है कि शिक्षा की हालत यहां भी ख़स्ता है, यहां भी महंगाई है। भारी असमानता है। पर यह तुलना यहां ही ख़त्म होती है। हमारा इतिहास और फ्रांस का इतिहास अलग है, यहां कभी क्रान्ति नहीं आई, न ही यह सफल होगी। अंग्रेज़ों से हमने आज़ादी अहिंसक आंदोलन से जीती थी। जेल भर-भर कर, लाठियां खा-खा कर। भगत सिंह और चन्द्रशेखर आजाद जैसे क्रान्तिकारियों का योगदान था। वह युवाओं को प्रेरित करते रहे, पर आम लोग खून-ख़राबे, आगजनी और अराजकता को पसंद नहीं करते। हमारे लोगों में बहुत धैर्य है। बर्दाश्त करने की बड़ी सीमा है, जो ज़रूरी नहीं कि अच्छी बात है। जयप्रकाश नारायण ने ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ का नारा दिया था। शुरू में बहुत समर्थन मिला, पर आख़िर में सरकार बदली तो किसी क्रान्ति के द्वारा नहीं, बैलट बॉक्स के द्वारा।
अगस्त 2024 में बांग्लादेश में छात्रों ने शेख हसीना की सरकार के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन कर उन्हें देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। 1400 लोग मारे गए। शेख मुजीबुर रहमान का निवास तक आग की भेंटकर दिया गया। अगले ही साल 2025 में यह घटनाक्रम नेपाल में दोहराया गया जहां हिंसक छात्रों ने अपनी सरकार का तख्ता पलट दिया। क्या यह सब 2026 -2027 में भारत में हो सकता है? क्या यहां ‘रिजीम चेंज’ हो सकता है? इसका जवाब साफ़ तौर पर ‘नहीं’ है।
शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के नेता संजय राउत ने एक पोस्ट डाली है। उनके अनुसार यूरोप के देश अल्बानिया में प्रदर्शनकारियों ने सुप्रीम कोर्ट को इसलिए जला दिया क्योंकि वह एक भ्रष्ट प्रधानमंत्री की मदद कर रहे थे। राउत का कहना है, “प्रदर्शन कर रही जनता ने संसद, सरकारी कार्यालयों और मंत्रियों के घरों पर हमले किए। सभी देशों, विशेष तौर पर भारत को इन घटनाओं से सबक लेना चाहिए”। यह न केवल फ़िज़ूल बल्कि अत्यंत निन्दनीय बयान है। राउत बार-बार भड़क जाते हैं। कई बार अदालतों से माफ़ी भी मांग चुके हैं। अल्बानिया में फैली अराजकता के बीच सुप्रीम कोर्ट को आग लगाने की घटना की भारत की स्थिति से क्या तुलना है? ऐसे बयान देकर वह सरकार के हाथ ही मज़बूत कर रहे हैं कि विपक्ष अराजकता फैलाना चाहता है।
न ही यहां कोई ‘रिजीम चेंज’ होने वाला है, जैसे वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण भी कह रहे हैं। ‘रिजीम चेंज’ और ‘गवर्नमेंट चेंज’ में अंतर है, जैसे ‘सरकार को पलटने’ और ‘सरकार को बदलने’ में है। रिजीम चेंज मात्र सरकार बदलना ही नहीं बल्कि सारी व्यवस्था को ही ज़बरदस्ती पलट देना है। चुनाव के द्वारा सरकार में बदलाव एक सामान्य संवैधानिक प्रक्रिया है जबकि तख्ता पलटना अलोकतांत्रिक और अराजक होता है । यह आम तौर पर हिंसक होता है और इसमें सेना की भूमिका रहती है, जैसे पाकिस्तान में बार-बार होता रहा है। डाेनाल्ड ट्रंप भी ईरान में ‘रिजीम चेंज’की बात करते रहे। अमेरिका और इज़राइल बम बरसा कर उनके सारे नेतृत्व को ख़त्म करना चाहते थे, जो हो न सका। हमें उस तरफ़ नहीं जाना। हां, सरकार बदलने का प्रयास या इच्छा,जायज़ है पर यह भी सड़क के माध्यम से नहीं होना चाहिए। अब यह मौक़ा 2029 में ही आएगा। हां, सड़क पर प्रदर्शन बदलाव के लिए शांतमय माहौल तैयार कर सकते हैं,जो प्रयास हो रहा है।
नेहा बोरा, अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका जैसे नौजवान बहुत हिम्मती और प्रतिभाशाली हैं। वह देश का भविष्य हैं, पर जोश के साथ होश भी चाहिए। तिरंगे के साथ जंतर-मंतर का गेट फांद कर अंदर घुसने का क्या तुक है? क्या हासिल करने का प्रयास था? कॉकरोच जनता पार्टी ने युवाओं के मुद्दे बहुत अच्छी तरह से उठाए थे। इसीलिए जन्तर-मंतर पर इतना विशाल जन समर्थन मिला था जिसके बाद धर्मेन्द्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा। फिर उन्होंने ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू किया। कई सरकारों का स्कूल ठीक करने की तरफ़ ध्यान भी गया, कइयों का पहली बार, पर फिर अचानक वह चुनाव आयोग के विरुद्ध अभियान में कूद पड़े जिसे विपक्ष चला ही रहा था। उन्होंने नीट और शिक्षा और परीक्षा सुधार के मुद्दे छोड़ दिए।
अब साफ़ नहीं है कि कॉकरोच क्या है? वह छात्र और युवा आंदोलन हैं या राजनीतिक दल बनने की महत्वकांक्षा पाल रहे हैं, जैसे आप बनी है? बेहतर है कि वह युवाओं के मामलों पर केन्द्रित रहे और सरकार को सुधार के लिए मजबूर करें। यह ही देश की बहुत बड़ी सेवा होगी। नेहा बोरा बहुत साहसी लड़की है। निडर हैं, पर लक्ष्य तख्ता पलटना नहीं होना चाहिए। वह अपने प्रदर्शन के अधिकार पर अडिग है। अदालतें भी इस मामले में कंफ्यूज हैं। कहा जाता है कि शान्ति भंग नहीं होनी चाहिए, पर युवाओं ने शान्ति भंग की कहां है? जो तिरंगा लेकर नई दिल्ली के कनॉट प्लेस में शांतमय प्रदर्शन कर रहे थे, वह क़ानून और व्यवस्था को चुनौती नहीं दे रहे थे। हां, सरकार को चिढ़ा ज़रूर रहे थे।
कोई भी सरकार प्रदर्शन पसंद नहीं करती, पर भारत बहुत विविध देश है। याद रखिए कि जब इंदिरा गांधी को उत्तर भारत ने रद्द कर दिया था तो वह कर्नाटक में चिकमंगलूर से जीत कर संसद में पहुंची थीं। यहां सब एक जैसा नहीं सोचते। तख्ता पलटने जैसी फ़िज़ूल मांग कर यह नादान सरकार का हाथ ही मज़बूत कर रहे हैं, जो सरकार रक्षात्मक थी वह आक्रामक हो गई है। ‘विदेशी हाथ’ की बात हो रही है। कहा जा रहा है कि देश में बांग्लादेश-नेपाल जैसी हिंसा फैलाने की कोशिश हो रही है। मोहन भागवत जिन्होंने जुलाई में हुए प्रदर्शन के बारे नरम रुख अपनाया था, का अब कहना है की भारत के विरुद्ध ‘वैश्विक साज़िश’ हो रही है और पश्चिम से कोई ‘तूफ़ान’ आ रहा है। इंदिरा गांधी का ज़माना याद आता है। वे भी लगातार ‘फॉरेन हैंड’ की शिकायत करती रही थी। यह बहानेबाज़ी है और राजनीतिक, प्रशासनिक और बौद्धिक कमजोरी और असुरक्षा प्रकट करती है। यहां जो हो रहा है वह शुद्ध देसी हैं।
सरकार को समझना चाहिए की सब कुछ सही नहीं चल रहा। लोगों के सवालों का जवाब नहीं मिल रहा। फ्रांस के जो हालात हैं उनका भी एक कारण ये बताए जाता है कि सरकार और लोगों के बीच संवाद नहीं है। हमारे यहां भी यही स्थिति है इसे बदलने की ज़रूरत है। विशेष तौर पर चुनाव आयोग को लेकर जो सवाल खड़े किए जा रहे हैं उनका कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिल रहा। रोज़ाना नए से नए रहस्योद्घाटन हो रहे हैं। जहां तक विदेशी हाथ का सवाल है, विदेश में बैठी कुछ ताक़तें निश्चित तौर पर भारत को कमजोर करना चाहेंगी, पर हम उन्हें मौका क्यों दे रहे हैं?
अपना घर तो हमें खुद सही रखना है। महंगाई, असमानता, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, घटिया शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था जैसी समस्याओं का कोई समाधान नहीं नज़र आता। संसद और दूसरे उच्च संस्थान प्रभावी नहीं रहे। लोगों और उनकी सरकार के बीच बेमेल नज़र आता है। दावों के बावजूद ज़मीन पर बहुत कुछ नहीं बदला। कोई जवाबदेही नहीं है। वक्त बदल गया है। भारतीयों की एक नई पीढ़ी आपके द्वार पर दस्तक दे रही है। इनकी अनदेखी या इनके दमन से असंतोष और अशान्ति बढ़ेगी।

चन्द्रमोहन