चिंता का बड़ा कारण जीवनशैली से उपजते रोग

Summary :

ऐसी बीमारियां जो अस्वस्थ आदतों की वजह से होती हैं और इन्हें सही जीवनशैली से रोका जा सकता है, उन्हें जीवनशैली विकार कहते हैं। इस तरह की बीमारियों में डायबिटीज, मोटापा, ब्लड प्रेशर, हृदय संबंधी रोग और कैंसर तक शामिल हैं। विज्ञान और तकनीक के विकास के साथ ही लोगों की उन पर निर्भरता बढ़ रही है और शारीरिक गतिविधियां धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। इसके अलावा प्रिज़र्वेटिव बेस्ड जंक और प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता चलन, धूम्रपान और शराब का ज़्यादा सेवन शहरों से लेकर गांवों तक तेजी से बढ़ रहा है। शारीरिक गतिविधियों की कमी, ग़लत खानपान और…

ऐसी बीमारियां जो अस्वस्थ आदतों की वजह से होती हैं और इन्हें सही जीवनशैली से रोका जा सकता है, उन्हें जीवनशैली विकार कहते हैं। इस तरह की बीमारियों में डायबिटीज, मोटापा, ब्लड प्रेशर, हृदय संबंधी रोग और कैंसर तक शामिल हैं। विज्ञान और तकनीक के विकास के साथ ही लोगों की उन पर निर्भरता बढ़ रही है और शारीरिक गतिविधियां धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। इसके अलावा प्रिज़र्वेटिव बेस्ड जंक और प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता चलन, धूम्रपान और शराब का ज़्यादा सेवन शहरों से लेकर गांवों तक तेजी से बढ़ रहा है। शारीरिक गतिविधियों की कमी, ग़लत खानपान और तनाव मिलकर इन बीमारियों के लिए काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार हैं।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी एनएसओ की रिपोर्ट राष्ट्रीय चिंता बढ़ाने वाली है कि देश की पचास फीसदी आबादी जीवनशैली से जुड़े रोगों से ग्रस्त-त्रस्त हैं। यह भी चिंता बढ़ाने वाला है कि एक दशक पहले देश में खान-पान, जीवन व्यवहार व तनाव से उपजे रोगों का प्रतिशत जहां 31 था, वो अब पचास फीसदी तक जा पहुंचा है। वहीं एक अच्छी बात यह है कि चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार व नये शोध अनुसंधान के चलते संक्रामक रोगों का प्रतिशत घटा है लेकिन हमारे खानपान व जीवन व्यवहार में तेजी से आ रहे बदलावों के चलते लोग मोटापे, मधुमेह, तनाव व उच्च रक्तचाप जैसे रोगों के शिकार हो रहे हैं, जिसके चलते जानलेवा संकट भी बढ़ रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) के अनुसार साल 2021 में ग़ैर संचारी रोगों से होने वाली मौतों का आंकड़ा 43 मिलियन से ज़्यादा है। इनमें से 82 फीसद मौतें निम्न और मध्यम आय वाले देशों में होती हैं। इनमें सबसे ज़्यादा मौतें हृदय से जुड़ी बीमारियों के कारण होती हैं। 2021 में यह आंकड़ा 19 मिलियन था। इसके बाद कैंसर, सांस संबंधी बीमारियों और डायबिटीज का नंबर आता है। आंकड़ों से साफ पता चलता है कि जीवनशैली से संबंधित बीमारियां दुनियाभर में ख़ासतौर पर भारत जैसे देशों में कितनी ज़्यादा ख़तरनाक साबित हो रही हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि आजादी के बाद देश में आम आदमी के जीवन स्तर में किसी न किसी तरह सकारात्मक बदलाव आया है, जिसके चलते जीवनशैली भी बदली है लेकिन पौष्टिक व शरीर की जरूरतों के अनुकूल भोजन न करने, शारीरिक निष्क्रियता, स्क्रीन टाइम बढ़ने से नींद की कमी आदि अनेक ऐसे कारण हैं जो इन रोगों के वाहक बनते हैं।

इसमें आनुवंशिक रोगों की भी भूमिका है। धीरे-धीरे शरीर को खोखला करने वाले ये रोग कालांतर जानलेवा बन जाते हैं। अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन भी चिंता जता रहे हैं कि भारत में विभिन्न रोगों से मरने वाले ज्यादातर लोगों की मौत की वजह संक्रामक रोग के बजाय जीवनशैली से जुड़े रोग हैं। जो हमारी गभीर चिंता का विषय होना चाहिए। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि चिकित्सा विज्ञान की आशातीत प्रगति के चलते आम भारतीय की जीवन प्रत्याशा में इजाफा हुआ है लेकिन जीवनशैली से जुड़े रोगों का बढ़ना इस कामयाबी पर पानी फेरने जैसा है। यही वजह है कि देश में स्वास्थ्य बीमा कारोबार में तेजी आई है, यह तेजी ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक है। लेकिन ये बीमा कंपनियां रोग से बचाव में मदद करने के बजाय व्यक्ति के रोगों के इलाज को प्राथमिकता देती हैं।

देर रात तक मोबाइल व इंटरनेट पर सोशल मीडिया में सक्रिय रहने से हमारी नींद में खलल पड़ा है। नींद पूरी न होने से तनाव व अवसाद बढ़ा है। हमारा देर से भोजन करना, देर से सोना और सुबह देर से उठना भी रोगों का कारक बना है। हमने जबसे खाने में पारंपरिक पौष्टिकता के बजाय स्वाद को प्राथमिकता देनी शुरू की है, तभी से शरीर में जरूरी विटामिनों की कमी बढ़ी है। प्रदूषित खान-पान की भी इस संकट में भूमिका है।

डबल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार, वयस्कों को हर हफ्ते कम से कम 150 मिनट हल्की शारीरिक गतिविधियों वाली एक्सरसाइज या 75 मिनट तक इंटेंस एक्सरसाइज करना चाहिए। इससे न सिर्फ़ वजन को कंट्रोल किया जा सकता है, बल्कि यह हृदय रोग, तनाव और डायबिटीज जैसे दूसरे जीवनशैली विकारों से भी बचाव करता है। किसी एक सदस्य की बीमारी केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती है बस बल्कि उससे पूरा परिवार, समाज और देश प्रभावित होता है। जब व्यक्ति बीमारियों की वजह से अपनी दिनचर्या ख़ुद नहीं संभाल पाता तो परिवार के दूसरे सदस्यों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। इससे न सिर्फ़ बीमार व्यक्ति बल्कि घर के दूसरे सदस्यों की मानसिक सेहत पर भी बुरा असर पड़ता है।

भारत जैसे मध्य और निम्न आय वर्ग वाले देशों में इलाज़ का बोझ परिवार का बजट खराब कर देता है और बहुत बार तो पूरा परिवार कर्ज़ के बोझ तले दब जाता है। यह बीमारियां कामकाजी लोगों की प्रॉडक्टिविटी पर भी असर डालती हैं। इसके अलावा बीमार की आसामयिक मौत परिवार के लिए जीवन भर का ट्रॉमा भी बन जाती है। हालांकि देश में जीवनशैली से जुड़े रोगों से बचाव के लिये जागरूकता जरूर आई है। जिसके लिये एनडीए सरकार को श्रेय देना होगा। प्रधानमंत्री के प्रयासों से योग का दुनिया में व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ है। यह जागरूकता भारत में भी है। लेकिन बड़ी आबादी अब भी इससे दूर है।

प्रधानमंत्री ‘मन की बात’ रेडियो कार्यक्रम व अन्य मंचों से मोटापे से बचाव और खानपान में मिलेट अपनाने पर अक्सर बल देते नजर आते हैं। लेकिन इस पर सकारात्मक प्रतिसाद अपेक्षित अनुपात में नहीं मिल पाया है। यही वजह है कि लोगों को महंगा इलाज कराने को बाध्य होना पड़ता है। ऐसी बीमारियां जिन्हें हम सेहतमंद आदतें और खान-पान अपना कर रोक सकते हैं उनके रोकथाम के लिए कोशिश करना बेहद ज़रूरी है। बीमारी शुरू होने से पहले अगर उसे रोका जा सके, तो यह इलाज़ करवाने से बेहतर होता है। जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां धीरे-धीरे शरीर को खोखला करती हैं लेकिन सजग रहकर और स्वस्थ आदतों को अपनाकर इनसे न केवल बचा जा सकता है बल्कि एक खुशहाल जीवन भी जिया जा सकता है।

Team Desk