संसद के विगत 13 अगस्त को समाप्त हुए सावन सत्र का अभी सत्रावसान नहीं हुआ है जिससे राजनीतिक क्षेत्रों में ये अटकलें लगाई जा रही हैं कि मोदी सरकार बीच में ही संसद का दो या तीन दिन का विशेष अधिवेशन बुलाकर परिसीमन विधेयक पारित करा सकती है परन्तु यह विधेयक संविधान संशोधन का होगा, क्योंकि सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर ही देश भर के चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन करना चाहती है और उसमें लोकसभा की सीटों में 50 प्रतिशत की बढ़ौतरी करके महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत का आरक्षण करना चाहती है। भारत में चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन संविधानतः हर दस साल बाद जनगणना के बाद होना चाहिए। नई जनगणना पूरे देश में आजकल हो रही है जिसमें जातिगत जनगणना भी शामिल है। मगर यह विधेयक संविधान संशोधन है जिसके लिए सरकार को संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। संसद में समूचा विपक्ष सरकार के इस कदम का विरोध कर रहा है और तर्क दे रहा है कि जब उसने 2023 में ही संसद के दोनों सदनों में 33 प्रतिशत आरक्षण देने के संविधान संशोधन विधेयक को सर्वसम्मति से पारित कर दिया था तो सरकार मौजूदा लोकसभा सीटों में से ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित क्यों नहीं कर रही है ? इसके जवाब में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि देश की बढ़ती आबादी को देखते हुए लोकसभा सीटों की संख्या पर स्व. इन्दिरा गांधी के शासनकाल से ही जाम लगा हुआ है जिसे अब खोला जाना चाहिए।
संविधान के अनुसार हर 25 साल बाद लोकसभा सीटों की संख्या की समीक्षा होनी चाहिए मगर इन्दिरा जी के शासनकाल के बाद से इस दौरान देश में जितनी भी सरकारें आयीं सभी ने इस अवधि को 25 साल के लिए आगे बढ़ा दिया। पिछला फैसला स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान लिया गया था। गौर से देखा जाये तो भाजपा के इस तर्क में वजन है मगर दूसरी तरफ जब हम अपनी संसद की हालत देखते हैं तो सोचने पर विवश हो जाते हैं कि वर्तमान में कुल 543 चुने हुए सांसदों में से साल भर में कितनों को अपनी बात संसद में रखने का मौका मिलता है? इस संख्या में जब 50 प्रतिशत बढ़ौतरी हो जायेगी और सांसदों की संख्या 800 से ऊपर पहुंच जायेगी तो कितने सांसद संसद में अपनी जुबान खोल सकेंगे? तर्क यह भी है कि जब 543 सदस्यों वाली संसद का सुचारू रूप से चलना संभव नहीं हो पाता और सत्र का सत्र शोर-शराबे व नारेबाजी में बीत जाता है तो 800 से ऊपर सदस्य संख्या वाली संसद का हश्र क्या होगा ?
विपक्ष का यह भी तर्क है कि सांसदों की संख्या बढ़ने से देश पर आर्थिक बोझ ही बढे़गा जबकि लोकतन्त्र को इसका कोई लाभ नहीं होगा इसलिए जरूरी है कि वर्तमान सदस्य संख्या में ही महिलाओं को 33 प्रतिशत सीटें दे दी जाये। जब 2023 में महिला आरक्षण विधेयक पारित हुआ था तो तब भी विपक्ष ने एेसी ही मांग की थी मगर तब पारित विधेयक में सरकार ने यह शर्त जोड़ दी थी कि नई जनगणना होने के बाद जो परिसीमन आयोग बनेगा उसमें महिला सीटों के आरक्षण की व्यवस्था की जायेगी। इसकी विपक्ष ने तीखी आलोचना की थी और कहा था कि सरकार महिला आरक्षण को आगे के लिए टालना चाहती है लेकिन अब मोदी सरकार उल्टा दांव मार कर कह रही है कि यह विपक्ष ही है जो महिला आरक्षण को लागू नहीं होने दे रहा है और उसके परिसीमन विधेयक का विरोध कर रहा है क्योंकि वह 2011 की जनगणना के आधार पर चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन करना चाहता है। मगर असली सवाल यह है कि सरकार के पास परिसीमन विधेयक को पारित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत कहां है? विपक्ष आरोप लगा रहा है कि मोदी सरकार संसद में यह बहुमत प्राप्त करने के लिए अनैतिक तरीके अपना रही है और अन्य दलों में तोड़फोड़ कर उनके सांसदों को अपने खेमें में लाने का प्रयास कर ही है। इस मामले में तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों का विद्रोह तथा राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के सात सांसदों का भाजपा में आना उदाहरण बताया जा रहा है। इसके साथ ही शिवसेना पार्टी के भी कुछ सांसदों ने पाला बदला है।
यह भी कहा जा रहा है कि भाजपा दक्षिण के तमिलनाडु की प्रमुख पार्टी द्रमुक पार्टी के साथ भी बातचीत जारी रखे हुए है, मगर जिस तरह से पिछले दिनों दक्षिण के सभी राज्यों ने एक स्वर से संसद के सदस्यों की संख्या बढ़ाये जाने का विरोध करते हुए वर्तमान संख्या को ही बरकरार रखने का एक मत से समर्थन किया है, उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि ये राज्य भी मौजूदा सांसद संख्या में ही 33 प्रतिशत महिला आरक्षण दिये जाने के पक्षधर हैं। बेशक सत्तारूढ़ एनडीए में 36 सांसदों का इजाफा हो चुका है मगर दो-तिहाई बहुमत से यह आकड़ा अभी भी बहुत दूर बैठता है लेकिन इतना तो तय है कि अब लोकसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं के लिए होगा चाहे वह 2029 के चुनावों से हो या 2034 के। इससे पहले महिलाओं को आरक्षण देने के जितने भी प्रयास किये गये थे वे किसी न किसी बहाने रद्दी में चले गये थे।
परिसीमन और महिला आरक्षण
Summary :
संसद के विगत 13 अगस्त को समाप्त हुए सावन सत्र का अभी सत्रावसान नहीं हुआ है जिससे राजनीतिक क्षेत्रों में ये अटकलें लगाई जा रही हैं कि मोदी सरकार बीच में ही संसद का दो या तीन दिन का विशेष अधिवेशन बुलाकर परिसीमन विधेयक पारित करा सकती है परन्तु यह विधेयक संविधान संशोधन का होगा, क्योंकि सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर ही देश भर के चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन करना चाहती है और उसमें लोकसभा की सीटों में 50 प्रतिशत की बढ़ौतरी करके महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत का आरक्षण करना चाहती है। भारत में चुनाव क्षेत्रों का…


Download Android App
Download iOS App



