पंजाब में गुरु ग्रन्थ साहिब की बेअदबी के खिलाफ सख्त कानून की मांग लंबे समय से उठती रही है। ऐसे में जब सरकार इस दिशा में कदम बढ़ाती है, तो इसका स्वागत होना चाहिए था, मगर अफसोस कि कुछ राजनीतिक दल और धार्मिक नेतृत्व ही इसके विरोध में खड़े दिखाई देते हैं। विशेष रूप से शिरोमणि अकाली दल और बादल परिवार के दबाव में फंसे तख्त साहिबान के जत्थेदार साहिबान का रुख कई सवाल खड़े करता है। क्या यह विरोध वास्तव में सिद्धांतों पर आधारित है या इसके पीछे राजनीतिक सोच काम कर रही है? जिस प्रकार से जत्थेदार अकाल तख्त के द्वारा पंजाब विधानसभा के स्पीकर को अकाल तख्त पर तलब किया गया है वह दर्शाता है कि जत्थेदार गढ़गज किसी के दबाव में कार्य कर रहे हैं।
इतिहास पर नजर डालें तो स्वयं को पंथक कहलाने वाली सरकार के कार्यकाल में बेअदबी की घटनाएं सबसे अधिक हुई, लेकिन किसी प्रकार का कोई ठोस कानून लाकर दोषियों को सजा देने के बजाए उल्टा, बेअदबी के मामलों में शामिल लोगों को संरक्षण दिया गया, बेअदबी के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले निहत्थे सिखों पर गोलियां चलाने वाले अफसरों को तरक्कीयां दी गई। सबसे बड़ा विवाद उस समय सामने आया जब डेरा सच्चा सौदा मुखी गुरमीत राम रहीम, जिस पर बेअदबी के गंभीर आरोप लगे, उसे बिना श्री अकाल तख्त साहिब पर पेश हुए ही माफी दे दी गई।
इस फैसले ने न केवल संगत की भावनाओं को आहत किया, बल्कि पंथक संस्थाओं की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े किए। इतना ही नहीं सुखबीर सिंह बादल ने स्वयं श्री अकाल तख्त साहिब की फजील पर खड़े होकर अपने सभी गुनाहों को कबूला मगर बाद में यू टर्न ले लिया। जिससे साफ होता है कि अकालियों के लिए श्री अकाल तख्त साहिब कोई मायने नहीं रखता। आज जब पंजाब सरकार बेअदबी के खिलाफ सख्त कदम उठाने की बात कर रही है, तो वहीं लोग विरोध में क्यों खड़े हैं? अगर उस समय कार्रवाई होती, दोषियों को सजा मिलती और पंथक मर्यादा का पालन किया जाता, तो शायद आज इतनी बड़ी बहस की जरूरत ही नहीं पड़ती।
यह भी समझना जरूरी है कि बेअदबी का मुद्दा केवल कानून का नहीं, बल्कि आस्था और विश्वास का है। इसे राजनीति का अखाड़ा बनाना न तो उचित है और न ही पंथ के हित में। अगर वास्तव में कानून में खामियां हैं, तो उसे रचनात्मक तरीके से सामने लाया जाना चाहिए न कि हर कदम का अंधाधुंध विरोध किया जाना चाहिए। आज जरूरत है आत्ममंथन की। जो दल और नेता खुद को पंथक बताते हैं, उन्हें यह समझना होगा कि संगत सबकुछ देख रही है। अतीत की गलतियों को छुपाने के बजाय स्वीकार करना और सुधार की दिशा में आगे बढ़ना ही सही रास्ता है। पंजाब की जनता और सिख संगत की भावना साफ है, बेअदबी करने वालों को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए।
ऐसे में राजनीति से ऊपर उठकर, सभी को एकजुट होकर इस दिशा में काम करना चाहिए, ताकि आस्था की रक्षा हो और न्याय भी सुनिश्चित हो सके। गुरु का सिख अमन और शांति का सच्चा संदेशवाहक : सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी से लेकर दसम गुरु गोबिन्द सिंह जी ने सिखों को अमन और शान्ति का सन्देश दिया। गुरु नानक देव जी ने हजारों मील यात्राएं करते हुए दुनिया को हर मसले का हल संवाद से करने की प्रेरणा दी। गुरु अर्जुन देव जी से शहादतों का दौर शुरु हुआ और फिर गुरु हरि गोबिन्द सिंह जी ने दुश्मनों से मुकाबले हेतु तलवार उठाई मगर एक नहीं दो तलवार, जिन्हे मीरी और पीरी की बताया भाव मीरी (सांसारिक सत्ता और न्याय की रक्षा) की प्रतीक थी और दूसरी पीरी (आध्यात्मिकता, भक्ति और गुरु की राह) की।
गुरु गोबिन्द सिंह जी ने खालसा पंथ की सिरजना करते समय हर अमृतधारी सिख के लिए पांच ककारों में भी कृपाण को शामिल किया मगर इसके साथ ही यह भी सन्देश दिया कि इसका प्रयोग केवल जुल्म और अन्याय के खिलाफ करना है, कभी भी किसी निहत्थे यां मजलूम पर इसका प्रयोग नहीं करना। सिख इतिहास और परंपरा को यदि गहराई से समझा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि “गुरु का सिख” केवल एक धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि एक उच्च जीवन दर्शन का प्रतीक है, जिसका मूल आधार है अमन, शांति, सेवा और मानवता। आज के समय में, जब समाज में तनाव, विभाजन और असहिष्णुता बढ़ती दिखाई देती है, तब गुरु की शिक्षाओं का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। सिख गुरुओं ने हमेशा मानवता को सर्वाेपरि रखा।
गुरु का सिख कभी भी नफरत, हिंसा या विभाजन की राह पर नहीं चलता। उसका पहला कर्त्तव्य है समाज में प्रेम, सेवा और सद्भाव को बढ़ावा देना। आज के दौर में, जब कई बार धर्म के नाम पर कट्टरता और टकराव देखने को मिलता है, तब यह और भी जरूरी हो जाता है कि गुरु के सिख अपनी असली पहचान को समझें और उसे जीवन में उतारें। सोशल मीडिया हो या सार्वजनिक जीवन, हर जगह शांति, संयम और सच्चाई का संदेश देना ही सच्ची “सेवा” है। इस दौर में भी अनेक सिख ऐसे हैं जो आज भी ना सिर्फ स्वयं गुरु के दिखाए मार्ग पर चलते हैं बल्कि दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करते दिखते हैं।
इनमें से एक नाम सरदार गुरलाड सिंह काहलो का आता है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन सेवा को समर्पित किया हुआ है। मुझे आज भी याद है जब बीते समय में केदारनाथ, बद्रीनाथ में सुनामी आई तो उन्होंने अपनी पूरी टीम के साथ कई दिनों तक वहां जाकर सेवा निभाते हुए अनेक जानें बचाई। कोविड के दौरान अपनी जान की परवाह ना करते हुए सांसों तक के लंगर लगा दिए। उनकी संस्था ना सिर्फ देश बल्कि विदेशों में भी अमन और शान्ति के लिए कार्यरत है। हाल ही छिड़ी जंग के दौरान ईरान के लोगो की मदद हेतु सबसे पहले मददगार बनने का सौभाग्य भी शायद इन्हें ही प्राप्त हुआ हालांकि उसके बाद अनेक लोग आगे आकर मदद करते दिखाई दिए।
दोसांझ वाले का खालिस्तानियों को दो टूक जवाब : हाल के समय में मशहूर पंजाबी कलाकार दिलजीत दोसांझ एक बार फिर चर्चा में हैं, लेकिन इस बार कारण केवल उनका संगीत नहीं, बल्कि उनका स्पष्ट और संतुलित रुख है। पहले कुछ कट्टरपंथी समूहों ने उन्हें सिर्फ “पंजाबी” कहने पर देशद्रोही साबित करने की कोशिश की थी, वहीं अब उनके शो में खालिस्तानी झंडों के साथ आए लोगों को बाहर जाने और झंडे हटाने के लिए कहना एक बड़ा संदेश देता है। यह घटना कई भ्रमों को तोड़ती है। एक ओर जहां कुछ तथाकथित खालिस्तानी तत्व सिख समुदाय को अपनी विचारधारा से जोड़ने की कोशिश करते हैं, वहीं दूसरी ओर गैर सिख समूह हर सिख पहचान को शक की नजर से देखने लगते हैं।
उनके द्वारा अपने मंच से खालिस्तानी झंडों का विरोध यह स्पष्ट करता है कि सिख समुदाय की मुख्यधारा ऐसी विचारधाराओं से सहमत नहीं है। यह उन लोगों के लिए भी जवाब है जो हर सिख को खालिस्तान से जोड़कर देखते हैं। यह भी जरूरी है कि देश में पहचान को लेकर फैलाए जा रहे भ्रम को समझा जाए। “पंजाबी” होना, “सिख” होना या अपनी संस्कृति पर गर्व करना कभी भी देशविरोध नहीं हो सकता। भारत की ताकत उसकी विविधता में है, और हर पहचान उसी का एक हिस्सा है। आज आवश्यकता है कि ऐसे सकारात्मक संदेशों को आगे बढ़ाया जाए और समाज में फैल रही कट्टरता, चाहे वह किसी भी तरफ से हो, उसेे रोका जाए। किसी भी समुदाय को एक संकीर्ण नजरिए से देखना न केवल गलत है, बल्कि देश की एकता के लिए भी नुकसानदायक है।


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