यूपीएससी परीक्षा में गरीब और अभावग्रस्त पृष्ठभूमि से आने वाले कई अभ्यर्थी अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति, कड़ी मेहनत और स्मार्ट अध्ययन के दम पर सफलता हासिल कर के प्रतिभागी बन रहे हैं। ऑटो ड्राइवर के बेटे , मजदूर के बच्चे और ग्रामीण इलाकों के युवा बिना कोचिंग या सीमित डिग्री के आईएएस/आईपीएस बनकर निकले, इससे साबित होता है कि आर्थिक तंगी के सपने की राह में कोई बाधा नहीं है। इन सबकी सफलता से यह सिद्ध होता है कि नौकरी के लिए धन की नहीं, बल्कि योग्यता, परिश्रम और सही दिशा में निरंतर प्रयास की आवश्यकता है। कड़ी मेहनत और लगन से कामयाब इन युवाओं में कई गरीब और ग्रामीण परिवारों से जुड़े हैं। इससे साफ है कि कई गरीब मां-बाप के बच्चे आगे चलकर कलेक्टर (डीएम) और कप्तान (एसपी) बनेंगे।हर वर्ष आईएएस, आईपीएस, आईएफएस ऑफिसर बनने का ख्वाब संजोने वाले लाखों उम्मीदवार यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा देते हैं। इस परीक्षा को देश की सबसे चुनौतिपूर्ण प्रतियोगी परीक्षा माना जाता है। यूपीएससी सिविल सेवा के जरिए इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेज (आईएएस), भारतीय पुलिस सर्विसेज (आईपीएस) और भारतीय फॉरेन सर्विसेज (आईएफएस), रेलवे ग्रुप ए (इंडियन रेलवे अकाउंट्स सर्विस), इंडियन पोस्टल सर्विसेज, भारतीय डाक सेवा, इंडियन ट्रेड सर्विसेज सहित अन्य सेवाओं के लिए चयन किया जाता है। यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा तीन चरणों (प्रारंभिक, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार) में आयोजित की जाती है। मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार में प्रदर्शन के आधार पर फाइनल मेरिट लिस्ट जारी होती है।
शिखा उत्तर प्रदेश की बुलंदशहर की रहने वाली हैं। उनके पिता प्रेमचंद, गांधी कन्या इंटर कॉलेज सियाणा में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं। पिता भले ही चपरासी हों लेकिन उन्होंने अपनी बेटी की पढ़ाई को सपोर्ट किया। वहीं यूपीएससी में सफलता हासिल करके शिखा ने भी अपने पिता की मेहनत को बेकार नहीं होने दिया। पहले प्रयास में शिखा असफल हो गईं। इससे निराश होकर उन्होंने अपना रास्ता नहीं बदला और न खुद को कमजोर होने दिया। दूसरे प्रयास में शिखा ने यूपीएससी परीक्षा में एआईआर 113वीं रैंक के साथ सफलता हासिल कर ली। शिखा पांच भाई-बहन हैं, वे तीसरे नंबर पर हैं। मेरठ जिले में सरधना क्षेत्र के गांव बहादुरपुर में किसान परिवार के हर्ष नेहरा की 74वीं रैंक आई है। हर्ष नेहरा की मां अनीता टीचर हैं। पिता किसान हैं। हर्ष घर का बड़ा बेटा है। मां अनीता का कहना है कि मैं और उसके पापा डॉक्टर बनाना चाहते थे लेकिन इंटर पास करने के बाद वह आईएएस बनने की जिद करने लगा।
बिहार के नवादा जिले के हिसुआ नगर परिषद क्षेत्र अंतर्गत पांचू निवासी रितिका पांडेय ने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा 2025 में 185वीं रैंक हासिल कर जिले का नाम रोशन किया है। सीमित संसाधनों के बीच कठिन परिश्रम और आत्मविश्वास के बल पर उन्होंने यह मुकाम हासिल किया है। उनकी सफलता से पूरे क्षेत्र में खुशी और गर्व का माहौल है। रितिका पांडेय के पिता संजय पांडेय मूल रूप से हिसुआ पांचू के निवासी हैं और साधारण व्यवसाय करते हैं। वे दुकानों में कैरी बैग की आपूर्ति करने का काम करते हैं लेकिन बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाना उनका सपना और जुनून रहा है। पिता के इसी संघर्ष और लगन को रितिका ने अपने जीवन की प्रेरणा बनाया।
रितिका ने तीसरे प्रयास में यह सफलता हासिल की है। पहले प्रयास में वे प्रारंभिक परीक्षा तक पहुंची थीं, जबकि दूसरे प्रयास में उन्होंने साक्षात्कार तक का सफर तय किया था लेकिन अंतिम परिणाम में उनका चयन नहीं हो सका था। तीसरे प्रयास में उन्होंने हार नहीं मानी और अंततः सफलता हासिल कर ली। बुलंदशहर जिले के निवासी किसान के बेटे विपिन चौधरी ने 538वीं रैंक हासिल की। 2017 में सीबीएसई की 12वीं की परीक्षा में विपिन ने जिले में टॉप किया था। पूरे डिवीजन में दूसरा स्थान प्राप्त किया था। 21 जून 2017 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें लखनऊ में सम्मानित किया था।
इसी तरह “रायबरेली के एक छोटे से गांव चांदेमऊ से निकलकर देश की सबसे कठिन परीक्षा यूपीएससी फतह करने वाले विमल कुमार की कहानी संघर्ष और अटूट संकल्प की एक अद्भुत मिसाल है। ईंट भट्ठों और खेतों के बीच पले-बढ़े विमल के पिता ने गरीबी और अभावों के बीच मजदूरी कर अपने बेटे को पढ़ाया। विमल ने अपनी असाधारण प्रतिभा के दम पर न केवल नवोदय विद्यालय में जगह बनाई, बल्कि आईआईटी दिल्ली से मैकेनिकल इंजीनियरिंग भी की लेकिन देश सेवा का जज्बा ऐसा था कि उन्होंने कैंपस सिलेक्शन ठुकराकर आईएएस बनने का रास्ता चुना। अपने दृढ़ निश्चय और कड़े परिश्रम से विमल ने यूपीएससी में 107वीं रैंक हासिल की और आज वे एक मिसाल बनकर उभरे हैं। सफलता के लिए एक कीमत अदा करनी होती है। संघर्ष करना होता है। कुर्बानियां देनी होती हैं। कोई मजदूर का बेटा है तो किसी के घर के हालात ऐसे नहीं थे कि वह इस परीक्षा की तैयारी कर सके लेकिन कहते हैं न सोना तपकर ही ‘कुंदन’ बनता है। तो इस परीक्षा में भी ऐसे कई कुंदन निकले हैं। सिविल सेवकों को प्रशासिनक सेवा की रीढ़ माना जाता है लेिकन काफी मय से सिविल सेवकों के भ्रष्टाचार में शािमल होने से उनकी ईमानदारी पर सवाल उठे हैं। नौकरशाहों के साथ नेताआें के भ्रष्टाचार के मामले सामने आते ही रहते हैं लेकिन यह ध्यान रहे िक भ्रष्ट सिविल सेवक निष्ठावान सिविल सेवकों की बदनामी कारण बनते हैं, इसलिए यह जरूरी है कि सरकार ऐसी व्यवस्था करे कि भ्रष्ट सिविल सेवकों के खिलाफ कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए और अपना काम करने वालों को प्रोत्साहित किया जाए।























