चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उनकी पत्नी पेंग लियुआन के स्वागत के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उनकी पत्नी मेलानिया ट्रम्प ज्वाइंट बेस एंड्रयूज जा पहुंचे तो पूरी दुनिया का चौंकना स्वाभाविक था। 1962 के बाद ऐसा पहली बार हो रहा था जब अमेरिकी राष्ट्रपति विदेशी मेहमान के स्वागत के लिए खुद एयरपोर्ट पहुंचे थे। सभी के मन में एक ही सवाल उपजा कि यह वाकई चीन के रुतबे का सम्मान है या अमेरिका की कोई नई राजनीति है?
अमेरिका में राजनयिक परंपरा रही है कि कोई भी विदेशी मेहमान आता है तो एयरपोर्ट पर अगवानी का दायित्व उपराष्ट्रपति, विदेश मंत्री या प्रोटोकॉल अधिकारी का होता है। राष्ट्रपति केवल व्हाइट हाउस में ही स्वागत करते हैं, मगर इसके अपवाद पहले भी रहे हैं। उदाहरण के लिए 1962 में तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी ने एंड्रयूज एयर फोर्स बेस पर ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री हेरोल्ड मैकमिलन का व्यक्तिगत तौर पर स्वागत किया था। माना जाता है कि अमेरिका और ब्रिटेन के बीच रणनीतिक साझेदारी और दोस्ती को दुनिया के सामने प्रदर्शित करने के लिए केनेडी ने ऐसा किया था। मेरे मित्र और सांसद शशि थरूर ने हाल ही में यह खुलासा भी किया है कि 1949 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जब अमेरिका पहुंचे तो तत्कालीन राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने हवाई अड्डे पर उनका स्वागत किया था। इसी तरह पंडित नेहरू जब 1961 में अमेरिका पहुंचे तो जॉन एफ. कैनेडी ने उनकी अगवानी की थी। पंचशील के प्रणेता के रूप में नेहरू का रुतबा बहुत बड़ा था, तो सवाल पैदा होता है कि ट्रम्प ने शी जिनपिंग की अगवानी के लिए प्रोटोकॉल क्यों तोड़ा? क्या अमेरिका अब चीन के रुतबे को स्वीकार कर रहा है? देखिए, चीन ने अपना एक रुतबा तो बना लिया है और कोई सीधे तौर पर स्वीकार करे या न करे, हकीकत का एहसास तो अमेरिका को भी है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि ट्रम्प ने शी की अगवानी चीन के रुतबे के कारण की है। ट्रम्प बड़े व्यापारी हैं और वे राजनीति को भी व्यापार के नजरिए से ही देखते हैं। वे शायद यह सोच रहे होंगे कि यदि शी की भव्य अगवानी होगी और उनकी तारीफ की जाएगी तो हो सकता है कि शी जिनपिंग अमेरिका की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा दें। स्वाभाविक रूप से अमेरिका जिस शिखर पर मौजूद है, वहां ऐसी सोच पैदा होती है। उसे लगता है कि हर कोई उससे दोस्ती को लालायित है, मगर चीन ऐसा नहीं है। शी जिनपिंग ने चीन को दुनिया के सबसे बड़े व्यापारी के रूप में स्थापित किया है, इसलिए ये मसला व्यापारिक कूटनीति का है, जो अपने दांव-पेंच में दूसरे को उलझा ले वही फायदे में रहेगा। यदि आप शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा के वीडियोज देखें और दोनों की बॉडी लैंग्वेज पर नजर डालें तो ट्रम्प उत्साहित नजर आते हैं जबकि शी जिनपिंग ने गहन गंभीर रवैया अपना रखा था, दरअसल चीन का मानना है कि उसकी उन्नति को अमेरिका रोकने की हरसंभव कोशिश कर रहा है। उसे अंदाजा है कि ट्रम्प दाना डालने की कोशिश कर रहे हैं, अभी ताइवान को 14 अरब डॉलर के हथियार देने की प्रक्रिया को उन्होंने रोक लिया ताकि जिनपिंग खुश हो जाएं लेकिन चीन स्पष्ट आश्वासन चाहता है कि अमेरिका ताइवान की कोई मदद न करे ! ताइवान, चीन की दुखती रगों में से एक है और अमेरिका उस रग को पकड़े रखना चाहता है।
चीन भी हर मौके पर तीखे तेवर दिखाने से पीछे नहीं हट रहा है। अमेरिका के ट्रेड वार का जवाब चीन ने भी सख्ती के साथ दिया है। ट्रेड वार को लेकर नवंबर तक का जो संघर्ष विराम था, उसे अमेरिका ने केवल दो महीनों के लिए बढ़ाया है। चीन की चाहत थी कि इसे कम से कम एक साल के लिए बढ़ाया जाए। वह चाहते हैं कि ट्रम्प का कार्यकाल किसी तरह से गुजर जाए। आगे की आगे देखेंगे! इधर अमेरिका चाहता है कि रेयर अर्थ मिनरल के मामले में चीन सहूलित देने के लिए तैयार हो जाए मगर चीन ने भी मुट्ठी दबा रखी है।
वह किसी भी तरह से अमेरिका के सामने झुकने को तैयार नहीं है। उसे एहसास है कि कई घरेलू समस्याओं के बावजूद वह दुनिया में एक ताकत बन कर उभरा है और अमेरिका से टकराएगा तभी बादशाह बनने की राह पर आगे बढ़ेगा, इसलिए चीन फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है।
एआई के मुद्दे पर दोनों दो छोर पर ! : क्या आपने इस बात पर गौर किया है कि दुनिया की महाशक्तियां अमेरिका और चीन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के मुद्दे पर एक नहीं हैं! अभी यह आशंका जन्म ले रही है कि क्या एआई, मानव पर कब्जा कर लेगा? विशेषज्ञ कह रहे हैं कि इस मसले पर गौर किया जाना चाहिए। शी जिनपिंग हमेशा कहते रहे हैं कि एआई को हमेशा इंसानी नियंत्रण में रखने की जरूरत है, जबकि ट्रम्प ने सीधे तौर पर इस आशंका को खारिज कर दिया कि एआई मानव को नष्ट कर देगा! मेरी राय है कि न केवल महाशक्तियों बल्कि पूरी दुनिया को इस गंभीर मुद्दे पर एक होना चाहिए, ताकि मानव जाति के अस्तित्व पर कोई संकट न आए।
तुर्की को क्यों उठती है कश्मीर की खुजली?: तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक बार फिर कश्मीर का राग अलापा है। वास्तव में ये आदमी विचित्र है। 2024 में तुर्की ब्रिक्स में घुसने की कोशिश कर रहा था तब उसने महासभा में चुप्पी बनाए रखी थी, मगर इस्लामिक दुनिया का लीडर बनने की चाहत में उसे कश्मीर की खुजली उठ जाती है, एर्दोगन पता नहीं क्यों भूल जाते हैं कि तुर्की की आबादी से दो गुना ज्यादा संख्या हिंदुस्तानी मुसलमानों की है। कश्मीर की तो तुम बात ही मत करना।
चीन का सम्मान या सम्मान की राजनीति?
Summary :
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उनकी पत्नी पेंग लियुआन के स्वागत के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उनकी पत्नी मेलानिया ट्रम्प ज्वाइंट बेस एंड्रयूज जा पहुंचे तो पूरी दुनिया का चौंकना स्वाभाविक था। 1962 के बाद ऐसा पहली बार हो रहा था जब अमेरिकी राष्ट्रपति विदेशी मेहमान के स्वागत के लिए खुद एयरपोर्ट पहुंचे थे। सभी के मन में एक ही सवाल उपजा कि यह वाकई चीन के रुतबे का सम्मान है या अमेरिका की कोई नई राजनीति है? अमेरिका में राजनयिक परंपरा रही है कि कोई भी विदेशी मेहमान आता है तो एयरपोर्ट पर अगवानी का दायित्व…


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