शेख हसीना का आमार शोनार बांग्ला…

Summary :

बांग्लादेश की निर्वासित प्रधानमन्त्री श्रीमती शेख हसीना वाजेद ने आगामी दिसम्बर महीने में अपने देश लौटने की इच्छा व्यक्त की है और कहा है कि वह विषम समय में अपने देश के लोगों के साथ खड़ा होना चाहती है और उनका जीवन सुधारना चाहती है। शेख हसीना को दो वर्ष पहले 5 अगस्त 2024 को तख्ता पलट करके अपदस्थ कर दिया गया था जबकि वह चुनी हुई प्रधानमन्त्री थीं। इसके बाद वह भारत आ गई थीं और तब से यहीं रह रही हैं। शेख हसीना की सरकार का तख्ता पलट जुलाई महीने में हुए छात्र व युवा आन्दोलन के बाद…

बांग्लादेश की निर्वासित प्रधानमन्त्री श्रीमती शेख हसीना वाजेद ने आगामी दिसम्बर महीने में अपने देश लौटने की इच्छा व्यक्त की है और कहा है कि वह विषम समय में अपने देश के लोगों के साथ खड़ा होना चाहती है और उनका जीवन सुधारना चाहती है। शेख हसीना को दो वर्ष पहले 5 अगस्त 2024 को तख्ता पलट करके अपदस्थ कर दिया गया था जबकि वह चुनी हुई प्रधानमन्त्री थीं। इसके बाद वह भारत आ गई थीं और तब से यहीं रह रही हैं। शेख हसीना की सरकार का तख्ता पलट जुलाई महीने में हुए छात्र व युवा आन्दोलन के बाद हुआ था।
इस आन्दोलन में छात्रों की तरफ से भारी हिंसा भी की गई थी जिसका जवाब उसी भाषा में शेख हसीना की सरकार ने दिया था। दरअसल बांग्लादेश 1971 में अपने अस्तित्व में आने के बाद से ही विदेशी साजिशों का शिकार रहा है। 16 दिसम्बर 1971 को जब भारतीय सेना के सहयोग से पूर्वी पाकिस्तान बदल कर बांग्लादेश बना तो भारत विश्व के मानचित्र पर एक महाशक्ति के रूप में स्थापित हुआ और तत्कालीन भारतीय प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी विश्व की शक्तिशाली राजनेता के रूप में स्थापित हुईं।
बांग्लादेश का निर्माण अमेरिका के पुरजोर विरोध के बावजूद हुआ था क्योंकि 1971 के युद्ध में अमेरिका पाकिस्तान के साथ खड़ा हुआ था जबकि सोवियत संघ (रूस) भारत के पाले में था। इसकी मुख्य वजह यह थी कि दूरदर्शी इन्दिरा गांधी ने इसी साल में सोवियत संघ के साथ बीस वर्षीय रक्षा सन्धि कर ली थी। बांग्लादेश ने यह युद्ध अपने राष्ट्रपिता कहलाये जाने वाले बंग बंधु शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में लड़ा था जिसे मुक्ति संग्राम कहा गया। शेख हसीना उन्हीं की बेटी हैं।
पाकिस्तान से मुक्ति पाने के बाद शेख साहब ने अपने देश बांग्लादेश को भारत की तर्ज पर ही मुस्लिम जनसंख्या बहुल होने के बावजूद धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया और इसका संविधान भी भारत को आदर्श मान कर ही तैयार कराया। इस देश का राष्ट्रगान गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर का लिखा ‘आमार शोनार बांग्ला…, गीत बनाया गया। दुनिया में उस समय इस्लामी कट्टरपंथियों व अमेरिका परस्त पश्चिमी देशों को यह स्थिति नहीं भायी। शेख साहब ने अपनी पार्टी अवामी लीग के जरिये बांग्लादेश के लोगों को संगठित करके पाकिस्तान के नादिरशाही व चंगेजी शासन के विरुद्ध स्वतन्त्रता संग्राम की अगुवाई की थी जिसका मुख्य आधार बांग्ला भाषा थी जो कि पूर्वी पाकिस्तान की मातृ भाषा है। पाकिस्तानी हुकूमत यहां पर उर्दू को लादना चाहती थी और इस्लाम धर्म के नाम पर यहां के निवासियों की बांग्ला संस्कृति को नष्ट करना चाहती थी। इसका विरोध 1947 में पाकिस्तान बनने के बाद से ही इस क्षेत्र में होने लगा था जो कि पूर्वी पाकिस्तान था। इसकी कहानी भी बहुत दिलचस्प है जिसे अलग से लिखे जाने की जरूरत है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इतना ही कहा जा सकता है कि जुलाई 2024 में बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार के विरुद्ध जिस छात्र आन्दोलन को हथियार बनाकर उनका तख्ता पलटा गया उसका लक्ष्य इस देश की समूची विरासत को इस प्रकार नष्ट करना था कि आने वाली पीढि़यां इसके पाकिस्तान के चंगुल से मुक्त होने की कहानियां भूल जायें और उस इस्लामी कट्टरपन की गुलाम हो जायें जिसका विरोध शेख साहब किया करते थे। यह कुछ और नहीं था बल्कि 15 अगस्त 1975 की खूंखार घटनाओं का ही लोकतन्त्र के आवरण में चंगेजी विस्तार था क्योंकि इस छात्र आन्दोलन में इस देश के सभी राष्ट्रीय स्मारकों को नष्ट किया जा रहा था और चुन-चुन कर शेख साहब द्वारा खड़ी की गई मुक्ति संग्राम की विरासत को नेस्तानाबूद किया जा रहा था। यहां तक कि शेख साहब की प्रतिमा को भी आन्दोलनकारियों ने नहीं छोड़ा था।
15 अगस्त 1975 को शेख साहब जब अपने देश के सर्व सत्ता प्रमुख थे तो उनके पूरे परिवार की हत्या उनके ढाका स्थित घास मंडी निवास पर कर दी गई थी (उस समय शेख हसीना अपनी एक अन्य बहिन के साथ जर्मनी में थीं)। यह हत्या सेना के कुछ अफसरों ने की थी जिसके बाद यह देश लम्बे अर्से के लिए सैनिक शासन में चला गया था। इस दौरान इसका संविधान बदला गया और इसका राजधर्म इस्लाम घोषित कर दिया गया जिससे यह इस्लामिक देश बन गया। परन्तु 90 के दशक में इसके लोगों ने फिर परिवर्तन किया और यहां लोकतन्त्र स्थापित हुआ जिसमें दो प्रमुख पार्टियां अवामी लीग व बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी उभरीं। किन्तु 2024 में तथाकथित छात्र विद्रोह के बाद इस देश में नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अस्थायी सरकार गठित की गई। इस सरकार को अमेरिका व कट्टर इस्लामी देशों का समर्थन बताया जाता था। इस सरकार के डेढ़ साल के शासन के दौरान बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिन्दुओं के विरुद्ध अत्याचारों का सिलसिला तेज हुआ और कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों का दबदबा बढ़ा। साथ ही भारत के विरोध में भी इस देश से आवाजें उठने लगीं और शान्त समझी जानी वाली भारत की पूर्वी सीमाओं पर भी तनाव देखा जाने लगा और आतंकवादी तंजीमों का भी खतरा खड़ा होने लगा जिसकी वजह से गृहमन्त्री श्री अमित शाह ने पूरे सीमा क्षेत्र में बाड़ लगाने की मुहीम तेज की मगर पं. बंगाल की ममता सरकार ने इसके लिए जमीन मुहैया कराने में अटकलबाजी दिखाई। यह सब रिकार्ड का हिस्सा है।
यूनुस शासन के दौरान भारत ने बांग्लादेश के साथ अपने दौत्य सम्बन्ध सामान्य रखने के भरसक प्रयास किये और इसे उनमें सफलता भी मिली। इस मामले में मोदी सरकार की कूटनीति की तारीफ की जा सकती है कि उसने यूनुस प्रशासन के दौरान शेख हसीना के भारत में शरण लेने के बावजूद आपसी सम्बन्धों को पटरी से उतरने नहीं दिया जबकि यूनुस शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग कर रहे थे। बांग्लादेश की यूनुस सरकार ने शेख हसीना के खिलाफ जनसंहार करने व हत्या के आरोप तक लगाये हुए हैं और उन्हें फांसी की सजा का हकदार तक बनाया हुआ है। परन्तु छह महीने पहले जब बांग्लादेश में चुनाव हुए तो शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग पर चुनाव लड़ने से प्रतिबन्ध लगा दिया गया जिससे बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी जमाते इस्लामी पार्टी के साथ मिलकर इकतरफा चुनाव जीत गई। जबकि अवामी लीग का वोट बैंक कम से कम 40 प्रतिशत माना जाता है।
नेशनलिस्ट पार्टी की मुखिया स्व. बेगम खालिदा जिया थीं जो कि पूर्व राष्ट्रपति जनरल जियाउर्रहमान की पत्नी थी। वह शेख हसीना की प्रखर प्रतिद्वन्द्वी थीं और प्रधानमन्त्री भी रही थी। मगर उनकी पार्टी ने 2023 के चुनावों का बहिष्कार किया था। इन चुनावों में अवामी लीग को प्रचंड बहुमत मिला था लेकिन पश्चिमी देशों ने इन चुनावों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया था। बेगम खालिदा उस जमाते इस्लामी पार्टी की समर्थक थी जिसे शेख हसीना ने प्रतिबन्धित कर रखा था क्योंकि यह पाकिस्तान समर्थक है और इसके नेताओं ने 1971 के मुक्ति संग्राम में पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था। छह महीने पहले हुए चुनावों में बेगम खालिदा के पुत्र तारिक रहमान ने अपनी मां की मृत्यु के बाद लन्दन का निर्वासन त्याग कर नेशनलिस्ट पार्टी की बागडोर संभाली और चुनाव जीत कर प्रधानमन्त्री का पद संभाला। वह 18 वर्ष तक लन्दन में निर्वासित जीवन जीते रहे थे।
इसी प्रकार अब शेख हसीना के पुत्र सजीब जावेद अमेरिका में निर्वासित जीवन जी रहे हैं। शेख हसीना ने साफ कह दिया है कि उन्हें अपनी जान की परवाह नहीं है और इससे भी कोई मतलब नहीं है कि ढाका पहुंचने पर उनके साथ कैसा व्यवहार होता है, वह केवल अपने लोगों के हित के लिए स्वदेश जाना चाहती है। दिल्ली के लेडी श्रीराम कालेज की पढ़ी हुई शेख हसीना का यह हौंसला और देश प्रेम प्रशंसा के सर्वथा योग्य है।

Team Desk