भारत सरकार के गृह मन्त्रालय द्वारा सभी अधिकारी समारोहों में राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’के सभी छह छन्द गाये जाने को अनिवार्य जाने के बाद पूरे देश में यह अनावश्यक बहस छिड़ गई है कि एेसा करना क्यों जरूरी समझा गया। सबसे पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि वन्दे मातरम् वह गीत है जो भारत के प्रथम स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान सभी विचारों व सिद्धान्तों के लोगों द्वारा गाया जाता रहा तथा अंग्रजों के विरुद्ध विद्रोह का प्रतीक बन गया। यह गीत भारत भूमि की वन्दना इस प्रकार करता है कि इसमें रहने वाले सभी धर्मों व समुदायों के लोग इसे अपनी पुण्य भूमि मानते हैं। 1937 से पहले इस गीत के सभी छह छन्दों का पाठ सार्वजनिक रूप से आजादी के दीवानों द्वारा किया जाता था और सबसे ज्यादा क्रान्तिकारी मार्ग से भारत को स्वतन्त्रता दिलाने की कसम उठाने वाले युवा ही इसका गायन करते थे और फांसी को फंदे को हंसते-हंसते चूम लेते थे। मगर भारत की आजादी का इतिहास भी कई आयामों वाला है जिसमें सबसे ज्यादा विवादास्पद पाकिस्तान का गठन होना है। यह सर्वविदित है कि 1920 तक मोहम्मद अली जिन्ना कांग्रेस पार्टी में भी सक्रिय रहा था और इसका सदस्य भी था, मगर वह मुस्लिम लीग का भी सदस्य था क्योंकि 1906 में भारत में गठित मुस्लिम लीग के सदस्य मुस्लिम नागरिकों को दोहरी सदस्यता रखने की इजाजत कांग्रेस पार्टी ने दे रखी थी। अंग्रेजों ने संयुक्त भारत के हिन्दू- मुसलमानों को आपस में बांट देने की गरज से ही 1909 में प्रथक निर्वाचन मंडल देने का फैसला कर लिया था। इसके साथ-साथ ही 1885 में गठित कांग्रेस पार्टी अंग्रेजों से शासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाये जाने की मांग लगातार कर रही थी जिसे बाद में सेल्फ रूल या स्वराज तक किया गया और 1930 में जाकर पूर्ण स्वराज्य की मांग की गई। मगर इस बीच मोहम्मद अली जिन्ना ने महात्मा गांधी के भारत आने के बाद उनसे मतभेद हो जाने के कारण कांग्रेस पार्टी की सदस्यता छोड़ दी और वह मुस्लिम लीग का ही सदस्य बना रहा परन्तु 1930 के बाद से इंग्लैंड से दोबारा वापस आने के बाद से उसकी राजनीति बदलती गई और वह मुसलमानों के लिए धर्म के आधार पर अलग राष्ट्र बनाने का हिमायती हो गया। जिन्ना की राजनीति में भारत के विभिन्न प्रान्तों में 1936 में हुए प्रथम प्रान्तीय चुनावों के बाद आमूलचूल परिवर्तन आया और उसने खुलेआम एेलानिया साम्प्रदायिक राजनीति करने की नीयत बना ली और तत्कालीन अंग्रेज वायसराय को भी इस बारे में बता दिया। उसने खुलेआम यह कहना शुरू कर दिया कि भारत में हिन्दू और मुसलमान एक साथ मिल कर नहीं रह सकते हैं क्योंकि इन दोनों सम्प्रदायों की संस्कृति अलग-अलग है। हिन्दुओं के लिए जो एेतिहासिक व्यक्तित्व नायक हैं वे मुसलमानों के लिए खलनायक हैं और भाषा से लेकर वेशभूषा तक दोनों समुदायों के रहन-सहन व खान-पान में आधारभूत अन्तर है। इसकी असल वजह यह थी कि 1936 के प्रन्तीय चुनावों में मुस्लिम लीग की जबर्दस्त हार हुई थी और मुस्लिम बहुल प्रान्तों तक में उसके सदस्य अच्छी संख्या में जीत नहीं पाये थे। जबकि दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी को शानदार जीत मिली थी और मुस्लिम निर्वाचक सीटों तक पर उसके प्रत्याशी अच्छी-खासी संख्या में जीते थे। जिन्ना को सबसे बड़ा धक्का पंजाब में मिला था जहां की एसेम्बली में उसके केवल दो सदस्य ही जीत पाये थे और यहां कांग्रेस व पंजाब यूनियनिस्ट पार्टी को शानदार जीत हासिल हुई थी। आज के उत्तर प्रदेश और तब के सेंट्रल प्राविंस में भी मुस्लिम लीग को 1936 में खास सफलता नहीं मिल पाई थी और कांग्रेस पार्टी को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ था जहां उसकी सरकार का गठन हुआ था। इस राज्य में मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों को मन्त्रिमंडल का सदस्य बनाने के लिए कांग्रेस ने शर्त रख दी थी कि उन्हें लीग छोड़कर कांग्रेस का सदस्य बनना होगा। इससे जिन्ना बिफर उठा था और उसने एेलान कर दिया था कि वह अब से खुल कर साम्प्रदायिक राजनीति करेगा। यह स्थिति अंग्रेजों के अनुकूल थी। अतः उन्होंने जिन्ना को खुलकर एेसा करने दिया और संयोग से अक्तूबर 1939 से दूसरा विश्वयुद्ध भी शुरू हो गया। जिन्ना की इस राजनीति का असर यह हुआ कि 1937 में कांग्रेस कार्य समिति में राष्ट्रगीत वन्दे मातरम् को लेकर एक लम्बा प्रस्ताव पारित हुआ जिसमें कहा गया कि इस गीत के केवल शुरू के दो छन्द ही गाये जायें जिनमें भारत धरा व इसके सभी 30 करोड़ लोगों का वर्णन है तथा शेष चार छन्दों को छोड़ दिया जाये जिनमें भारत माता की उपमा हिन्दू देवियों से की गई है। 1937 से पहले भारत के किसी भी मुसलमान को सभी छह छन्दों के गाये जाने से परहेज नहीं था मगर जिन्ना के विरोध के बाद यह सिलसिला शुरू हुआ। पहली बार 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में स्वयं गुरुदेव रवीन्द नाथ टैगोर ने इसका गायन किया। मगर 1905 में अंग्रेजों द्वारा बंगाल का विभाजन किये जाने पर इसके विरोध में जब बंगाली लोग सड़कों पर निकले तो यह गीत उनकी प्रेरणा का स्रोत बन गया और बाद में आजादी के आन्दोलन में लगे अन्य प्रान्तों के लोग भी इसका अनुसरण करने लगे। मगर आजाद भारत में इसके केवल शुरू के दो छन्द ही राष्ट्रगीत के रूप में अधिसूचित किये गये। अब जब इसके सभी छह छन्द गाने अिनवार्य किये गये हैं तो भारत में जिन्ना की मानसिकता वाले लोग इसका विरोध कर रहे हैं और इसे इस्लाम धर्म की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला बता रहे हैं।
वन्दे मातरम् पर भी विवाद
Summary :
भारत सरकार के गृह मन्त्रालय द्वारा सभी अधिकारी समारोहों में राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’के सभी छह छन्द गाये जाने को अनिवार्य जाने के बाद पूरे देश में यह अनावश्यक बहस छिड़ गई है कि एेसा करना क्यों जरूरी समझा गया। सबसे पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि वन्दे मातरम् वह गीत है जो भारत के प्रथम स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान सभी विचारों व सिद्धान्तों के लोगों द्वारा गाया जाता रहा तथा अंग्रजों के विरुद्ध विद्रोह का प्रतीक बन गया। यह गीत भारत भूमि की वन्दना इस प्रकार करता है कि इसमें रहने वाले सभी धर्मों व समुदायों के लोग इसे…


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