अशांत विश्व और अमेरिका का विरोधाभासी एजेंडा

Summary :

वैश्विक राजनीति के रंगमंच पर संयुक्त राज्य अमेरिका एक ऐसे अभिनेता की तरह रहा है जो हर नए नाटक की शुरुआत तो बड़े धमाके के साथ करता है, लेकिन उसके अंत की पटकथा लिखे बिना ही बीच मजधार में पर्दा गिरा देता है। इतिहास से लेकर वर्तमान तक, दुनिया ने अमेरिका की इस खास युद्ध-नीति को बार-बार देखा है-पहले किसी देश में लोकतंत्र बहाल करने या आतंकवाद को मिटाने के नाम पर सीधे सैन्य हस्तक्षेप करना, वहां सालों तक खूनी संघर्ष को खींचना और फिर जब घरेलू राजनीति या आर्थिक दबाव बढ़ता है तो अचानक युद्ध को बीच में ही…

वैश्विक राजनीति के रंगमंच पर संयुक्त राज्य अमेरिका एक ऐसे अभिनेता की तरह रहा है जो हर नए नाटक की शुरुआत तो बड़े धमाके के साथ करता है, लेकिन उसके अंत की पटकथा लिखे बिना ही बीच मजधार में पर्दा गिरा देता है। इतिहास से लेकर वर्तमान तक, दुनिया ने अमेरिका की इस खास युद्ध-नीति को बार-बार देखा है-पहले किसी देश में लोकतंत्र बहाल करने या आतंकवाद को मिटाने के नाम पर सीधे सैन्य हस्तक्षेप करना, वहां सालों तक खूनी संघर्ष को खींचना और फिर जब घरेलू राजनीति या आर्थिक दबाव बढ़ता है तो अचानक युद्ध को बीच में ही रोककर या अचानक वहां से सेनाएं वापस बुलाकर पूरे क्षेत्र को भारी राजनीतिक अस्थिरता, अराजकता और अशांति के दलदल में धकेल देना।

वर्तमान परिदृश्य में वाशिंगटन की विदेश नीति किसी स्पष्ट सिद्धांत पर चलती नहीं दिखती, बल्कि वह तात्कालिक प्रतिक्रियाओं और अनिश्चितताओं का एक ऐसा कोलाज बन चुकी है जिसने दुनिया भर के मित्र देशों और विरोधियों दोनों को गहरे असमंजस में डाल दिया है। अमेरिकी प्रतिबद्धताओं में दिखने वाली यह रणनीतिक अस्पष्टता और ‘कभी युद्ध-कभी शांति’ की नीति आज वैश्विक अशांति का सबसे बड़ा कारण बन चुकी है। यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें तो शीत युद्ध के बाद से ही अमेरिका ने खुद को दुनिया का ‘ग्लोबल पुलिसमैन’ घोषित कर दिया था।

वियतनाम से लेकर अफगानिस्तान, इराक और लीबिया तक, अमेरिका का हर सैन्य अभियान एक ही ढर्रे पर आगे बढ़ा। 2001 में ‘वार ऑन टेरर’ के नारे के साथ अमेरिका अफगानिस्तान में दाखिल हुआ। दो दशकों तक वहां खरबों डॉलर बहाए गए, लाखों जिंदगियां तबाह हुईं, लेकिन अगस्त 2021 में जो हुआ उसने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया। अमेरिकी सेना ने बिना किसी मजबूत राजनीतिक विकल्प या शांति समझौते के, रातों-रात काबुल छोड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि जिस तालिबान को मिटाने अमेरिका वहां गया था, वही तालिबान फिर से सत्ता पर काबिज हो गया और पूरा अफगानिस्तान आज मानवीय और आर्थिक संकट से जूझ रहा है।

यही कहानी इराक की भी रही, जहां ‘सामूहिक विनाश के हथियारों’ का झूठा नैरेटिव गढ़कर 2003 में आक्रमण किया गया। वहां के स्थापित तंत्र को ध्वस्त करने के बाद अमेरिका ने सत्ता का जो शून्य छोड़ा, उसी की कोख से आईएसआईएस जैसे खूंखार आतंकवादी संगठन का जन्म हुआ, जिसने पूरे मध्य पूर्व को दशकों पीछे धकेल दिया। इन तमाम युद्धों में एक बात समान थी कि अमेरिका युद्ध शुरू करने का हुनर तो जानता था लेकिन उसे सम्मानजनक और तार्किक रूप से समाप्त करने की उसकी कोई नीति नहीं थी। अमेरिका की इस विरोधाभासी और अस्थिर नीति का सबसे ताजा और भयानक उदाहरण मध्य पूर्व में जारी वर्तमान संकट है।

साल 2026 की शुरुआत में ही अमेरिका ने इराक पर 2003 के आक्रमण के बाद से मध्य पूर्व में अपना सबसे बड़ा सैन्य जमावड़ा किया। ईरान के परमाणु कार्यक्रम और वहां भड़के आंतरिक विरोध- प्रदर्शनों के बाद बढ़ते तनाव के बीच फरवरी 2026 में अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ नाम से ईरान पर भीषण हवाई और मिसाइल हमले शुरू कर दिए। इस सैन्य अभियान ने पूरे ईरान और मध्य पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था को हिलाकर रख दिया। लेकिन इसके ठीक बाद अमेरिकी नीति का वही पुराना ‘शुरू करो और फिर रोक दो’ वाला ढर्रा दोबारा देखने को मिला।

जून 2026 में ईरान के साथ एक अस्थायी समझौता करने की कोशिश की गई, लेकिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यावसायिक जहाजों पर बढ़ते हमलों के बाद जुलाई 2026 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक इस युद्ध विराम को समाप्त घोषित कर दिया और दोबारा बमबारी तेज कर दी। इसके विपरीत, ठीक दो हफ्ते बाद जुलाई के आखिरी हफ्ते में बिना किसी अंतिम निष्कर्ष के व्हाइट हाउस और पेंटागन की आंतरिक बैठकों में गोला-बारूद के स्टॉक की कमी और युद्ध के और अधिक फैलने की चिंताओं के कारण इन हमलों पर अचानक ‘अस्थायी रोक’ लगा दी गई।

यह वर्तमान स्थिति दर्शाती है कि अमेरिका एक तरफ तो बड़े सैन्य अभियानों की घोषणा करता है, लेकिन दूसरी तरफ उसके पास इस बात का कोई दीर्घकालिक खाका नहीं होता कि इस युद्ध का अंत क्या होगा। इस राजनीतिक अवसरवाद के कारण वाशिंगटन की नीतियां हर चार साल में बदल जाती हैं। दूसरा कारण हार्ड पावर बनाम अलगाववाद का अंतद्वंद्व है। वर्तमान अमेरिकी प्रशासन एक तरफ तो वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने के लिए कड़े ऑपरेशन चलाता है और ईरान पर युद्ध थोपता है, तो दूसरी तरफ वह पारंपरिक नाटो सहयोगियों को अपनी रक्षा खुद करने की नसीहत देकर वैश्विक सुरक्षा तंत्र से पीछे हटने की बात करता है। यह विरोधाभास वैश्विक स्तर पर अमेरिका की विश्वसनीयता को पूरी तरह खत्म कर रहा है।

तीसरा बड़ा कारण वहां का रक्षा बजट और सैन्य-औद्योगिक परिसर का दबाव है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा वहां की हथियार बनाने वाली कंपनियों के मुनाफे पर टिका है। इन ताकतों के दबाव में अमेरिका को अपने पैर हमेशा किसी न किसी युद्ध में फंसाए रखने पड़ते हैं ताकि हथियारों की खपत जारी रहे, भले ही उस युद्ध का कोई तार्किक अंत न हो। इसके अलावा रणनीतिक प्राथमिकताओं में भारी भ्रम है। अमेरिका का रक्षा मंत्रालय अपनी ‘नेशनल डिफेंस स्ट्रैटेजी’ में बार-बार अपने प्राथमिक दुश्मनों को बदलता रहता है। कभी उसका ध्यान चीन और ताइवान के संकट पर केंद्रित होता है तो कभी वह अचानक रूस-यूक्रेन युद्ध में अरबों डॉलर झोंकने लगता है और अगले ही पल वह इन दोनों मोर्चों को छोड़कर मध्य पूर्व में ईरान के खिलाफ एक नया मोर्चा खोल देता है।

प्राथमिकताओं के इस लगातार बदलते भटकाव के कारण वह किसी भी एक मोर्चे पर स्थिरता स्थापित नहीं कर पाता।
अमेरिका की इन दोहरी और ढुलमुल नीतियों का खामियाजा आज पूरी दुनिया भुगत रही है। भारत और ग्लोबल साउथ के अन्य देशों के साथ भी अमेरिका का व्यवहार लगातार अपनी विश्वसनीयता खो रहा है। कभी वह भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों को अपना सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बताता है तो दूसरी तरफ वह अपने आर्थिक हितों के लिए उन पर भारी टैरिफ थोप देता है और ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण देशों से तेल आयात अचानक बंद करने का एकतरफा दबाव बनाता है।

संयुक्त राज्य अमेरिका की वर्तमान नीतियां यह साफ दर्शाती हैं कि वह केवल एक महाशक्ति के अहंकार से ग्रसित है, जिसके पास युद्ध शुरू करने की अकूत ताकत तो है, लेकिन उस युद्ध से पैदा होने वाली मानवीय tragedy, आर्थिक तबाही और राजनीतिक शून्यता की जिम्मेदारी लेने का माद्दा नहीं है। हर कुछ समय बाद युद्ध शुरू करना, उसे बीच में ही अधूरा छोड़ देना, फिर किसी नए मोर्चे पर कूद जाना और अपने सहयोगियों को बीच रास्ते में अकेला छोड़ देना-यह अमेरिकी विदेश नीति का एक ऐसा ढर्रा बन चुका है जो वैश्विक शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

जब तक वाशिंगटन अपनी रणनीतिक अस्पत्ता को छोड़कर एक पारदर्शी, स्थिर और जिम्मेदार वैश्विक नीति नहीं अपनाता, तब तक दुनिया के, अलग-अलग कोनों से सुलगती युद्ध की ये चिंगारियां कभी शांत नहीं होंगी और अमेरिका का यह अनसुलझा एजेंडा वैश्विक अशांति का मुख्य कारक बना रहेगा।

Team Desk