चालू है महिला वोटरों को लुभाना

Summary :

जनता को अब विशेष रूप से महिला वोटरों को सरकारों की तरफ से बहुत कुछ मुफ्त में मिल रहा है, जो उन्हें रास भी आ रहा है। भगवा पार्टी ने बिहार-महाराष्ट्र व बंगाल में महिला वोटरों के कंधों पर सवार होकर जब से चुनावी वैतरणी पार की है, लोग कह रहे हैं ​िक इसे उसने अपना एक अचूक चुनावी हथियार बना लिया है। ताजा मामला यूपी विधानसभा चुनाव से जुड़ा है जहां आने वाले कुछ महीनों में चुनाव होने हैं, अब योगी सरकार राज्य की महिलाओं के लिए 50 हजार रुपए तक की एक नई सहायता योजना लाने पर विचार…

जनता को अब विशेष रूप से महिला वोटरों को सरकारों की तरफ से बहुत कुछ मुफ्त में मिल रहा है, जो उन्हें रास भी आ रहा है। भगवा पार्टी ने बिहार-महाराष्ट्र व बंगाल में महिला वोटरों के कंधों पर सवार होकर जब से चुनावी वैतरणी पार की है, लोग कह रहे हैं ​िक इसे उसने अपना एक अचूक चुनावी हथियार बना लिया है। ताजा मामला यूपी विधानसभा चुनाव से जुड़ा है जहां आने वाले कुछ महीनों में चुनाव होने हैं, अब योगी सरकार राज्य की महिलाओं के लिए 50 हजार रुपए तक की एक नई सहायता योजना लाने पर विचार कर रही है। इन लोकलुभावन नारों के आगाज़ का श्रेय आप यूपी में सपा मुखिया अखिलेश यादव को दे सकते हैं जिन्होंने तुर्रा उछाला कि ‘अगर इस चुनाव में प्रदेश में सपा की सरकार आई तो प्रांत की हर महिला को प्रति वर्ष 40 हजार रुपए देंगे।’ यानी हर महीने महिलाओं को तीन हजार रुपए प्रति माह से ज्यादा की रकम मिलेगी।
अभी तक महिलाओं को सबसे ज्यादा ढाई हजार रुपए प्रति माह की दर से झारखंड सरकार की ‘मइया सम्मान योजना’ में और दिल्ली सरकार की ‘लक्ष्मी योजना’ के तहत मिल रहा है। पर दिल्ली सरकार की यह योजना कोई डेढ़ साल बाद इस 26 अगस्त को शुरू हुई है। अन्य राज्यों की बात करें तो महाराष्ट्र में ‘माझी लाड़की बहिन योजना’ के तहत महिलाओं को हर माह डेढ़ हजार तो पश्चिम बंगाल की ‘लक्ष्मी भंडार योजना’ के तहत इन्हें हर माह 1500 से 1700 रुपए दिए जाते हैं। ऐसी योजनाओं के अलख जगाने का श्रेय आप मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को दे सकते हैं जिनकी ‘लाडली बहना योजना’ चुनाव जितवाने का एक अचूक मंत्र साबित हुई थी।
सरकार पर बढ़ता आर्थिक बोझ
एक स्वतंत्र एजेंसी पीआरएस की एक रिपोर्ट से खुलासा होता है महिला वोटरों को लुभाने वाली ऐसी लोक लुभावनी योजनाएं जो आम तौर पर लाभार्थी महिलाओं के खातों में ‘डायरेक्ट कैश ट्रांसफर’ द्वारा संचालित होती हैं, अगर 2025-26 के आंकड़ों की बात करें तो ऐसी बिना शर्त कैश ट्रांसफर करने के मद में केवल 12 राज्यों ने 1.68 लाख करोड़ से ज्यादा रकम खर्च कर दी है। अगर हम इन योजनाओं की तुलना में मनरेगा (अब जीरामजी स्कीम) को देखें तो यहां केंद्र सरकार की ओर से वित्तीय वर्ष 25-26 में सिर्फ 86 हजार करोड़ का ही आबंटन हुआ है। अगर इन लोक लुभावन योजनाओं के नजरिए में राज्य सरकारों के राजस्व घाटों को देखा जाए तो इन 12 में से 6 राज्य तो ऐसे हैं जो अपने राजस्व घाटे से उबर ही नहीं पा रहे। आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक जहां इन 12 राज्यों का संयुक्त सकल राजकोषीय घाटा वित्तीय वर्ष 2021-22 में जहां 2.6 जीएसडीपी फीसदी था वह 2024-25 आते-आते 3.2 प्रतिशत हो गया है। केवल महिला वोटरों को लुभाने वाली ऐसी योजनाओं पर ही राज्य सरकारों को 20 हजार करोड़ से लेकर 35 हजार करोड़ रूपयों तक की अतिरिक्त रकम खर्च करनी पड़ रही है।
मध्य प्रदेश जिसे ऐसी योजनाओं का सूत्रधार माना जा सकता है, उसका कर्ज सकल राज्य घरेलू उत्पाद यानी जीएसडीपी के 27 प्रतिशत से बढ़ कर तकरीबन 32 प्रतिशत तक पहुंच गया है। अब चूंकि राज्य सरकारें ऐसी योजनाओं के चलते गले तक कर्ज में डूब गई है तो उसने अब लाभार्थी महिलाओं की संख्या पर तेजी से कैंची चलानी शुरू कर दी है। इसकी शुरूआत महाराष्ट्र सरकार की ओर से हुई, जिसने ई-केवाईसी और कड़े पात्रता नियमों को ढाल बना चुपचाप लाखों लाभार्थियों के नाम सूची से गायब कर दिए। एक अनुमान के मुताबिक लगभग 38 फीसदी यानी 80 से 92 लाख लाभार्थी महिलाओं के नाम गुपचुप लिस्ट में से काट दिए गए हैं।
इसका वहां अब विरोध भी शुरू हो गया है। जैसे दिल्ली में लाभार्थी महिलाओं की पात्रता तय करने के मापदंड इतने कड़े बना दिए कि लाखों महिलाएं तो पात्रता को पार ही नहीं कर पाईं। स्थानीय सांसद/विधायक के सिफारिशी पत्र, आयु सीमा, आय का आधार, ई-केवाईसी आदि प्रक्रियाओं में इतना वक्त लगाया गया कि इस योजना की घोषणा जनवरी 2025 में हुई थी पर इसे पटरी पर लाते-लाते 26 अगस्त 2026 हो गया। यानी लाभार्थी महिला के सेलेक्शन प्रक्रिया में ही पर्याप्त सावधानी बरती गई कि यह लिस्ट ज्यादा लंबी न बन जाए।
लौट के बुद्धू घर को आना चाहते हैं
संसद के अभी संपन्न हुए मानसून सत्र के दौरान ही तृणमूल के 20 बागियों में से 6 ने वापिस घर लौटने की इच्छा व्यक्त की थी, इसमें वे तीन मुस्लिम सांसद भी शामिल हैं। ये छह अभिषेक बनर्जी से मिल कर उनसे माफी भी मांग ली थी, कि उन्हें माफ कर दिया जाए और वापिस तृणमूल में ले लिया जाए। कहते हैं ममता बनर्जी तो इसके लिए राजी भी हो गई थीं, पर कल्याण बनर्जी, कीर्ति आजाद, महुआ मोइत्रा, डोला सेन और डेरेक ओ ब्रायन जैसे टीएमसी सांसदों ने इस बात का पुरकश विरोध कर दिया। सो, इनका मामला फिलहाल अधर में लटक गया। पर हां ममता अपने बागी विधायकों के निरंतर संपर्क में हैं।
अब इन 20 बागियों की मुसीबत है कि इन्हें राज्य में हर तरफ जोरदार जन विरोध का सामना करना पड़ रहा है, ये चाह कर भी भाजपा के साथ उनका मंच शेयर नहीं कर पा रहे। बागियों की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अगर कोर्ट के फैसले के चलते उनकी सदस्यता चली जाती है और फिर से उन्हें उपचुनाव में भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरना पड़ता है तो उन्हें जबर्दस्त जन आक्रोश का सामना करना पड़ सकता है। और वैसे भी भाजपा कुछ बागी उम्मीदवारों को ही एडजस्ट कर सकती है, मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारेगी नहीं, सो बागियों की पेशानियों पर ज्यादा बल है।
शुभेंदु अधिकारी सरकार ने ममता की ‘लक्ष्मी भंडार योजना’ का नाम बदल कर ‘अन्नपूर्णा योजना’ कर दिया है, जिसमें से 30 लाख से ज्यादा महिलाओं के नाम कट गए हैं। इस बात से राज्य की महिलाओं में कुछ बेचैनी है। वहीं 20 बागी सदस्यों को अयोग्य ठहराने वाली सुप्रीम कोर्ट में अभिषेक बनर्जी की याचिका पर कई नामचीन वकील काम कर रहे हैं, जैसे कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, मनेका गुरुस्वामी आदि।
…और अंत में
तृणमूल के 20 बागी सांसदों की उकताहट व बेचैनी के आलम का इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि टूट की एक प्रखर प्रणेता काकोली घोष दास्तीदार ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख को देखते हुए एक नई राजनैतिक पार्टी का गठन कर लिया है, जिसका नामकरण हुआ है-‘बहुजन नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी’ यानी बीएनसीपीआई। इस पार्टी की घोषणा काकोली के पुत्र वैधनाथ घोष दास्तीदार ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए की। इस पोस्ट में दलित, मुस्लिम, आदिवासी और ओबीसी समाज से यह आह्वान किया है कि ‘वह इस नवगठित पार्टी से जुड़ें।’ काकोली ने अपनी नई पार्टी में मुस्लिम छात्रों के लिए स्कॉलरशिप, और ईदगाह बनाने के लिए 50 लाख रुपए देने का भी वायदा किया है, जबकि भाजपा ने किसी मुसलमान को बंगाल में न तो विधायकी का टिकट दिया है और न ही सांसदी का।
काकोली की इस नई पार्टी के ऐलान से उनके दो बागी साथी सुदीप बंधोपाध्याय और शताब्दी राय खासे नाराज़ हो गए, पर काकोली ने उन्हें समझा दिया कि ‘उनकी यह नई पार्टी पुरानी एनसीपीआई की एक शाखा मात्र है, क्योंकि अभी तक लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने एनसीपीआई को एक दल के रूप में मान्यता नहीं दी है। सो, वह सुप्रीम कोर्ट में यह दांव चल सकती है कि वह एनसीपीआई में नहीं बल्कि ‘बीएनसीपीआई’ में हैं, ऐसे में इनकी सदस्यता बची रह सकती है।’

त्रिदीब रमण