गांधी को नमन करता भारत

Summary :

आज 02 अक्तूबर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जन्म जयन्ती है। गांधी को राष्ट्रपिता की उपाधि से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने तब विभूषित किया था जब वह स्वयं गांधी के अहिंसा के सिद्धान्त के विरुद्ध विदेशों में आजाद हिन्द फौज गठित करके अंग्रेजों के खिलाफ सैनिक क्रान्ति की योजना बना रहे थे। नेताजी ने कांग्रेस पार्टी तब छोड़ी थी जब भारत द्वितीय विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ा हुआ था। 1945 में इस युद्ध के समाप्त होते-होते नेताजी का एक वायुयान दुर्घटना में निधन हो गया था और इसके दो वर्ष बाद 1947 में भारत को अंग्रेजी राज की गुलामी…

आज 02 अक्तूबर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जन्म जयन्ती है। गांधी को राष्ट्रपिता की उपाधि से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने तब विभूषित किया था जब वह स्वयं गांधी के अहिंसा के सिद्धान्त के विरुद्ध विदेशों में आजाद हिन्द फौज गठित करके अंग्रेजों के खिलाफ सैनिक क्रान्ति की योजना बना रहे थे। नेताजी ने कांग्रेस पार्टी तब छोड़ी थी जब भारत द्वितीय विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ा हुआ था। 1945 में इस युद्ध के समाप्त होते-होते नेताजी का एक वायुयान दुर्घटना में निधन हो गया था और इसके दो वर्ष बाद 1947 में भारत को अंग्रेजी राज की गुलामी से मुक्ति मिल चुकी थी। यह मुक्ति महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धान्त पर चलते हुए ही भारत के लोगों को मिली थी। हालांकि अंग्रेजी राज से मुक्ति के लिए देश के क्रान्तिकारियों ने भी अपना महान योगदान दिया था परन्तु गांधी जी ने सबसे बड़ा काम यह किया कि उन्होंने स्वतन्त्रता आन्दोलन से भारत के आम आदमी को जोड़ा और इसमें एक साधारण मजदूर-किसान से लेकर पूंजीपति तक ने शिरकत की। गांधी जी जानते थे कि विभिन्न टुकड़ों में बंटे भारतीय समाज को एक मंच पर लाकर अंग्रेजों के खिलाफ लोहा लेना कोई साधारण काम नहीं है अतः उन्होंने अंग्रेजों की शक्तिशाली सेनाओं के खिलाफ जन-शक्ति खड़ी की और अपने अहिंसा के शस्त्र से उसको पराजित किया। मगर गांधी ने यह कार्य भारत के लोगों को शक्तिशाली बना कर ही किया।
गांधी ने 1928 में ही यह घोषणा कर दी थी कि स्वतन्त्र भारत में लोकतन्त्र की संसदीय प्रणाली अपनाई जायेगी जिसमें हर अमीर-गरीब के राजनीतिक अधिकार एक बराबर होंगे। यहीं से एक व्यक्ति-एक वोट की उत्पत्ति हुई। इसी वर्ष कांग्रेस पार्टी ने प्रख्यात वकील श्री मोती लाल नेहरू की अध्यक्षता में भारत के संविधान का प्रारूप लिखने के लिए एक समिति का गठन किया जिसमें उस समय के सभी क्षेत्रों के प्रतिभावान व्यक्तियों को शामिल करने की कोशिश की गई मगर मुस्लिम लीग ने इसमें शामिल होने से इन्कार कर दिया, हालांकि इसके कुछ सदस्यों ने व्यक्तिगत तौर पर इसमें शिरकत की। समिति में मौलाना आजाद से लेकर पं. जवाहर लाल नेहरू व नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जैसे नेता भी थे। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में भारत को संघीय राज्य माना जिसमें भिन्न-भिन्न मजहबों व मान्यताओं व संस्कृति वाले लोग रहते हैं मगर सब खुद को भारतीय मानते हैं जबकि 1919 में ब्रिटिश संसद ने भारत के लिए जो ‘भारत सरकार कानून’ बनाया था उसके अनुसार भारत एक ‘देश’ नहीं बल्कि विभिन्न क्षेत्रों, जातीय समूहों, संस्कृतियों व मान्यताओं को मानने वाले लोगों का ‘जमघट’ है।
नेहरू समिति ने इस मान्यता को पूरी तरह पलटते हुए भारत को एक संघीय राज्य मानते हुए एक राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। जिसके फलस्वरूप 1935 में ब्रिटिश संसद ने जब नया ‘भारत सरकार कानून’ बनाया तो उसमें भी भारत को एक संघीय राज्य बताया गया। मगर मोतीलाल नेहरू समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्वतन्त्र भारत में संसदीय लोकतान्त्रिक प्रणाली अपनाए जाने की सिफारिश करते हुए केन्द्र व राज्य स्तर पर हर पांच साल बाद होने वाले चुनावों में भाग लेने के लिए भारत के प्रत्येक वयस्क नागरिक को वोट देने के अधिकार से लैस किया और केन्द्र व राज्य सरकारों के अलग-अलग अधिकारों की व्याख्या करते हुए केन्द्र सरकार को मजबूती प्रदान की। इस बीच 1930 में पं. जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस के लाहौर में हुए अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित हुआ। इसके बाद 1931 में कराची में सरदार वल्लभ भाई पटेल की अध्यक्षता में जब कांग्रेस पार्टी का अधिवेशन हुआ तो इसमें स्वतन्त्र भारत के सभी नागरिकों को मूलभूत मानवाधिकारों से लैस करने की घोषणा की गई और मुस्लिम लीग द्वारा मुसलमानों के लिए पृथक राज्य बनाने की मांग को देखते हुए यह कहा गया कि आजाद हिन्दोस्तान में उनके अपने घरेलू कानून लागू रहेंगे मगर फौजदारी कानून बिना किसी मजहब की परवाह किये सभी नागरिकों पर एक समान रूप से लागू होंगे।
प्रस्ताव में चुनाव एक समान वयस्क वोट अधिकार के तहत कराने की बात की गई और नागरिकों को मूलभूत मानवाधिकार देने का अहद किया गया। अतः जब भारत का आजाद होना 1946 में सुनिश्चित हो गया तो नई संविधान सभा ने भारत का संविधान लिखते हुए मोती लाल नेहरू समिति द्वारा तैयार किये संविधान प्रारूप को अपने सामने रखा। मगर इस बीच 1930 में मशहूर शायर अल्लामा इकबाल की सदारत में इलाहाबाद में मुस्लिम लीग का सम्मेलन हुआ जिसमें मुसलमानों के लिए अलग से उनकी बहुसंख्या वाले उत्तर-पश्चिमी राज्यों का पाकिस्तान बनाने की मांग की गई थी। हालांकि इस सम्मेलन में पहुंचे मुसलमान नागरिकों की संख्या बहुत कम थी और सम्मेलन का जरूरी आचार नियम (कोरम) पूरा करने के लिए इलाहाबाद के मुस्लिम दुकानदारों को जैसे-तैसे लाया गया था। 1931 के कांग्रेस अधिवेशन में पारित प्रस्ताव से स्वतन्त्र भारत के प्रत्येक नागरिक को बिना किसी सामाजिक, शैक्षिक, लिंग व आर्थिक भेदभाव के एक वोट का अधिकार पाना सुनिश्चित हो गया था। अतः बाबा साहेब अम्बेडकर ने अपने लिखित संविधान में स्वतन्त्र भारत में गरीब से गरीब व पिछड़े से पिछड़े नागरिकों को राजनीतिक आजादी प्रदान की। यह इतिहास हमें बताता है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की इच्छानुसार किस प्रकार डाॅ. अम्बेडकर ने अन्य स्वतन्त्रता सेनानियों के साथ मिलकर भारत के संविधान की संरचना की। आज हम जिस लोकतन्त्र में जी रहे हैं वह गांधी की एेसी विरासत है जिसे डाॅ. अम्बेडकर ने साकार किया, हालांकि दोनों के बीच कुछ मुद्दों पर मतभेद भी रहे। इसलिए आज की पीढ़ी का यह कर्त्तव्य बनता है कि वह राष्ट्र निर्माण में आपसी मतभेदों को प्रभावी न होने दे। क्योंकि गांधी ने यह भी कहा था कि वह ‘अपने विरोधी के विचार उसे अपने से ऊंचे आसन पर बैठा कर सुनना पसन्द करेंगे’। आज पूरा राष्ट्र राष्ट्रपिता को श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहा है।

Aditya Chopra

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