अकाली दल और जनसंघ (भाजपा) गठजोड़ का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि खुद पंजाब सूबे के गठन का। आजादी के बाद भारत के हिस्से में आया पंजाब पहले पेप्सू व पंजाब राज्यों में बंटा था, जो 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा समन्वीकृत किया गया जिसमें हरियाणा व हिमाचल प्रदेश भी शामिल थे परन्तु इसके बाद साठ के दशक के आते-आते इस राज्य में पृथक पंजाबी सूबे की मांग तेज होने लगी जिसकी वजह से 1966 में इस संयुक्त पंजाब को तीन क्षेत्रों पंजाब, हरियाणा व हिमाचल में विभक्त किया गया। पहाड़ी क्षेत्र होने की वजह से हिमाचल को शुरू में अर्ध राज्य का दर्जा दिया गया जबकि पंजाब व हरियाणा पूर्ण राज्य बने। 1966 में बने इन तीन राज्यों में पंजाब की बागडोर कामरेड रामकिशन ने संभाली जबकि हरियाणा के मुख्यमन्त्री स्व. पं. भगवत दयाल शर्मा बने और हिमाचल का मुख्यमन्त्री डाॅ. वाई.एस. परमार को बनाया गया। ये तीनों ही मुख्यमन्त्री कांग्रेस पार्टी के थे परन्तु इसके अगले साल 1967 में ही पूरे देश में आम चुनाव हुए। इन चुनावों में देश के नौ राज्यों की विधानसभाओं में कांग्रेस पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाया। इन नौ राज्यों में पंजाब व हरियाणा भी शामिल थे।
हरियाणा में वर्तमान भाजपाई केन्द्रीय मन्त्री राव इन्द्रजीत सिंह के पिता स्व. राव वीरेन्द्र सिंह ने कांग्रेस से बगावत करके कुछ विधायकों के साथ अपनी पार्टी छोड़ दी और जनसंघ व अन्य दलों के साथ मिलकर संयुक्त विधायक दल सरकार बनाई जबकि पंजाब में अकाली दल के विधायकों की संख्या कांग्रेस के विधायकों की संख्या के आसपास रही मगर दोनों ही पार्टियां नई विधानसभा में बहुमत से बहुत दूर रहीं जिसकी वजह से अकाली दल ने जनसंघ के विधायकों के साथ सहयोग करके राज्य में उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश स्व. गुरुनाम सिंह के नेतृत्व में अकाली-जनसंघ सरकार बनाई और यहीं से प्रदेश की राजनीति में अकाली-जनसंघ गठजोड़ का किस्सा शुरू हुआ जो 2020 तक निर्बाध गति से जनसंघ के 1980 में भारतीय जनता पार्टी में रूपान्तरित होने के बावजूद चलता रहा।
यह गठबन्धन केवल राज्य तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इसने पंख फैलाये और इस बीच केन्द्र में भाजपा के नेतृत्व में बने एनडीए गठबन्धन में अकाली दल इसका अभिन्न अंग बना रहा जिसके परिणामस्वरूप 2020 तक केन्द्र में बनी हर एनडीए सरकार में अकाली दल का प्रतिनिधित्व रहा परन्तु इसी वर्ष में नरेन्द्र मोदी सरकार कृषि क्षेत्र में किसानों के तीन कानून लाई जिनका विरोध अकाली दल ने किया और इसकी मन्त्री हरसिमरन कौर ने केन्द्रीय मन्त्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। राज्य स्तर पर भी जब भी पंजाब में अकाली दल के नेतृत्व में स्व. प्रकाश सिंह बादल अथवा उनके पुत्र सुखबीर बादल की सरकार बनी उसमें भाजपा के प्रतिनिधि शामिल हुए लेकिन अकाली-जनसंघ गठजोड़ की इस विरासत में इस दौरान राज्य की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप मूलभूत बदलाव भी आते रहे हैं। इनमें सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि कभी पूरे देश में सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक क्षेत्रीय दल कहलाने वाला अकाली दल आज केवल बादल परिवार की बपौती बना हुआ है तो वहीं भाजपा कांग्रेस से इसमें आये नेताओं जैसे कैप्टन अमरेन्द्र सिंह व सुनील जाखड़ आदि के भरोसे चल रही है जबकि सत्ता पर एक नई समझी जाने वाली आम आदमी पार्टी काबिज है।
2007 से 2017 तक इस राज्य में अकाली दल के सुखवीर सिंह बादल की सरकार चली और इसके बाद कांग्रेस के कैप्टन अमरेन्द्र सिंह मुख्यमन्त्री रहे परन्तु पिछले चुनावों में इस राज्य के लोगों ने एक नया प्रयोग किया और आम आदमी पार्टी को 117 सदस्यीय विधानसभा में तीन-चौथाई बहुमत दे दिया और अकाली दल को हाशिये पर धकेलते हुए कांग्रेस पार्टी को मुख्य विपक्षी दल बनाया। इस युद्ध में भाजपा का तो सूपड़ा ही साफ हो गया और उसके केवल दो विधायक ही जीत पाये। यह भाजपा के लिए बहुत चिन्ता की बात थी क्योंकि उसके पास राज्य में न तो अब डाॅ. कृष्ण लाल व बलराम जी दास टंडन जैसे नेता थे और न ही लुधियाना के प्रोफेसर विश्वनाथन जैसे वक्ता। फिर भी अकाली दल के साथ उसका गठबन्धन चल रहा था जिससे अकाली दल के ग्रामीण वोट बैंक व भाजपा के शहरी वोट बैंक का समीकरण बना हुआ था परन्तु आम आदमी पार्टी के राज्य में राजनीतिक प्रवेश से सभी पार्टियों के पारंपरिक वोट बैंक बिखरने लगे। इनमें कांग्रेस पार्टी का 30 प्रतिशत से अधिक का अनुसूचित जातियों का वोट बैंक भी शामिल था लेकिन राजनीति का यह नियम है कि परिस्थितियों व काल के अनुसार यह अपना रंग बदलती रहती है। इसलिए राज्य में फिर से अकाली-भाजपा गठजोड़ की अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं।
यह गठजोड़ जब संयुक्त रूप से खड़ा होता है तो इसके पुराने दिनों की याद ताजा होने से इसे स्वाभाविक जन संबल मिलता है, इसी वजह से भाजपा में आये कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ने पिछले दिनों कहा था कि गठजोड़ बन जाने पर ही हम पंजाब में अपने प्रतिद्वन्द्वियों का मुकाबला करने में सक्षम हो सकते हैं। इस दृष्टि से विगत दिन अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर बादल व प्रधानमन्त्री मोदी की मुलाकात महत्वपूर्ण है। इस मुलाकात के बाद अटकलें तेज हो गई हैं कि दोनों पार्टियों के बीच फिर से गठबन्धन बन सकता है। हालांकि विगत 17 जुलाई को जब प्रधानमन्त्री ने जालंधर में एक रैली सम्बोधित की थी तो उसमें अकाली दल की आलोचना की थी परन्तु श्री बादल ने तब कहा था कि श्री मोदी के निशाने पर उनकी पार्टी नहीं बल्कि उनके दल के विद्रोही धड़े का अकाली दल था। अब ताजा मुलाकात के बाद गठबन्धन होना प्रायः निश्चित माना जा रहा है, वैसे भी श्री बादल के पास कोई विकल्प नहीं बचा है।
अकाली-भाजपा का गठजोड़
Summary :
अकाली दल और जनसंघ (भाजपा) गठजोड़ का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि खुद पंजाब सूबे के गठन का। आजादी के बाद भारत के हिस्से में आया पंजाब पहले पेप्सू व पंजाब राज्यों में बंटा था, जो 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा समन्वीकृत किया गया जिसमें हरियाणा व हिमाचल प्रदेश भी शामिल थे परन्तु इसके बाद साठ के दशक के आते-आते इस राज्य में पृथक पंजाबी सूबे की मांग तेज होने लगी जिसकी वजह से 1966 में इस संयुक्त पंजाब को तीन क्षेत्रों पंजाब, हरियाणा व हिमाचल में विभक्त किया गया। पहाड़ी क्षेत्र होने की वजह से हिमाचल…



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