भारत का ‘भाव’ संविधान दिवस - Latest News In Hindi, Breaking News In Hindi, ताजा ख़बरें, Daily News In Hindi

लोकसभा चुनाव 2024

पहला चरण - 19 अप्रैल

Days
Hours
Minutes
Seconds

102 सीट

दूसरा चरण - 26 अप्रैल

Days
Hours
Minutes
Seconds

88 सीट

तीसरा चरण - 7 मई

Days
Hours
Minutes
Seconds

94 सीट

चौथा चरण - 13 मई

Days
Hours
Minutes
Seconds

96 सीट

पांचवां चरण - 20 मई

Days
Hours
Minutes
Seconds

49 सीट

छठा चरण - 25 मई

Days
Hours
Minutes
Seconds

58 सीट

सातवां चरण - 1 जून

Days
Hours
Minutes
Seconds

57 सीट

छठा चरण - 25 मई

Days
Hours
Minutes
Seconds

58 सीट

भारत का ‘भाव’ संविधान दिवस

कैसा अद्भुत संयोग कहा जा सकता है कि भारत में अपना संविधान बनाने के लिए संविधान सभा के गठन का विचार सबसे पहले क्रान्तिकारी दार्शनिक स्व. एम.एन. राय के दिमाग में आया था

कैसा अद्भुत संयोग कहा जा सकता है कि भारत में अपना संविधान बनाने के लिए संविधान सभा के गठन का विचार सबसे पहले क्रान्तिकारी दार्शनिक स्व. एम.एन. राय के दिमाग में आया था और उन्होंने इस विचार को कांग्रेस के दिसम्बर 1936 में  ‘फैजपुर’ में हुए सम्मेलन को एक अतिथि वक्ता के रूप में सम्बोधित करते हुए पेश किया। दरअसल उन्होंने इस सम्मेलन में उद्घोष किया था कि संविधान सभा की मार्फत ‘सत्ता का अधिग्रहण।’  
श्री राय ऐसे व्यक्तित्व के धनी थे जिन्होंने 1917 में भारत की आजादी के लिए सशस्त्र संघर्ष की अपनी योजना को कार्य रूप देते समय मेक्सिको में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की थी और बाद में 1920 के आसपास उन्होंने भारत में भी इस पार्टी की स्थापना की परन्तु लगातार विदेशों में लगभग 15 वर्ष रहते हुए उनका कम्युनिस्ट आन्दोलन से मोह भंग हुआ और जब 1931 के करीब वह भारत में पुनः आये तो उन्हें अंग्रेजों ने राजद्रोह के आरोप (ब्रिटिश सम्राट को अपदस्थ करने के लिए षड्यंत्र रचने) में इकतरफा मुकद्दमा चला कर पहले 12 साल और बाद में छह साल की सजा सुनाई। 
वास्तव में एमएन राय ने ‘क्रान्तिकारी मानवतावाद’ का दर्शन कांग्रेस व कम्युनिस्ट दोनों की ही मूल विचारधाराओं से हट कर लिखा जो बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय व स्वामी विवेकानन्द और महर्षि अरविन्द के विचारों की गोलबन्दी के साथ भारत के मुफलिस व निरक्षर कहे जाने वाले नागरिकों के विकास हेतु सत्ता की नीति और नीयत दोनों का ही वैज्ञानिक विधान तय करता था। 
श्री राय का उल्लेख आज 26 नवम्बर को भारत के संविधान दिवस पर इसलिए आवश्यक है क्योंकि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के स्वतन्त्रता आदोलन के चलते ही स्व. राय ने सर्वप्रथम भारतीयों की पूर्ण स्वतन्त्रता के लिए भारतीयों की ही संविधान सभा को जरूरी बताया था। 
बेशक ब्रिटिश संसद ने 1935 में दूसरा ‘भारत सरकार कानून’ स्व. मोती लाल नेहरू को संविधान का मोटा खाका ( ड्राफ्ट कांस्टीट्यूशन) बनाने का काम दिया था और इसी के अनुसार बाद में पहली बार ब्रिटिश इंडिया में प्रान्तीय एसेम्बलियों के चुनाव भी कराये गये थे मगर श्री राय की परिकल्पना संविधान के केन्द्र में भारत के सबसे गरीब और मुफलिस आदमी को रखने की थी। संभवतः यह कार्य बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने संविधान लिखते समय किया क्योंकि वह इसकी संरचना समिति के अध्यक्ष थे। 
1945 में जिस सेंट्रल एसेम्बली के चुनाव हुए थे बाद में 1946 में ही केबिनेट मिशन लगभग समाप्त हो जाने के बाद उसे ही संविधान सभा में बदल दिया गया था और इसके अध्यक्ष बाबू राजेन्द्र प्रसाद बनाये गये थे। 15 अगस्त 1947 को भारत का बंटवारा हो जाने के बाद और पाकिस्तान निर्माण के मुद्दे पर पूरे देश में रक्तपात होने की वजह से संविधान का कायदे से लिखना 1947 के बाद ही हुआ जिसकी बैठकों में उस समय के भारत के हर क्षेत्र के दूरदर्शी विचारक व चिन्तक शामिल होते थे। इनमें शिब्बन लाल सक्सेना जैसे जमीन से जुड़े व्यक्तित्वों से लेकर के.एम. मुंशी जैसे सांस्कृतिक विचारक शामिल थे और कांग्रेस आदोलन के लगभग सभी अग्रणी नेता संविधान सभा में चुनकर आये थे। 
दूसरी तरफ हिन्दू महासभा व अकाली दल के नेता भी थे। इनमें डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम उल्लेखनीय है। कमी केवल उन समाजवादी विचारों के प्रवर्तक नेताओं की थी जिन्होंने इस वजह से इन्कार कर दिया था कि सदन की सदस्यता लेने तक सदस्यों को ब्रिटेन के सम्राट या महारानी के प्रति निष्ठावान होने की शपथ लेनी पड़ती थी। यही वजह रही कि संविधान सभा में डा. राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण व आचार्य नरेन्द्र देव जैसे दिग्गज नहीं थे  परन्तु जब 26 नवम्बर 1949 को बाबा साहेब ने संविधान पूरा लिख कर संविधान सभा को समर्पित कर दिया तो इसे लागू करने वाले प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू की जिम्मेदारी सबसे बड़ी थी क्योंकि उन्हें सिद्ध करना था कि जिन भारतीयों पर ब्रिटिश सत्ता दो सौ वर्षों तक लागू रही है और आम भारतीय गुलामी की मानसिकता में बुरी तरह दबा दिया गया है वह आजाद होकर अपने ही बनाये संविधान का अनुपालन करते हुए किस तरह स्वयं को नई व्यवस्था में सरकार का मालिक बनने के दायित्व को निभा सकता है। 
नेहरू ऐसे विचारक थे जिन्होंने आजादी से पहले ही लन्दन के अखबारों में लेख लिख कर घोषित कर दिया था कि ‘भारत कभी भी गरीब मुल्क नहीं रहा।’ नेहरू की यह भविष्यवाणी आजाद भारत में सही साबित हुई। अम्बेडकर द्वारा लिखे गये संविधान को अपनाकर ही भारत की जनता ने कालान्तर में सिद्ध कर दिया कि उसे उसके विद्वान व दूरदर्शी संविधान निर्माताओं ने जो प्रणाली व व्यवस्था सौंपी है, उसकी चौकीदारी और पहरेदारी करने में वे किसी भी रूप में अपने पुरखों की अपेक्षाओं पर पूरा उतर कर दिखायेंगे। पिछले सत्तर साल से ऐसे कई अवसर आये हैं और अवसाद की घड़ियां भी आयी हैं जब संविधान को लांघने के प्रयास हुए।  
बेशक 1975 में लागू की गई इमरजेंसी ऐसा ही दुखद अवसर था मगर ऐसा करते ही भारत की  अंतर्राष्ट्रीय जगत में प्रतिष्ठा बुरी तरह गिरने लगी थी और इमरजेंसी लागू करने वाली स्व. इदिरा गांधी को स्वयं ही इसे समाप्त करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। संविधान में भारत की प्रतिष्ठा किस प्रकार निहित हो चुकी है, इसका उदाहरण यह घटना सर्वदा के लिए बन चुकी है। क्योंकि यह केवल अधिकार ही नहीं देता है बल्कि दायित्व भी देता है। 
नागरिकों का सबसे पहला दायित्व इसी संविधान की रक्षा करने हेतु राजनैतिक रास्ते से अपने इस प्रणाली का मालिक होने का सबूत देना भी रहा है। यही वजह है कि भारत की बहुदलीय राजनैतिक प्रशासनिक प्रणाली में केन्द्र से लेकर राज्य स्तर तक प्रयोग पर प्रयोग होते रहे हैं और सत्ता पर जो लोग अपना जन्मजात अधिकार मानने लगे थे वे हाशिये पर छोड़े जा रहे हैं। 
लोकतान्त्रिक प्रणाली की सौगात देने वाले हमारे संविधान ने सिद्ध कर दिया है कि लाख सामाजिक कुरीतियों और रूढि़वादी परंपराओं के बावजूद संवैधानिक रास्ते से ही क्रान्तिकारी परिवर्तन किये जा सकते हैं। यहां तक कि कल तक चाय बेचने वाला एक व्यक्ति इस देश का प्रधानमन्त्री तक बन सकता है और कभी अपनी रियासत में अपने हुक्म को कानून बनाने वाला पुराना राजा-महाराजा (ग्वालियर के पूर्व नरेश) चुनावी मैदान में बुरी तरह शिकस्त खा सकता है, लेकिन हमें बाबा साहेब के उन शब्दों पर भी ध्यान देना होगा जो उन्होंने 26 नवम्बर 1949 को ही संविधान सभा में कहे थे जिनका सार यह था कि ‘‘वयस्क आधार पर मिली राजनैतिक आजादी को सुरक्षित रखने के लिए आर्थिक आजादी बहुत जरूरी है और इसके लिए जाति व धर्म और सम्प्रदाय के आधार पर की गई सामाजिक गोलबन्दी के राजनैतिक रूपान्तरण को समाप्त करना बहुत जरूरी होगा वरना इन क्षेत्रों के मठाधीश हमारी राजनैतिक आजादी के सौदागर बनकर लोकतन्त्र की ताकत को अपने हाथों में समेटने में कामयाब हो जायेंगे।’’ अतः ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ हमारे संविधान का नीतिसूत्र लोकसत्ता को ही प्रतिष्ठित करता है जिसमें निरन्तरता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

fifteen − two =

पंजाब केसरी एक हिंदी भाषा का समाचार पत्र है जो भारत में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली के कई केंद्रों से प्रकाशित होता है।