चुनाव आयोग की नई घोषणा

Summary :

चुनाव आयोग द्वारा देश के 31 राज्यों व केन्द्र शासित क्षेत्रों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का कार्य जिस तरह से हुआ है उसके खिलाफ भारी जनरोष उभर कर सामने आया है। इसकी मुख्य वजह यह है कि इस प्रक्रिया के दौरान 13 करोड़ 27 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिये गये हैं। अब चुनाव आयोग ने घोषणा की है कि जिन राज्यों में एसआईआर का काम पूरा हो चुका है उनमें से 13 राज्यों व तीन केन्द्र प्रशासित क्षेत्रों में वह नवम्बर महीने से पारंपरिक वार्षिक विशेष पुनरीक्षण या समीक्षा (एसएसआर) का…

चुनाव आयोग द्वारा देश के 31 राज्यों व केन्द्र शासित क्षेत्रों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का कार्य जिस तरह से हुआ है उसके खिलाफ भारी जनरोष उभर कर सामने आया है। इसकी मुख्य वजह यह है कि इस प्रक्रिया के दौरान 13 करोड़ 27 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिये गये हैं। अब चुनाव आयोग ने घोषणा की है कि जिन राज्यों में एसआईआर का काम पूरा हो चुका है उनमें से 13 राज्यों व तीन केन्द्र प्रशासित क्षेत्रों में वह नवम्बर महीने से पारंपरिक वार्षिक विशेष पुनरीक्षण या समीक्षा (एसएसआर) का काम करायेगा जिससे मतदाता सूचियां पूरी तरह पूर्ण व संशोधित हो सकें। इसका अर्थ यह माना जा रहा है कि इन 16 राज्यों में वे जायज मतदाता अपना नाम सूचियों में दर्ज करा सकेंगे जिनके नाम किसी वजह से कट गये हैं या छूट गये हैं। मगर इस प्रक्रिया के तहत बीएलओ (आंचलिक चुनाव अधिकारी) घर-घर नहीं जायेंगे और चुनाव अधिकारियों के दफ्तर में ही मतदाता स्वयं पहुंच कर अपनी शिकायतें जरूरी कागजात के साथ जमा करा सकेंगे। इसके लिए 12 नवम्बर को चुनाव आयोग प्रत्येक क्षेत्र की मतदाता सूची प्रारूप प्रकाशित करेगा। इन सूचियों को देखकर मतदाता यह तय कर सकेंगे कि उनके नाम सूची में हैं या नहीं।
यदि जायज मतदाता का नाम सूची में नहीं पाया जाता है तो वह मतदाता बनने का अपना दावा पेश कर सकता है। शिकायत करने या नाम जुड़वाने की अवधि 11 दिसम्बर तक खुली रहेगी। इसी प्रकार जो युवा 1 जनवरी से लेकर 1 अप्रैल, 1 जुलाई व 1 अक्तूबर 27 को 18 वर्ष के हो रहे होंगे वे भी अग्रिम रूप से आवेदन कर सकेंगे। मतदाताओं की अन्तिम सूची 4 जनवरी को प्रकाशित कर दी जायेगी। चुनाव आयोग ने यह भी घोषित किया है कि ये दोनों मतदाता सूचियां इस बार राजनीतिक दलों को भी उपलब्ध कराई जायेंगी और ये पीडीएफ प्रारूप में कम्प्यूटर पर पढ़ी जा सकेंगी। ये सूचियां पूरी पठनीय प्रारूप में होंगी। जिन राज्यों में पारंपरिक विशेष वार्षिक मतदाता सूची समीक्षा या पुनरीक्षण होगा उनमें से पांच में 2027 में ही विधानसभा चुनाव होने हैं। जिन 16 राज्यों में यह कार्य होगा, वे हैं- अंडमान निकोबार, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरलम्, लक्षदीप, मध्यप्रदेश, मणिपुर, पुडीचेरी, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड एवं प. बंगाल। इनमें से पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा व मणिपुर में 27 में ही चुनाव होने हैं। इन सभी राज्यों में भारी संख्या में मतदाताओं के नाम एसआईआर के दौरान कट गये थे। चुनाव आयोग वार्षिक आधार पर नये साल की 1 जनवरी तक मतदाता सूचियों को समीचीन बनाता है मगर 2024 के बाद से यह काम नहीं हो सका क्योंकि इसने विभिन्न राज्यों में एसआईआर की कवायद जारी कर दी।
फिलहाल अभी दिल्ली समेत लगभग एक दर्जन राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है। इन राज्यों में वार्षिक समीक्षा बाद में होगी। चुनाव आयोग की इस घोषणा से यह गंभीर सवाल पैदा हो रहा है कि जिन राज्यों में एसआईआर के बाद चुनाव हो चुके हैं, उनका क्या होगा? इनमें बिहार व प. बंगाल शामिल हैं। इन दोनों ही राज्यों में विपक्षी दल शोर मचा रहे हैं कि एसआईआर के तहत बिहार में 65 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम काटे गये और प. बंगाल में 90 लाख के लगभग मतदाताओं से वोट देने का अधिकार छीन लिया गया। इस प्रश्न का सन्तोषजनक उत्तर मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार को ही विपक्षी राजनीतिक दलों को देना चाहिए क्योंकि चुनाव आयोग एक स्वतन्त्र संवैधानिक संस्था है जो सीधे संविधान से शक्ति लेकर अपना काम करती है। सरकार या सत्तारूढ़ दल का उससे कोई लेना-देना नहीं होता। क्योंकि मतदाता सूचियों की वार्षिक समीक्षा करने का काम चुनाव आयोग पिछले कई दशकों से करता आ रहा है।
पिछली बार 2002 में जो विशेष गहन पुनरीक्षण हुआ था उसमें बीएलओ घर-घर तो गये थे मगर इस प्रकार से करोड़ों मतदाताओं के नाम नहीं काटे गये थे। बल्कि हकीकत यह है कि 2002 में लोगों ने चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया को सामान्य मतदाता सूची समीक्षा ही समझा था। उस दौरान न तो मतदाताओं से वे सबूती कागजात मांगे गये थे जैसे इस बार की एसआईआर में मांगे गये और न ही नागरिकता की जांच आदि का मसला उठा था। वास्तव में चुनाव आयोग की जवाबदेही मुख्य रूप से आम मतदाताओं के प्रति ही होती है क्योंकि प्रत्येक भारतीय नागरिक को मतदाता बनाने के कार्य से वह बंधा होता है जिससे भारत का लोकतन्त्र अधिकाधिक सहभागिता का लोकतन्त्र बन सके और किसी भी बनने वाली सरकार में आम मतदाता अपनी शिरकत
महसूस कर सके। इसी वजह से बाबा साहेब अम्बेडकर ने चुनाव आयोग का गठन करते हुए कहा था कि भारत का लोकतन्त्र तभी सच्चे अर्थों में जीवन्त कहलायेगा जब इसमें रहने वाले हर भारतीय वयस्क नागरिक को मतदाता बनाया जायेगा।
हम जानते हैं कि अंग्रेजों के राज में 1935 में भारत के केवल 12 प्रतिशत लोगों को ही मत देने का अधिकार था परन्तु भारत की आजादी तो वयस्क आधार पर एक समान मताधिकार के नारे से हुई थी जो उस समय एक
क्रान्ति से कम नहीं था। अतः चुनाव आयोग को ही यह तय करना होगा कि जिन राज्यों में भी वार्षिक समीक्षा का काम हो रहा है वहां एक भी जायज मतदाता न छूटने पाये।

Aditya Chopra

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