एक पुरानी कहानी व ध्वस्त होती नई मान्यताएं

Summary :

‘हुजूर अपने गलत कामों पर मंदिर-मस्जिद का पर्दा न डालिए लेकर खुदा का नाम अपनी जेब में उनके हक का चंदा न डालिए’ अभी पिछले दिनों भाजपा के एक बड़े नेता से मिलना हुआ, चंदा चोरी, जेन ज़ी आंदोलन, यूजीसी के परिप्रेक्ष्य में वे पार्टी की बांकीपुर व दतिया में हार को किस नजरिए से देखते हैं तो इसके जवाब में उन्होंने एक पुरानी कहानी सुना दी। बकौल नेता जी-यह बहुत पहले की बात है, एक नगर में एक धन्ना सेठ रहा करते थे, सेठ जी अपने मुनीम पर आंखें मूंद कर भरोसा करते थे। समय काल के साथ जब…

‘हुजूर अपने गलत कामों पर मंदिर-मस्जिद का पर्दा न डालिए
लेकर खुदा का नाम अपनी जेब में उनके हक का चंदा न डालिए’

अभी पिछले दिनों भाजपा के एक बड़े नेता से मिलना हुआ, चंदा चोरी, जेन ज़ी आंदोलन, यूजीसी के परिप्रेक्ष्य में वे पार्टी की बांकीपुर व दतिया में हार को किस नजरिए से देखते हैं तो इसके जवाब में उन्होंने एक पुरानी कहानी सुना दी। बकौल नेता जी-यह बहुत पहले की बात है, एक नगर में एक धन्ना सेठ रहा करते थे, सेठ जी अपने मुनीम पर आंखें मूंद कर भरोसा करते थे। समय काल के साथ जब मुनीम जी ने अपनी बेटी के हाथ पीले किए तो सफलतापूर्वक विवाह का हर आयोजन संपन्न हो जाने के बाद उनके मन में विचार आया कि इस आयोजन को इतना सफल बनाने के लिए क्यों नहीं ईश्वर का धन्यवाद किया जाए। वे सेठ जी के पास पहुंचे, हाथ जोड़ कर विनती की और कहा कि ‘वे अमुक सिद्ध मंदिर में दर्शन के लिए जाना चाहते हैं’, सेठ जी ने सहर्ष इसके लिए सहमति दे दी, साथ ही अपनी ओर से भी 101 रुपए (उस दौर में यह रकम बहुत बड़ी हुआ करती थी) मुनीम जी को देते हुए कहा कि ‘यह चंदा वे उनकी ओर से मंदिर के दान पात्र में डाल कर उनके लिए भी भगवान से आशीर्वाद मांग लें।’
मंदिर का रास्ता लंबा था, मुनीम जी पैदल ही एक दूसरे नगर की ओर चल पड़े, जहां वह अलौकिक मंदिर अवस्थित था। अभी मुनीम जी थोड़ी दूर ही चले होंगे तो उनका सामना एक ऐसे गरीब परिवार से हो गया जिसके मुखिया का अभी-अभी देहावसान हुआ था, पर उस परिवार के पास दाह-संस्कार के भी पैसे नहीं थे, मुनीम जी ने झट से उस गरीब परिवार की मदद कर दी, कुछ आगे बढ़े तो देखा कि इस भयंकर सर्दी के मौसम में सड़क किनारे झोपड़ी में एक औरत बिना कंबल के ठिठुर रही है, मुनीम जी ने उसे कंबल खरीदने के पैसे दे दिए। यूं ही रास्ते भर परोपकार के अनेक कार्य करते हुए जब मुनीम जी मंदिर पहुंचे तो पाया कि उनके सारे पैसे खत्म हो चुके हैं और उन्होंने सेठ जी के भी सौ रुपए खर्च कर दिए हैं, उनके पास बचा है तो सिर्फ एक रुपया, उस एक रुपए को दान पात्र में डालते हुए मुनीम जी ने हाथ जोड़ कर ईश्वर से अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी और कहा कि ‘सेठ जी के बचे हुए सौ रुपए वे जल्द कहीं से इंतजाम कर दान पात्र में डाल देंगे।’
वापसी में मुनीम जी जब अगले रोज़ सेठ जी के पास पहुंचे तो उन्होंने ग्लानिवश अपने दोनों हाथ जोड़ कर क्षमा मांगी और कहा-सेठ जी मुझसे गलती हुई है, मैं जल्द ही पैसों का इंतजाम कर दान पात्र में डाल दूंगा। सेठ जी ने सामान्य भाव से कहा-जानता हूं, कल रात ईश्वर मेरे सपने में आए थे, उनसे मालूम चला कि उन्हें तो बस सौ रुपए ही मिले। मुनीम जी भी हक्का-बक्का-मैंने तो बस एक रुपया ही दान पात्र में डाला था, पर सेठ जी उनकी कोई बात सुनने को राजी नहीं थे। नेता जी ने हंस कर कहा कि आप समझदार हैं अब आप चाहे तो इसे पूरे प्रसंग को आप राम मंदिर चंदा मामले से जोड़ कर देख सकते हैं।
अब बात राम मंदिर निर्माण की
राम मंदिर पर जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया तो उसके साथ ही ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ की स्थापना की तैयारियां शुरू हो गई। 5 फरवरी 2020 को इस ट्रस्ट की स्थापना भी हो गई। उस वक्त भी यूपी की कमान योगी आदित्यनाथ के हाथों में ही थी, जो चाहते थे कि इस ट्रस्ट का पदेन अध्यक्ष राज्य के मुख्यमंत्री को ही होना चाहिए, जैसी व्यवस्था गुजरात के सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट की है। सूत्रों की मानें तो योगी ने इस बारे में दिल्ली को अपने मनोभावों से अवगत करा दिया। पर उस वक्त दिल्ली के मन में कुछ और चल रहा था, केंद्र का तर्क था कि ‘यह ट्रस्ट न सिर्फ केंद्र की निगरानी में काम करें बल्कि इस पर केंद्र की पूरी तरह पकड़ भी रहे।’ जैसे ‘माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड’ के पदेन अध्यक्ष जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल हैं और कुछ रिटायर्ड नौकरशाह या आईएएस अफसर मसलन बालेश्वर राय और डॉ. अशोक भान इसके सदस्य हैं।
‘तिरूमाला तिरुपति देवस्थानम बोर्ड’ में भी बतौर मुख्य प्रशासक एक आईएएस एम. रवि चंद्रा बहाल हैं तथा सदस्य के रूप में तिरुपति के जिलाधिकारी और आंध्र प्रदेश सरकार के एंडोमेंट (धार्मिक विभाग) के प्रमुख सचिव की इसमें उपस्थिति देखी जा सकती है। केंद्र सरकार कुछ इसी तर्ज पर श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट का गठन चाहती थी। तब जब इस ट्रस्ट की स्थापना हुई तो इसके 15 में से 12 सदस्य भारत सरकार द्वारा मनोनीत किए गए और अन्य तीन सदस्यों का चयन इसकी पहली बैठक में हुआ। केंद्र सरकार की ओर से आईएएस और प्रधानमंत्री के पूर्व प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्र को मंदिर निर्माण समिति का अध्यक्ष बनाया गया। इसके अलावा यूपी सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर आईएएस संजय प्रसाद, केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर आईएएस प्रशांत लोकंडे तथा अयोध्या के जिलाधिकारी इन तीनों को इसका पदेन सदस्य बनाया गया।
अगर सरकारी तौर पर केंद्र की इस पूरी प्रक्रिया को देखा जाए तो आसानी से समझ आ जाएगा कि योगी की अभ्यर्थनाओं और मंशाओं को किस तरह से दरकिनार कर दिया गया। सो, जाने-अनजाने योगी की पूरी नज़र राम मंदिर निर्माण पर थी, सो इसमें व्याप्त अनियमिताओं और घपलों की जानकारियां भी उन्हें अवश्य रही होंगी। सूत्रों की मानें तो इस पर योगी अपने राज्य की खुफिया एजेंसियों का फीडबैक बराबर ले रहे थे, यह भी कहा जाता है कि उन्हें खुफिया एजेंसियों ने ही इस पूरे मामले का एक डॉसियर तैयार करके केन्द्र को दिया था। पर कहीं से चंदा चोरी की बात लीक कर गई जो आज इतना बड़ा मुद्दा बन गया है।
संघ का नया नवेला जेन ज़ी प्रेम
जंतर-मंतर पर हुए हालिया छात्र आंदोलन ने कई सियासी पार्टियों और इसकी पटकथा लिखने वाले नायकों-प्रतिनायकों की सोच बदल दी है। ‘जेन ज़ी’ व ‘अल्फा’ से सीधा संवाद बनाने की होड़ में कोई कैमरा एंगिल से लोहा ले रहा है तो कईयों के फैलादी इरादे मोम से पिघल रहे हैं। इसी 6 अगस्त को संघ प्रमुख मोहन भागवत मुंबई के नीता मुकश अंबानी कल्चरल सेंटर में 2000 से ज्यादा बच्चों से (जिनकी उम्र 15-19 वर्ष के बीच रही होगी) सीधा संवाद स्थापित कर रहे थे। भागवत ने पहली पीढ़ियों के मुकाबले जेन ज़ी व अल्फा जेनरेशन को ज्यादा देशभक्त और ईमानदार बता डाला। अब संघ प्रमुख का जेन ज़ी के साथ संवाद का यह कारवां यहीं नहीं रुकने वाला, अब संघ भागवत को आगे रख कर देशभर के 100 से ज्यादा शहरों में ऐसे संवाद गोष्ठी रखने की कोशिश कर रहा है। इसे एक तरह से आप जेन ज़ी वोट को साधने की संघ की नई रणनीति मान सकते हैं। इसके अलावा संघ व भाजपा दोनों ही देशभर के ऐसे इन्फ्लुइंसर्स की शिनाख्त कर रहे हैं जो जेन ज़ी पीढ़ी पर सीधा प्रभाव छोड़ते हैं, ऐसे यू-ट्यूर्ब्स और रील मेकर्स को भगवा रंग में रंगने की तैयारी है। पर जेन ज़ी व अल्फा जेनरेशन को साध पाना क्या कभी इतना आसान रहा है?
पीके की पौ बारह
बांकीपुर उपचुनाव में अपने नए सियासी इरादों की झांकी दिखाने के बाद अब पीके एक बार फिर से अपने पुराने अवतार में लौट आए हैं। तीन अगस्त को बांकीपुर का चुनावी नतीजा आया। और इसके दो रोज बाद ही पीके मुंबई में थे, जहां उनकी मुलाकात महाराष्ट्र की डिप्टी सीएम सुनेत्रा पवार से पहले से ही तय थी। पीके एयरपोर्ट से सीधे सुनेत्रा के आवास ‘देवगिरी’ के लिए रवाना हो गए, जहां सुनेत्रा और उनके पुत्र पार्थ पवार पहले से उनका इंतजार कर रहे थे। कहते हैं ये मुलाकात कोई पांच घंटों तक चली।
सनद रहे कि बीते तीन महीनों में पीके की सुनेत्रा व पार्थ के साथ यह दूसरी मुलाकात है। यह भी माना जा रहा है कि मोटे तौर पर पीके ने खुद को सुनेत्रा का राजनैतिक सलाहकार बनाए जाने पर हामी भर दी है। दरअसल, सुनेत्रा व पार्थ अजित पवार की एनसीपी के विस्तार और उसके भविश्य के योजनाओं को धार देने के लिए पीके का साथ चाहते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि मौजूदा दौर में सुनेत्रा के मार्गदर्षक के तौर पर अवतरित हुए देवेंद्र फडणवीस पीके व एनसीपी अजित की नजदीकियों को लेकर कतई खुश नहीं हैं। समझा जाता है कि उन्होंने सुनेत्रा से दो टूक कह दिया है कि जो व्यक्ति भाजपा को हरा कर उससे दुष्मनी लेकर यहां तक पहुंचा है उसे वह अपना सलाहकार कैसे रख सकती हैं?’
मृदुल की एक भूल
18 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के चुनाव होने हैं, अध्यक्ष पद की रेस में सीनियर एडवोकेट अनुपम लाल दास, गौरव भाटिया, सिद्धार्थ मृदुल और एसोसिएशन के पूर्व उपाध्यक्ष प्रदीप राय के बीच कड़ी टक्कर है। सूत्र बताते हैं कि फिलवक्त सिद्धार्थ मृदुल का पलड़ा थोड़ा भारी है, मृदुल मणिपुर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीष रह चुके हैं। मृदुल पर जज रहते हुए 16 साल तक ‘किचेन फ्लेम’ नाम से एक गैस एजेंसी चलाने के आरोप हैं। कहते हैं नियमों के उल्लंघन पर बीपीसीएल ने उनकी डीलरशिप सस्पेंड कर दी थी। मृदुल को यह गैस एजेंसी सन 1984 में एलॉट हुई थी जब वे दिल्ली हाई कोर्ट में महज़ एक वकील थे, फिर वे मार्च 2008 में दिल्ली हाई कोर्ट में जज बने और अक्टूबर 2023 में प्रमोट होकर मणिपुर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बन गए। पर उन्होंने जज रहते हुए भी अपनी गैस एजेंसी बंद नहीं की जबकि पारदर्शिता नियमों के तहत जज़ों को अपनी कंपनियों की हिस्सेदारी बतानी पड़ती है।
…और अंत में
जेन ज़ी आंदोलन ने जब से धर्मेंद्र प्रधान की कुर्सी छीन ली है, उनके चेहरे से तो जैसे नूर ही छिन गया है। भले ही इस्तीफा देने के बाद संसद भवन पहंुचने पर उनके स्वागत में भाजपा सांसदों ने जयकारे लगाए, उन्हें फूल-मालाएं भेंट की। पर अब इतना वक्त गुज़र जाने के बाद प्रधान से मिलने वाले मुलाकातियों की लिस्ट में भारी कमी देखी जा सकती है, वैसे लोगों को भी उनसे मिलने का वक्त मुकर्रर हो जा रहा है जो पहले महीनों से उनसे एक मुलाकात की आस में थे। वैसे भी इन दिनों उनके संसद भवन में दीदार नहीं हो रहे, उनका ज्यादातर वक्त इन दिनों ओडिशा में गुज़र रहा है। उनकी नज़र अब भी ओडिशा सीएम की कुर्सी पर बदस्तूर टिकी है, इस बारे में माना जाता है कि उन्हें भाजपा चाणक्य से भी आश्वावासन प्राप्त है।

त्रिदीब रमण