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अकाली-भाजपा गठबंधन से हिन्दू-सिख एकता मजबूत होती है

पंजाब में शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के बीच अगर गठबन्धन हो जाता है तो निश्चित तौर पर हिन्दू सिख एकता मजबूत होती है। इसी सोच के साथ शायद पूर्व में शिरोमणि अकाली दल नेता मास्टर तारा सिंह के द्वारा भाजपा उस समय के जनसंघ के साथ समझौता किया गया, यहां तक कि जब देश में विश्व हिन्दू परिषद का गठन हुआ तो मास्टर तारा सिंह उसके संस्थापक भी बने। धीरे-धीरे हालात बदलते गये। देश के हुकमरानों की सोच तो देश के आजाद होते ही बदल चुकी थी। इतिहास गवाह है कि मास्टर तारा सिंह सहित उस समय के अकाली नेताओं ने देश के बंटवारे के समय सिखों के लिए अलग राज्य ना लेकर हिन्दुस्तान में हिन्दू भाईचारे के साथ रहने का निर्णय लिया था। मगर अफसोस कि जिस बहादुर कौम की बेतहाशा शहादतों के कारण देश आजाद हुआ उसी कौम के नेताओं को देश के हुकमरानों ने जराएपेशा कौम करार दिया क्योंकि आजादी के बाद नेहरु-गांधी के तेवर बदल चुके थे और बंटवारे के समय सिखों के साथ किये गये वायदों को वह नजरअंदाज कर रहे थे। दूसरी ओर सिख अपने हक पाने के लिए मोर्चे लगा रहे थे जो शायद उन्हें बर्दाशत नहीं था।
जनसंघ के साथ मिलकर देश में सबसे पहले अकाली दल ने पंजाब में गठबंधन सरकार बनाने की शुरूआत की। इमरजेंसी के दौरान केंद्र में कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ने के लिए अकाली दल ने आगे आकर मोर्चे लगाए। तभी से दोनों पार्टियों में ऐसा अटूट रिश्ता बन गया कि इसे नाखून मांस का रिश्ता कहा जाने लगा। पंजाब में अकाली दल बड़े भाई की भूमिका निभाता तो पंजाब से बाहर भाजपा। प्रकाश सिंह बादल के द्वारा तो भाजपा को बिना शर्त समर्थन देकर गठबंधन का फर्ज निभाया जाता रहा। जब तक उनकी पार्टी में चलती रही सब कुछ ठीक ठाक चलता रहा मगर जब से सुखबीर सिंह बादल की दखलअंदाजी शुरु हुई, धीरे-धीरे गठबंधन में खटास आने लगी। उधर भाजपा में भी अब कई नए चेहरे आ चुके थे जो अकाली दल की हर मांग को स्वीकार करने को कतई तैयार नहीं। उन्हें लगता है पंजाब में अकाली दल की बैसाखियों के सहारे कब तक चला जाएगा। भाजपा को अपने कैडर को मजबूत करना होगा। भाजपा हाई कमान सीधे तौर पर अकाली दल को बाहर जाने के लिए भी नहीं कह सकता था। किसानी बिल पास करवाने के समय अकाली दल की सांसद हरसिमरत कौर बादल वहां ना सिर्फ मौजूद थी बल्कि उन्होंने अपने ससुर प्रकाश सिंह बादल से किसानी बिल के हक में बयान भी मीडिया में दिलवाया था जिसे सः बादल देने के समर्थन में नहीं थे। मगर जब पंजाब के लोगों का गुस्सा अकाली दल के प्रति फूट पड़ा तो मजबूरी में आकर अकाली दल ने भाजपा से नाखून मांस के रिश्ते को अलग कर लिया जिसके चलते मंत्रिमंडल से भी उन्हें हाथ धोना पड़ गया। अकाली दल भी इस बात को भलि भान्ति जानता है कि बिना भाजपा के वह चुनाव नहीं जीत सकते जिसके चलते उनके द्वारा लगातार पुनः गठबंधन के लिए हर संभव प्रयास किये जाते रहे हैं।
पंजाब भाजपा गठबंधन को लेकर दुविधा में है उसका एक वर्ग तो चाहता है कि गठबंधन हो जाए पर दूसरा वर्ग इसके लिए कतई तैयार नहीं है। भाजपा नेता कुलवंत सिंह बाठ की माने तो पिछले 3 वर्षों में हालात काफी बदल चुके हैं। भाजपा का जनाधार अब पंजाब के गांवों में भी बूथ लेवल तक पहुंच गया है। भाजपा निरन्तर मजबूत होती दिख रही है। हो सकता है कि इस बार चुनावों में भले ही पार्टी को ज्यादा सफलता ना मिल पाए मगर आने वाले समय में पार्टी अपने दम पर चुनाव जीतने में समर्थ हो सकती है। आप और कांग्रेस के भी अकेले चुनाव लड़ने के फैसले के बाद शायद भाजपा हाई कमान भी बिना अकाली दल के चुनाव लड़ने की इच्छुक लग रही है। उधर किसानों के फिर से सड़कों पर आने के बाद अकाली दल भी गठबंधन से संकोच करता दिख रहा है जिसके चलते अब गठबन्धन होता दिख नहीं रहा मगर फिर भी अगर ऐसा हो जाता है तो इससे दोनों पार्टियों को ही नहीं बल्कि देशभर में हिन्दू सिख एकता को मजबूती मिलेगी और हो सकता है कि आने वाले दिनों में सिखों के लटकते मसले भी हल हो जाएं।
सिखों के धार्मिक मामलों में दखलअंदाजी
भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहां सभी धर्मों को आजादी है कि वह अपने हिसाब से अपने धार्मिक स्थलों का प्रबन्ध चला सके। इसी के चलते सिख नेता मास्टर तार सिंह और पंडित जवाहर लाल नेहरु के बीच एक समझौता हुआ था जिसमें साफ कहा गया था कि सिखों के धार्मिक स्थलों या मामलों में सरकार द्वारा किसी तरह की दखलअंदाजी नहीं की जायेगी। इसी के चलते जब हजूर साहिब बोर्ड का गठन हुआ तो 1956 एक्ट को ही लागू किया गया मगर उस समय यह स्थान हैदराबाद में आता था जो अब महाराष्ट्र में है। हाल ही में महाराष्ट्र की शिंदे सरकार के द्वारा तख्त हजूर साहिब नांदेड़ के एक्ट में संशोधन कर उसमें सरकारी नुमाईंदों की गिनती में इजाफा किये जाने को लेकर शिरोम​िण गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी से लेकर शिरोमणि अकाली दल यहां तक कि श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार द्वारा भी इसका विरोध किया जाने लगा। दिल्ली में शिरोमणि अकाली दल के नेता परमजीत सिंह सरना, मनजीत सिंह जीके ने महाराष्ट्र सदन में रेजीडेंट कमीश्नर को मिलकर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा। इससे पहले दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका के द्वारा राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग चेयरमैन इकबाल सिंह लालपुरा के पास जाकर ज्ञापन सौंपते हुए मसले का समाधान करवाने की बात कही थी। मुम्बई में भी सिखों ने एक मीटिंग करने के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिन्दे और उपमुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस से मिलकर अपना एतराज उनके सामने रखा था। भाजपा नेता आर.पी. सिंह के द्वारा भी इस मसले को गंभीरता से लेते हुए मुख्यमंत्री से निरन्तर बात की जा रही थी। राजौरी गार्डन सिंह सभा के अध्यक्ष हरमनजीत सिंह, महासचिव मनजीत सिंह खन्ना, सिख यूथ फाउंडेशन के हरनीक सिंह सहित अन्य सिख संस्थाओं के द्वारा भी ज्ञापन महाराष्ट्र सरकार को भेजे गये। जिसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने साफ कर दिया है कि किसी तरह का कोई संशोधन अभी नहीं किया जायेगा और 1956 एक्ट को ही जारी रखा जायेगा। समाजसेवी दविन्द्रपाल सिंह पप्पू ने इसे सिख पंथ की बड़ी जीत बताते हुए सिखों को इसी तरह से हर मसले पर राजनीति से ऊपर उठकर एकजुट होकर चलने की अपील की है। वहीं सिखों का एक वर्ग मानता है कि इससे प्रबन्ध में सुधार हो सकता था क्योंकि सरकार द्वारा भेजे जाने वाले प्रतिनिधि कम से कम स्थानीय और शिक्षित होते जो कि अपना पूरा समय प्रबन्ध को बेहतर बनाने में देतेे।
मातृ भाषा पंजाबी का प्रचार
पंजाब में रहने वाले सभी लोग भले ही वह किसी भी समुदाय से सम्बन्ध रखते हों उनकी मातृ भाषा पंजाबी होनी चाहिए। परन्तु कुछ राजनीतिक लोगों के द्वारा बीते समय में जो पंजाबी भाषा के प्रति नफरत रखते थे ऐसा प्रचार किया गया कि पंजाबी केवल सिखों की भाषा है, दूसरे धर्मों के लोगों को इसे मातृ भाषा का दर्जा नहीं दिया जाना चाहिए। हालांकि ऐसी स्थिति अपने देश में ही देखने को मिलती है, जो पंजाब देश के बंटवारे के समय पाकिस्तान में रह गया वहां आज भी पंजाब का हर नागरिक पंजाबी भाषा का इस्तेमाल लिखने और पढ़ने के लिए करता है। आज हालात ऐसे बन चुके हैं कि दूसरे राज्यों की बात छोड़ों पंजाब के लोग भी पंजाबी बोलने वालों को कम पढ़ा लिखा समझते हैं। दिल्ली सहित दूसरे राज्यों में रहने वाले ज्यादातर पंजाबियों के घरों में भी पंजाबी के बजाए अन्य भाषाओं को बातचीत का माध्यम बनाया जाता है। कुछ एक संस्थाएं ऐसी हैं जो अपनी जिम्मेवारी को बाखूबी निभाते हुए पंजाबी के प्रचार-प्रसार का बीड़ा उठाये हुए हैं। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी धर्म प्रचार के मुखी जसप्रीत सिंह करमसर की माने तो इसी के चलते कमेटी ने गर्मी की छुट्टियों में बच्चों को मातृ भाषा के प्रति जागरुक करने के लिए ना सिर्फ कैंप लगाए बल्कि जिन अध्यापकों, प्रचारकों, संस्थानों ने इसमें योगदान दिया उन्हें गुरुद्वारा बंगला साहिब में बुलाकर कमेटी के महासचिव जगदीप सिंह काहलो के साथ मिलकर सम्मान भी दिया गया। इसी तरह से पंजाबी हैल्पलाइन, पंजाबी परमोशन कौं​िसल, सिख यूथ फाउंडेशन जैसी अनेक संस्थाएं हैं जो निरन्तर पंजाबी भाषा का प्रचार प्रसार करती रहती हैं ताकि युवा पीड़ी को पंजाबी भाषा के साथ जोड़ा जा सके।

– सुदीप सिंह

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