भाजपा ने क्या किया जो राहुल, तेजस्वी और प्रशांत नहीं कर पाए! बिहार के चुनाव परिणाम ने देश में एक नई बहस भी छेड़ दी है, लोगों के बीच अब इस मुद्दे पर बहस हो रही है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी के सामने किसी का भी चुनाव जीतना अब नामुमकिन है? ज्यादातर लोगों की राय यह बन रही है कि बीजेपी और पीएम मोदी को हराना नामुमकिन नहीं भी है तो यह मुश्किल जरूर है। फिर इसके अलग-अलग कारणों के विश्लेषण भी किए जाते हैं।
इसमें अधिकतर लोगों का मानना है कि बीजेपी अब एक चुनावी मशीन बन गई है जो पूरे समय काम करती रहती है। बीजेपी में नेताओं की भूमिका पहले तय हो जाती है और नेतृत्व के बनाए कार्यक्रम के अनुसार काम होता है। इसका उदाहरण है, बिहार के चुनाव में प्रमुख नेताओं की समय से पहले तैनाती। जब नीतीश कुमार 2022 में बीजेपी को छोड़ कर एक बार फिर आरजेडी के साथ चले गए थे तभी राष्ट्रीय महासचिव तावड़े को बिहार जा कर चुनाव की तैयारी में अभी से जुट जाने का निर्देश दे दिया था। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी तब सक्रिय होते हैं, जब चुनाव सिर पर होता है, धरातल पर ना तो उनकी टीम नजर आती है और ना सक्रिय कार्यकर्ता। भाजपा के लिए चुनाव तैयारी कोई पार्ट टाइम गेम नहीं है, बल्कि यह जनता से जुड़े रहने और मुद्दों के आसपास पार्टी को तैयार रखने का सतत् अभियान है।
भाजपा की जिस चुनावी रणनीति का लोग आज लोहा मान रहे हैं उसे विकसित करने और उसकी धार बनाए रखने की जिम्मेदारी स्वयं गृह मंत्री अमित शाह निभाते हैं। अमित शाह ने ही गुजरात में अपने कार्यकाल के दौरान चुनाव तंत्र को विकसित किया था और 2014 के बाद से इसे लगातार देशव्यापी अभियान का इसे हिस्सा बना रहे हैं। बीजेपी नेतृत्व को बिहार की नब्ज का अंदाज था। खास कर अमित शाह ने अपनी तीन महीने के धुआंधार दौरे से यह अंदाज लगा लिया था कि जनता क्या चाहती है और उसी के अनुसार जब केंद्र और राज्य सरकार ने बिहार की जनता की अपेक्षाओं को पूर्ण करने का काम पूरा किया तो जनता गद्गद् हो उठी। फिर जनता ने यह अनुमान भी लगा लिया कि केंद्र में मोदी की डबल इंजन सरकार के साथ बिहार तेज रफ्तार से प्रगति करेगा। वोट चोरी, ईवीएम सेटिंग आदि सब बचकाना बातें हैं। अमित शाह पहले नेता थे जिन्होंने एक चुनावी रैली में ही यह ऐलान कर दिया था कि इस बार एनडीए 160 से ज्यादा सीटें जीतेगा और बिहार में सरकार बनाएगा। फिर अंतिम चरण के मतदान से कुछ ही दिन पहले एक रैली में शाह ने फिर घोषणा की कि 14 नवंबर राजद और कांग्रेस परिवारों के राजनीतिक सफाए का दिन होगा। यदि अमित शाह ने चुनावी सफलता का कोई रिकार्ड बनाया है तो इसके पीछे उनका अनथक परिश्रम है। पार्टी में रणनीति और उस पर क्रियान्वयन के लिए पूरी तरह से समर्पित कार्यकर्ताओं के निर्माण की एक बड़ी प्रक्रिया है।
कांग्रेस का संगठन बिहार में भी गायब है और केवल गाली-गलौच की सुर्खियों तक ही सीमित है। इस बार बिहार में अमित शाह ने पार्टी को एकजुट और अनुशासित रखने में भी अपना भरपूर योगदान किया। चुनाव नजदीक आते-आते बागियों की संख्या नाम मात्र की रह गई। महादलित-पासी-पासवान मतदाताओं को लोजपा और मजबूत स्थानीय उम्मीदवारों के माध्यम से एकजुट करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी लेकिन आरजेडी अंत तक एमवाई समीकरण के भरोसे रह गए। कांग्रेस के पास उनको जोड़ने का ना कोई नारा था और न कोई नेता। इस मामले में राहुल गांधी केवल तेजस्वी पर निर्भर थे।
नीतीश कुमार अभी भी कोइरी-कुर्मी मतदाताओं के बीच अपना दबदबा सबसे ज्यादा रखते हैं, उसे कम करने का प्रयास भी आरजेडी ने नहीं किया। जदयू और भाजपा के नेतृत्व ने संयुक्त प्रचार अभियानों ने एनडीए के आधार को इन वर्गों में और मजबूत किया। अमित शाह ने उच्च-जाति समूहों में भी लगातार बैठकें की। आरजेडी ने दूरी बनाए रखी। बीजेपी ने अपना पहला फोकस महिलाओं पर रखा, क्योंकि उनको मालूम था कि परिवार की धुरी महिला चुनाव परिणाम में एक बड़ी भूमिका निभा सकती है। बीजेपी ने हर कार्यकर्ता को महिलाओं से जुड़ी एनडीए सरकार की योजनाओं को उन तक पहुंचाने का निर्देश दिया। बिहार में सीता मैया का भव्य मंदिर बने और उसका सीधा जुड़ाव अयोध्या के मंदिर से हो, यह बात बताना अमित शाह किसी भी रैली में नहीं भूले। राहुल और तेजस्वी इस तरह के मुद्दे को इस डर से नहीं उठाते कि मुसलमान नाराज हो जाएंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने जोरदार तरीके से विकास का एजेंडा लोगों के सामने रखा और बिहार को एकीकृत विकास पैकेज देने का भी वायदा किया। पीएम मोदी द्वारा जंगलराज और वंशवाद की राजनीति पर भी तीखा प्रहार किया गया, जिस पर राहुल और तेजस्वी का जवाब लोगों के समझ में नहीं आया। आरजेडी और कांग्रेस दोनों नीतीश सरकार के 20 साल के शासन के खिलाफ जनता में आक्रोश की उम्मीद करते रह गए और एनडीए उसी को अपने लिए विश्वास के प्लेटफॉर्म के रूप में बखूबी इस्तेमाल कर लिया। यहां कोई अलाउद्दीन का चिराग नहीं था, बल्कि नीतीश का कम था जो बोल रहा था। उनकी जबान नहीं काम शोर करता है।
विकास के मंत्र से भाजपा की अभूतपूर्व विजय
Summary :
भाजपा ने क्या किया जो राहुल, तेजस्वी और प्रशांत नहीं कर पाए! बिहार के चुनाव परिणाम ने देश में एक नई बहस भी छेड़ दी है, लोगों के बीच अब इस मुद्दे पर बहस हो रही है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी के सामने किसी का भी चुनाव जीतना अब नामुमकिन है? ज्यादातर लोगों की राय यह बन रही है कि बीजेपी और पीएम मोदी को हराना नामुमकिन नहीं भी है तो यह मुश्किल जरूर है। फिर इसके अलग-अलग कारणों के विश्लेषण भी किए जाते हैं। इसमें अधिकतर लोगों का मानना है कि बीजेपी अब एक चुनावी मशीन बन गई है…


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