उत्तर प्रदेश में भाजपा का राजनीतिक ग्राफ

Summary :

उत्तर प्रदेश न केवल भारत का सबसे बड़ी आबादी वाला प्रदेश है बल्कि यह देश की संसद में सर्वाधिक 80 लोकसभा सदस्य भेजने वाला राज्य भी है। इसी वजह से कहा जाता है कि नई दिल्ली में राष्ट्रीय सरकार बनाने का रास्ता इस राज्य की राजधानी लखनऊ से होकर ही गुजरता है। मगर भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन से लेकर आजादी के बाद तक इस राज्य की राष्ट्रीय राजनीति में केन्द्रीय भूमिका भी रही है। चाहे वह कांग्रेस पार्टी का अहिंसक सत्याग्रह आन्दोलन हो या क्रान्तिकारियों का सशस्त्र संघर्ष सभी में इस प्रदेश के लोगों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है।…

उत्तर प्रदेश न केवल भारत का सबसे बड़ी आबादी वाला प्रदेश है बल्कि यह देश की संसद में सर्वाधिक 80 लोकसभा सदस्य भेजने वाला राज्य भी है। इसी वजह से कहा जाता है कि नई दिल्ली में राष्ट्रीय सरकार बनाने का रास्ता इस राज्य की राजधानी लखनऊ से होकर ही गुजरता है। मगर भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन से लेकर आजादी के बाद तक इस राज्य की राष्ट्रीय राजनीति में केन्द्रीय भूमिका भी रही है। चाहे वह कांग्रेस पार्टी का अहिंसक सत्याग्रह आन्दोलन हो या क्रान्तिकारियों का सशस्त्र संघर्ष सभी में इस प्रदेश के लोगों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है। एेतिहासिक रूप से देखें तो इसी राज्य के वाराणसी व इलाहाबाद (प्रयागराज) शहरों से भारतीय दर्शन से लेकर सांस्कृतिक चेतना की धारा बहती रही है। मध्य युगीन भक्ति आन्दोलन से लेकर सुल्तानी व बादशाही दौर तक में यह राज्य पूरे भारत के लिए हिन्दू सांस्कृतिक व धार्मिक चेतना का प्रेरणास्रोत बना रहा है। भारत के हिन्दी साहित्य में भी इस प्रदेश का योगदान अतुलनीय रहा है अतः स्वतन्त्रता के बाद की राजनीति में इस प्रदेश में जिस प्रकार राष्ट्रवादी सोच पर आधारित जनसंघ (भाजपा) की राजनीति को आधार मिला उसके बहुआयामी कारण रहे। यह आश्चर्य हो सकता है कि देश के 1952 में हुए प्रथम आम चुनावों में इस प्रदेश से जनसंघ का एक भी प्रत्याशी नहीं चुना गया और इसके तीनों सांसद प. बंगाल व राजस्थान से चुन कर आये। इनमें से दो प. बंगाल से थे और एक राजस्थान से। प. बंगाल की एक सीट पर जनसंघ के संस्थापक स्व. डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी स्वयं थे। परन्तु 1957 के चुनावों से लेकर आज तक जनसंघ का नया स्वरूप भाजपा लगातार प्रगति करती रही और अब हालत यह है कि 2017 से उसकी राज्य में अपने दम पर सरकार काबिज है। इस प्रदेश की राजनीति में वर्ष 1992 से गुणात्मक अन्तर आना शुरू हुआ। इस अन्तर का आकर्षण इतना गहरा था कि देश के अन्य उत्तर- पश्चिम राज्यों में भी भाजपा का वह विमर्श राजनीति का केन्द्र बना जो उत्तर प्रदेश से ही निकला था। यह विमर्श अयोध्या में श्री राम मन्दिर निर्माण आन्दोलन से उपजा था जिसके जनक तत्कालीन भाजपा नेता श्री लाल कृष्ण अडवानी थे। अडवानी जी ने उस समय अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण का विमर्श विश्व हिन्दू परिषद के हाथ से छीना था क्योंकि उस समय अयोध्या में बाबरी म​िस्जद के स्थान पर राम जन्मभूमि मन्दिर बनाने का बीड़ा इसके अध्यक्ष विष्णु हरि डालमिया व महासचिव बाबू दाऊदयाल खन्ना लिये हुए थे। श्री अडवानी ने इसे भाजपा के मंच से आवाज देकर सांस्कृतिक पुनर्जागरण का राग अलापा और देखते-देखते ही उनका आन्दोलन जन आन्दोलन में परिवर्तित होने लगा जिसे बाद में स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्रीय आन्दोलन की संज्ञा दी। सांस्कृतिक पुनर्जागरण के इस आन्दोलन ने न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे उत्तर पश्चिम भारत की राजनीति को बदल कर रख दिया और दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य पर भी दस्तक दे दी। लेकिन इससे पहले ही 1967 में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनसंघ पार्टी कांग्रेस के बाद सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी थी और इसे प्रमुख विपक्षी दल का रुतबा हासिल हो चुका था। 1967 के विधानसभा चुनावों में जनसंघ की कुल 101 सीटें (दो निर्दलीयों के शामिल होने के बाद) आयी थीं और कांग्रेस को किनारे पर ही बहुमत मिला था मगर इस पार्टी से तब स्व. चौधरी चरण सिंह ने विद्रोह कर दिया था और 14 विधायकों के साथ वह कांग्रेस से बाहर आ गये थे। इससे विधानसभा में कांग्रेस अल्पमत में रह गई थी और समाजवादी नेता स्व. डा. राम मनोहर लोहिया के गैर कांग्रेसवाद के आह्वान के चलते राज्य में पहली बार गैर कांग्रेसी संयुक्त विधायक दल (संविद) की सरकार का गठन हुआ था। हालांकि यह सरकार कांग्रेस से निकले स्व. चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में ही गठित हुई थी मगर इस सरकार में कम्युनिस्ट भी शामिल थे और जनसंघ भी। संविद में सबसे बड़ी पार्टी होने की वजह से जनसंघ के नेता स्व. रामप्रकाश गुप्ता को उप मुख्यमन्त्री पद दिया गया और उन्हें शिक्षा मन्त्रालय दिया गया। मगर यह सरकार आन्तरिक मतभेदों के चलते ज्यादा दिन नहीं चल सकी और अगले साल ही गिर गई। इसके अगले साल 1969 में राज्य में मध्यावधि चुनाव घोषित कर दिये गये। इस वर्ष से राज्य की राजनीति ने एक बार फिर करवट ली। इस साल स्व. चरण सिंह ने अपनी नई पार्टी भारतीय क्रान्ति दल के गठन की घोषणा की और सभी विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे। चरण सिंह चूंकि मूलतः ग्रामीण व किसान नेता थे अतः उनके साथ राज्य की सभी खेतीहर जातियों के मतदाताओं ने स्वयं को जोड़ा और जनसंघ के विशुद्ध हिन्दू मूलक राष्ट्रवाद से स्वयं को इसलिए छिटकाया क्योंकि चरण सिंह राजनीति में ग्रामीणों की समस्याओं को केन्द्र में ले आये थे। चरण सिंह कह रहे थे कि भारत का सर्वांगीण विकास केवल गांधीवादी आर्थिक दर्शन अपनाने से ही हो सकता है जिसके लिए विकास की उस धारा को पलटना होगा जो कि देश में बड़े- बड़े उद्योग स्थापित करके शहरों को पूंजी केन्द्र बना कर बह रही है। चरणसिंह ने विशुद्ध आर्थिक पक्ष को पकड़कर गांवों के विकास की विचारधारा को स्थापित किया और सम्पूर्ण ग्रामीण जगत को धर्म व जाति के निरपेक्ष एक झंडे के नीचे लाने का भगीरथ प्रयास किया इससे सबसे बड़ा नुकसान कांग्रेस व जनसंघ को हुआ। एक तरफ कांग्रेस का खेतीहर जातियों का वोट बैंक बिखर गया और दूसरी तरफ जनसंघ का गांवों में पैठ बनाने का स्वप्न टूट गया। बेशक इन 1969 के चुनावों मे जनसंघ ने हवा का रुख देखते हुए यह नारा दिया था
हर हाथ को काम, हर खेत को पानी
घर-घर में दीपक जनसंघ की निशानी
मगर ग्रामीण इलाकों से जनसंघ को समर्थन नहीं मिल पाया और इस वर्ष हुए चुनावों में इसकी विधायक संख्या घट कर 49 रह गई जबकि चौधरी साहब के भारतीय क्रान्ति दल के 117 विधायक बन गये। इसके बाद के वर्षों में राज्य की राजनीति में बहुत उतार-चढ़ाव आये जिनमें 1971 में स्व. इन्दिरा गांधी की कांग्रेस के विजय अभियान से लेकर 1977 में जनता पार्टी की उल्टी पटखनी भी शामिल है मगर 1992 में राम मन्दिर आन्दोलन से भाजपा का जो विजय अभियान शुरू हुआ था वह निर्बाध रूप से इस हकीकत के बावजूद जारी रहा कि इस बीच में स्व. मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी व बहिन मायावती की बहुजन समाज पार्टी के उदय के बाद भी भाजपा अपना आकर्षण नहीं खो सकी। वर्तमान में राज्य में भाजपा की योगी आदित्यनाथ सरकार 2017 से काबिज है। इस सरकार को राज्य में कानून-व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त करने के लिए व हिन्दुत्व मूलक राष्ट्रवाद के लिए जाना जाता है। लेकिन समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी की जातिमूलक अल्पसंख्यक या मुस्लिम परक राजनीति के चलते भाजपा अपना दबदबा कायम रखने में कामयाब रही है। इसका एक कारण यह भी माना जाता है कि केवल कुछ विशेष ग्रामीण जातियों को छोड़कर भाजपा के साथ गांवों की श्रम परक जातियों के लोगों का जुड़ाव गहरा हुआ है। यह जुड़ाव पिछड़ों में भी अति पिछड़े कहे जाने वाले लोगों का है जबकि दलित जातियों में गैर रैदासी कही जाने वाली जातियों का है। मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ के समक्ष अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों के दौरान एेसी चुनौती आ सकती है कि विश्व विद्यालयों के युवा वर्ग में जातिगत आधार पर जो बंटवारा विश्व विद्यालय अनुदान आयोग के नये निर्देशों की वजह से हुआ है उसके बढ़ते प्रभाव को रोका जाये। फिलहाल तो सर्वोच्च न्यायालय ने इन निर्देशों पर रोक लगा दी है मगर इससे भाजपा के उस वोट आधार में बेचैनी शुरू हो गई है जो 1992 के बाद से इससे जुड़ा है। जाहिर है कि यह दौर 1969 का नहीं है क्योंकि राजनीति का कलेवर वर्तमान में पूरी तरह बदल चुका है परन्तु इससे नये सिरे से जातिवाद के सिर उठाने का खतरा तो मंडरा तो रहा ही है।

Team Desk