यदि भारत के मुख्य न्यायाधीश ने अदालत की एक सुनवाई के दौरान “कॉकरोच” की उपमा का इस्तेमाल न किया होता, तो शायद कॉकरोच जनता पार्टी का जन्म भी नहीं होता। और यदि ऐसा न होता, तो नीट प्रश्नपत्र लीक के विरोध में शुरू हुए प्रदर्शन न तो उस रूप में आकार लेते और न ही इतने व्यापक स्तर तक पहुंचते कि एक अर्थ में सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दें। इस विरोध-प्रदर्शन की सफलता इस बात में निहित थी कि सरकार दबाव के आगे झुक गई और उन छात्रों की मांग मान ली, जो केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से कम कुछ भी स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।
यह कहना कि लोकप्रिय रूप से सीजेपी के नाम से जानी जाने वाली यह पार्टी सरकार के लिए सिरदर्द बन चुकी है, शायद कम ही होगा। बेरोजगारी और प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक जैसे मुद्दों को लेकर युवाओं के असंतोष को आवाज देने के उद्देश्य से गठित इस संगठन की सफलता का अंदाजा नई दिल्ली में हुए उन विरोध-प्रदर्शनों से लगाया जा सकता है, जिनके दबाव में सरकार को अपने ही मंत्रिमंडल के एक सदस्य केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग के आगे झुकना पड़ा। यह एक अभूतपूर्व घटनाक्रम है, क्योंकि सरकारें और विशेष रूप से भाजपा जैसी निर्णायक, मजबूत और अपने फैसलों पर अडिग रहने वाली सरकार आमतौर पर इस्तीफे की मांग के आगे नहीं झुकती। और इसकी एक ठोस वजह भी है, क्योंकि ऐसा होने पर घटनाओं की एक शृंखला शुरू हो सकती है और ठीक यही हुआ है। धर्मेंद्र प्रधान को पद से हटाने की सफलता ने सीजेपी को और अधिक मुखर होने का हौसला दिया है। वहीं, कांग्रेस के राहुल गांधी के नेतृत्व में राजनीतिक विपक्ष ने भी एक बार फिर मोर्चा खोल दिया है और जुलाई में हुई घटना को दोहराने की मांग उठाई है। प्रधान ने इस वर्ष 25 जुलाई को इस्तीफा दिया था।
ताजा विवाद निर्वाचन आयोग के दो आयुक्तों की ओर से मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ उठाए गए सवालों से पैदा हुआ है। दोनों ने आरोप लगाया है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने एकतरफा और मनमाने तरीके से काम किया। मतदाता डेटाबेस की विश्वसनीयता, नए मतदाताओं के पंजीकरण की प्रक्रिया में बदलाव और स्वयं मतदाता सूचियों की सुरक्षा को लेकर उठे सवालों के बाद निर्वाचन आयोग एक गंभीर विश्वसनीयता संकट का सामना कर रहा है।
निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कई ऐसे फैसलों पर आपत्ति जताई है, जो उनकी जानकारी के बिना लिए गए। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयुक्त संधू और जोशी को इन फैसलों से अनजान रखा गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, एक मामले में तो दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर अपनी शिकायत दर्ज कराई। कैबिनेट सचिव भारत सरकार के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी होते हैं। इन खुलासों के बाद राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है और विपक्षी नेताओं ने कुमार के इस्तीफे की मांग की है। यह रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आई है, जब निर्वाचन आयोग देशभर में मतदाता डेटाबेस के एक विवादास्पद पुनरीक्षण की प्रक्रिया चला रहा है, जिसे लेकर पहले से ही विवाद बना हुआ है।
विपक्षी दल अतीत में मुख्य निर्वाचन आयुक्त कुमार पर चुनावों के दौरान भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में मतदाता सूचियों में हेरफेर करने के आरोप लगाते रहे हैं। भाजपा और निर्वाचन आयोग, दोनों ने इन आरोपों को खारिज किया है। लेकिन ताजा खुलासों को महज विपक्ष का प्रचार कहकर खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि निर्वाचन आयोग के तीन सदस्यों में से दो ने स्वयं अपनी आवाज उठाई है और इस बात पर सवाल खड़े किए हैं कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त किस तरीके से आयोग का संचालन कर रहे हैं।
इस खुलासे ने उस पूरी कवायद की विश्वसनीयता को लेकर लंबे समय से उठ रहे सवालों को और बल दिया है, जिसके तहत पूरे भारत में मतदाता सूची से 13 करोड़ नाम हटा दिए गए हैं। बड़ी संख्या में लोगों ने अपने नाम गायब होने की शिकायत की है। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया में ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत करने की मांग की जा रही है, जो कई लोगों के पास हैं ही नहीं। इन खुलासों ने विपक्षी दलों और आलोचकों को भी नया हथियार दे दिया है। वे लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि एसआईआर का इस्तेमाल भाजपा के लाभ के लिए उसके विरोध में मतदान करने वाले लोगों के नाम मतदाता सूची से बाहर करने के लिए किया जा रहा है और भारत में चुनाव अब स्वतंत्र एवं निष्पक्ष नहीं रह गए हैं।
भारत की चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग लगातार तेज होती जा रही है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी, जो निर्वाचन आयोग पर विपक्ष के ‘वोट चुराने’ का आरोप बार-बार लगाते रहे हैं, ने कहा है, ‘वोट चोरी भारत की जनता के खिलाफ अपराध है और हमारे संविधान पर सीधा हमला है। न्याय होकर रहेगा।’ उन्होंने यह बात एक्स पर एक पोस्ट में कही। उन्होंने 15 सैकेंड का एक वीडियो भी साझा किया, जिसमें उन्होंने आयोग और उसके अधिकारियों से कहा-तुम्हारा समय आएगा। तुम इससे बच नहीं सकते।
ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने कुमार की गिरफ्तारी की मांग की है। उन्होंने पश्चिम बंगाल में एसआईआर से पहले की मतदाता सूची के आधार पर नए सिरे से चुनाव कराने की भी मांग की है। हालिया चुनावों में पश्चिम बंगाल में भाजपा के हाथों सत्ता गंवाने वाली बनर्जी और उनके समर्थकों का कहना है कि एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान राज्य में लाखों मतदाताओं के नाम हटा दिए गए और इसी वजह से उन्हें दर्जनों सीटों का नुकसान हुआ तथा चुनावी जीत से हाथ धोना पड़ा। विपक्ष के अलावा, मुख्य निर्वाचन आयुक्त के बचाव में भाजपा का मुखर होकर सामने आना भी सवालों के घेरे में है। भाजपा ने विपक्ष की आलोचना को ‘दुष्प्रचार अभियान’ करार दिया है और कहा है कि असहमति ‘जीवंत लोकतंत्र की निशानी’ है।
पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि ‘2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से विपक्षी दल एक के बाद एक धराशायी होते गए हैं।’ उन्होंने कहा कि चुनाव जीतने में असमर्थ होने के कारण विपक्षी दल ‘देश की संस्थाओं को कमजोर करने’ की कोशिश कर रहे हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त के बचाव में भाजपा की यह मुखर भूमिका ऐसे कयासों को जन्म देती है कि तस्वीर जितनी दिखाई दे रही है, मामला उससे कहीं अधिक गहरा हो सकता है। यह घटनाक्रम शायद उस दिशा की शुरुआत भर है, जिसमें आने वाले दिनों में परिस्थितियां आकार लेंगी। पिछले विरोध-प्रदर्शन की सफलता से उत्साहित सीजेपी और विपक्ष के अब पीछे हटने या कुमार के इस्तीफे से कम किसी मांग पर सहमत होने की संभावना कम ही दिखाई देती है।
इन सबके बावजूद, आने वाले दिन सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण हैं। सरकार पहले ही कई आरोपों का सामना कर रही है, जिनमें अयोध्या के राम मंदिर में चोरी के आरोप भी शामिल हैं। ऐसे में मुख्य निर्वाचन आयुक्त को लेकर उठा विवाद सरकार के लिए एक और गंभीर झटका साबित हो सकता हैभले ही यह अंतिम झटका न हो। यदि भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार इस विवाद को नजरअंदाज करने का विकल्प चुनती है, तो इसके गंभीर राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं।
सीजेपी की सक्रियता खतरे की घंटी…
Summary :
यदि भारत के मुख्य न्यायाधीश ने अदालत की एक सुनवाई के दौरान “कॉकरोच” की उपमा का इस्तेमाल न किया होता, तो शायद कॉकरोच जनता पार्टी का जन्म भी नहीं होता। और यदि ऐसा न होता, तो नीट प्रश्नपत्र लीक के विरोध में शुरू हुए प्रदर्शन न तो उस रूप में आकार लेते और न ही इतने व्यापक स्तर तक पहुंचते कि एक अर्थ में सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दें। इस विरोध-प्रदर्शन की सफलता इस बात में निहित थी कि सरकार दबाव के आगे झुक गई और उन छात्रों की मांग मान ली, जो केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र…


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