देश के चार राज्यों तमिलनाडु केरल, असम व प. बंगाल के साथ एक केन्द्र प्रशासित क्षेत्र पुडुचेरी में गत माह सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में मतदाताओं ने जिस प्रकार का जनादेश दिया है उसने केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की झोली वोटों से भर दी है, मगर दूसरी ओर उसने कांग्रेस पार्टी को भी निराश नहीं किया है। एक तरफ असम, बंगाल व पुडुचेरी में जनता ने भाजपा व उसके गठबन्धन एनडीए को गद्दी सौंपी है तो दूसरी तरफ केरल में उसने कांग्रेस के गठबन्धन को सत्ता के आसन पर बैठा दिया है। मगर भाजपा को दोहरी सफलता मिली है। प. बंगाल में इस पार्टी ने धुआंधार धमाकेदार जीत दर्ज करके पिछले 15 वर्षों से शासन कर रही क्षेत्रीय पार्टी तृणमूल कांग्रेस से सत्ता छीन ली है।
इन चुनावों में प. बंगाल के चुनावों पर पूरे देश की नजर थी क्योंकि यहां भाजपा की तृणमूल कांग्रेस से सीधी टक्कर थी और भाजपा के पास कोई कद्दावर क्षेत्रीय नेता भी नहीं था। यह एक कड़ुवा सच है कि स्व. प्रोफेसर हरिपद भारती के बाद जनसंघ या भाजपा का राज्य में कोई ऐसा कद्दावर नेता नहीं हुआ है जिसके नेतृत्व को आगे रख कर पार्टी चुनावी मैदान में उतरती। अतः पार्टी ने प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ा, जिसकी रणनीति स्वयं गृहमन्त्री श्री अमित शाह ने बनाई। इससे यह भी सिद्ध हो गया कि श्री मोदी की लोकप्रियता में राष्ट्रीय स्तर पर किसी प्रकार की कमी नहीं आयी है।
राज्यों के ये चुनाव अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे पश्चिम एशिया युद्ध के साये में हुए जिसका असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा था। विपक्षी नेताओं ने इस युद्ध को लेकर श्री मोदी व उनकी सरकार की कड़ी आलोचना भी की मगर देश की जनता पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। युद्ध के कुप्रभावों से भारत को बचाने में मोदी सरकार ने जो रणनीति बनाई और पैट्रोल-डीजल व ईंधन गैस के दामों को जिस प्रकार थामे रखा, उसका असर यह पड़ा कि लोगों में सरकार की छवि बरकरार रही और इसका लाभ उसे चुनावों में भी मिला। इसके साथ ही इन राज्यों में जहां-जहां भी भाजपा मौजूद थी वहां उसके पक्ष में हवा चली।
असम व पुडुचेरी में पहले से ही भाजपा-एनडीए सरकारें थीं। इन राज्यों में सत्ता विरोधी लहर नहीं चल पाई और भाजपा को विजयश्री मिली। साथ ही बंगाल में जहां भाजपा विपक्ष में थी वहां इसे सत्ता कब्जाने में सफलता प्राप्त की। इसका प्रमुख कारण भी श्री मोदी की लोकप्रियता ही मानी जा रही है। मगर इसके पीछे हिन्दू-राष्ट्रवाद का सिद्धान्त भी काम कर रहा है जो कि भाजपा की मुख्य विचारधारा है। प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की ममता दी सरकार को हराना लोहे के चने चबाने जैसा था मगर यहां भी मोदी मैजिक काम आया, क्योंकि राज्य में प्रधानमन्त्री ने घोषणा कर दी थी कि राज्य के सभी भाजपा प्रत्याशियों को दिया गया वोट उन्हें ही दिया गया वोट समझा जायेगा। हालांकि इस राज्य में भाजपा को बहुत कड़ी मेहनत करनी पड़ी और अपने चुनाव प्रचार को बहुत धारदार बनाना पड़ा।
राज्य में ममता दी की पार्टी ने भाजपाई नेताओं को बाहरी बता कर जो प्रचार किया उसे जनता ने पसन्द नहीं किया और प्रखर राष्ट्रवाद के पक्ष में अपनी राय व्यक्त की। ऐसा पहली बार हुआ कि यह राज्य जनसंघ या भाजपा की झोली में गया। इससे इस पार्टी के संस्थापक डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना भी पूरा हुआ। बंगाल के भाजपा की झोली में आने के बाद अब गंगोत्री (उत्तराखंड) से लेकर गंगासागर (बंगाल) तक के राज्यों में भाजपा का शासन ही हो गया है। जहां तक केरल में कांग्रेस की जीत का सवाल है तो इस राज्य में भाजपा का कोई खास वजूद नहीं है मगर कांग्रेस ने यहां मार्क्सवादी पार्टी के गठबन्धन को पराजित करके सिद्ध कर दिया कि भारत जैसे धर्म प्राण देश में कम्युनिस्ट सिद्धान्तों की कोई आवश्यकता नहीं है।
केरल के अलावा साम्यवादियों का प्रभाव 2011 तक बंगाल में था। मगर इस वर्ष हुए राज्य चुनावों में ममता दी ने वामपंथियों को ठिकाने लगा दिया था। दरअसल बंगाल में शानदार जीत दर्ज करके भाजपा ने सभी राजनैतिक पंडितों को चौंकाया है क्योंकि इन चुनावों में चुनाव आयोग ही स्वयं एक मुद्दा बना हुआ था और ममता दी लगातार उसकी आलोचना इसलिए कर रही थीं कि इसने 91 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से सघन पुनरीक्षण के नाम पर काट दिये थे। इनमें से 27 लाख ऐसे थे जिन्होंने 2002 में या तो वोट डाला था अथवा उनका वंशावलि सम्बद्ध था। (चुनाव आयोग की मतदाता सूची में बने रहने की यह एक शर्त थी)।
इसके बावजूद राज्य में 93 प्रतिशत रिकार्ड मतदान हुआ था मगर फिर भी ममता दी के हाथ पराजय ही लगी। पुडुचेरी में एनडीए की पहले भी सरकार थी। लोगों ने इसी सरकार को दोहराने का मन बनाया। इसी प्रकार असम में भी श्री हेमन्त बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली भाजपा नीत सरकार को दोहराया गया। लेकिन दक्षिण के सबसे प्रमुख राज्य तमिलनाडु में इस बार फिल्म अभिनेता विजय की नई पार्टी ने जिस तरह बाजी मारी है और सत्तारूढ़ द्रमुक की स्टालिन सरकार को सत्ता से उतारा है वह भी कम आश्चर्यजनक नहीं है। राज्य में फिल्मी हस्तियों में नेतृत्व ढूंढने की अपनी अलग राजनैतिक परंपरा रही है। य़हां द्रमुक सरकार के मन्त्रियों ने जिस प्रकार हिन्दू संस्कृति को अपना निशाना बनाया था उसका दुष्प्रभाव भी मतदाताओं पर पड़ा। कुल मिलाकर ये चुनाव भारत में लोकतन्त्र को जीवन्त ही बनाते हैं।


Download Android App
Download iOS App




