‘अब मुझसे यह धूप का नाज़ और उठाया नहीं जाता
मेरी राह में भी तो कोई छांव वाला मजबूत दरख्त हो’
हौले सियासी दस्तकों से अपनी नई पारी का रोड मैप तैयार करने की तैयारियों में जुट गई हैं कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी। गांधी परिवार से जुड़े विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि इस 6 जनवरी को अमेरिका की अपनी निजी यात्रा पर रवाना होने से चंद रोज पहले ही प्रियंका व राहुल गांधी में वन-टू-वन एक लंबी बातचीत हुई, जिसमें कांग्रेस के लिए भविष्य की रणनीति, इसका चेहरा-मोहरा बदलने की कवायद जैसे मुद्दों पर खुल कर चर्चा हुई। कहते हैं प्रियंका ने राहुल के समक्ष यह साफ कर दिया है कि ’वह पार्टी हित में बड़े फैसले लेने को तैयार हैं।’ प्रियंका पिछले तीन वर्षों से अध्यक्ष खड़गे की टीम में बिना किसी प्रभार या दायित्व के महासचिव हैं। कहते हैं राहुल से अपनी बातचीत में प्रियंका ने साफ कर दिया है कि ’अब कांग्रेस को लड़ने-मरने वाला, पार्टी कैडर में एक नई जान फूंकने वाला अध्यक्ष चाहिए, एक ऐसा अध्यक्ष जिसका नार्थ व साऊथ में बराबर की अपील हो।’ फिर प्रियंका ने राहुल से पूछा-’भाई तुम्हारे मन में कोई विचार चल रहा हो तो बताओ?’ काफी सोच-विचार कर, अपना वक्त लेकर राहुल ने अपने पिटारे से जो दो नाम निकाले, वे थे-जयराम रमेश व अजय माकन। प्रियंका ने फौरन हस्तक्षेप करते हुए कहा-’नहीं, इनसे बात नहीं बनेगी, अगर आप चाहते हों तो मैं यह जिम्मेदारी उठाने को तैयार हूं।’ पेशानियों पर अनायास उभर आई सलवटों से जूझते हुए राहुल ने बेहद मासूमियत से कहा-’फिर तो बीजेपी वाले हमारी पार्टी को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी कहने लगेंगे।’ प्रियंका ने कहा, ‘इसमें नया क्या है? वे अब भी तो यही कहते हैं।’ दरअसल पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पांच साल का कार्यकाल अक्तूबर 2027 में पूरा होने वाला है, उनकी राज्यसभा की मियाद भी जून 2026 में खत्म होने वाली है। सो, अगर प्रियंका गांधी की इन मंशाओं को मां सोनिया का अनुमोदन और भाई राहुल का भरोसा प्राप्त हो जाता है तो आने वाले दिनों में यकीनन भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को एक नया अध्यक्ष भी मिल सकता है।
असम में लिए कांग्रेस टीम गठन की सियासत
खुद को असम विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की ’चुनाव स्क्रीनिंग कमेटी’ की अध्यक्ष घोषित किए जाने पर प्रियंका गांधी सकते में थीं, सूत्र बताते हैं कि उन्हें हैरत इस बात पर ज्यादा थी कि कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने उनसे पूछे बगैर यह ‘नोटिफिकेशन’ कैसे जारी कर दिया? कहते हैं प्रियंका ने खड़गे, अजय माकन और वेणुगोपाल तीनों से बस यही बात कही कि ’अगर आपको राहुल जी को कोई जिम्मेदारी देनी होती है तो पहले आप उनसे पूछते, फिर घोषणा करते या घोषणा करने के बाद उन्हें बताते?’ सूत्रों की मानें तो प्रियंका इस बात को भलीभांति जानती हैं कि असम में उनके करने के लिए बहुत कुछ नहीं है। वहां राहुल की टीम पहले से बहुत सक्रिय है। राहुल के बेहद करीबी गौरव गोगोई ‘सीएम फेस’ की तरह ही आचरण कर रहे हैं, असम के प्रभारी महामंत्री भंवर जितेंद्र सिंह सिर्फ राहुल की ही सुनते हैं और इसके बाद कांग्रेस ने तीन सीनियर पर्यवेक्षक यानी भूपेश बघेल, डीके शिवकुमार व बंधु टिर्की को भी यहां चुनाव की जिम्मेदारी सौंप दी है। सो, उनके यानी प्रियंका के करने के लिए यहां क्या खास बचता है? वैसे भी इस बार कांग्रेस असम की कुल 126 में से मात्र 100 सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है, शेष 26 सीटें कांग्रेस ने अपनी सहयोगी दलों मसलन असम जातीयता पार्टी, रायजोर दल व वामपंथी दलों के लिए छोड़ दी हैं। और इस बार असम में कांग्रेस की संभवनाएं कहीं बेहतर हैं, क्योंकि मुस्लिम वोटर इस दफे बदरुद्दीन अजमल जैसों के पाले में न जाकर कांग्रेस के पक्ष में एकजुट लगते हैं। जो कांग्रेस के नजरिए से यह एक अच्छी खबर हो सकती है। सूत्रों की मानें तो चूंकि प्रियंका खुद केरल के वायनाड से सांसद हैं, इसीलिए वे अपने लिए केरल में बेहतर संभावनाएं तलाश रही थीं, वैसे भी केरल कांग्रेस में आपसी खींचतान बहुत है, प्रियंका को इस बात का कहीं शिद्दत से इल्म है, सो उन्होंने कांग्रेस के विभिन्न गुटों के नेताओं से पहले से ही बातचीत शुरू कर दी थी, प्रियंका उनके बीच एक समन्वय बनाने का कार्य कर रही थीं। पर राहुल ने केरल के लिए जो पर्यवेक्षकों के नाम तय करवाए, वे हैं सचिन पायलट, कर्नाटक सरकार में ऊर्जा मंत्री और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के खासमखास में शुमार होने वाले के जे जॉर्ज और राहुल की खास दृष्टि प्राप्त इमरान प्रतापगढ़ी। प्रियंका समझ चुकी हैं केरल में होइए वही जो राहुल रचि राखा।
क्या है बंगाल में दीदी की जीत का फार्मूला?
ज्यों-ज्यों बंगाल विधानसभा चुनाव की घड़ी करीब आती जा रही है, तृणमूल बनाम भाजपा की टंकार नित्य नए आकार ग्रहण कर रही है। ईडी ने कोलकाता स्थित ‘आईपैक’ के दफ्तर और इसके सिरमौर प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी की तो दीदी वहां फौरन पहुंच गईं, बाहर आईं तो उनके हाथों में एक हरे रंग की फाइल थी। सनद रहे कि प्रतीक तृणमूल के आईटी सेल के प्रमुख भी हैं, वहीं उनकी कंपनी तृणमूल को न सिर्फ राजनीतिक परामर्श देती है अपितु इसके आईटी और मीडिया प्रकोष्ठ का काम भी देखती है। सूत्रों की मानें तो ममता इस दफे राज्य में भाजपा के समक्ष कड़ी चुनौती पेश कर रही हैं। राज्य की कुल 294 में से 100 सीटें ऐसी हैं जिसे तृणमूल का गढ़ कहा जा सकता है, 45 सीटों को आप अभेद भगवा किला मान सकते हैं। इस बार भाजपा कोलकाता व इसके आसपास की 50 सीटों पर पूरा जोर लगा रही है, पिछले कुछ चुनावों में इन सीटों पर भाजपा के वोट प्रतिशत में यकीनन इजाफा हुआ है, पर अभी वह ज्यादातर सीटांे पर जीत के जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच पाई है। इस बार पश्चिम बंगाल चुनाव की पूरी बागडोर अमित शाह के हाथों में है, 2021 के चुनाव के मुकाबले इस बार यहां पीएम मोदी थोड़ा कम दम लगाएंगे, उनकी रैलियां भी कम होंगी और तब के 8 चरणों के चुनाव की जगह इस बार यहां केवल 3 चरणों में ही चुनाव हो सकते हैं। शुभेंदु अधिकारी अमित शाह के बेहद करीबियों में शुमार होते हैं, अधिकारी चाहते थे कि भाजपा उन्हें सीएम फेस प्रोजेक्ट कर चुनाव में जाए, पर पीएम की राय थी कि दिलीप घोष को भी चुनाव में उतना ही महत्व मिलना चाहिए, पीएम के कहने के बाद ही घोष को ठंडे बस्ते से बाहर निकाल झाड़-पोंछ कर चमकाया जा रहा है। हर बार की तरह इस बार भी ममता के लिए महिला वोटर ही उनकी ‘ट्रंप कार्ड’ हैं। प्रदेश की महिलाओं के लिए दीदी 2021 से ही ’लक्ष्मी भंडार योजना’ चला रही हैं, जिसमें महिलाओं को नकद पैसे मिलते हैं। इस योजना में एससी/एसटी समुदाय की महिलाओं के लिए 1200 रुपए प्रति माह और अन्य श्रेणी की महिलाओं के लिए हजार रुपए महीना तय है। इस योजना से प्रभावित होकर राज्य की महिला वोटर्स जाति-धर्म से ऊपर उठ कर ममता के लिए वोट कर रही हैं, माना जाता है कि भगवा रणनीतिकारों ने भी इस बार इसकी काट ढूंढ निकाली है।
झामुमो का इंतजार कितना लंबा?
झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार ने झारखंड मुक्ति मोर्चा को भाजपा के करीब लाने में अपनी सारी ताकत झोंक दी थी और इसमें वे कुछ हद तक कामयाब भी रहे। कहते हैं हेमंत सोरेन ने एनडीए में शामिल होने के लिए अपनी हामी भर दी है। पर बदले में वे चाहते हैं कि ’उनकी पत्नी कल्पना सोरेन को केंद्रनीत मोदी सरकार में किसी अहम मंत्रालय से नवाज़ा जाए,’ उनकी योजना अपनी पत्नी को ऊपरी सदन में भेजने की भी है। पर सोरेन को इसके लिए थोड़ा इंतजार करना होगा, कहा जा रहा है कि अपनी इस तीसरी बार की सरकार के दो वर्श पूर्ण होने के बाद भाजपा सरकार की योजना अपने कैबिनेट में एक व्यापक फेरबदल की है। वहीं हेमंत चाहते हैं कि 2029 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 8 तो झामुमो 6 सीटों पर चुनाव लड़े, सनद रहे कि झारखंड में लोकसभा की कुल 14 सीटें हैं। वहीं भाजपा व संघ की राज्य इकाई झामुमो से ऐसे किसी गठबंधन के सख्त खिलाफ है, इनका मानना है कि ’इन दोनों पार्टियों में वैचारिक समानता कहीं दूर-दूर तक नहीं है, दूसरा हेमंत सोरेन कब पलट जाएं यह कहना मुश्किल है, वे जितनी आसानी से एनडीए में आने को तैयार हो गए हैं, वक्त बदला तो वे उतनी ही आसानी से एनडीए छोड़ भी देंगे।’
…और अंत में
पिछले कुछ महीनों में यह तीसरा मौका है जब भाजपा के एक बड़े नेता अपना सारा काम धंधा छोड़ दो-दो दिनों के लिए राजस्थान में धूनी रमाए बैठे हैं। इस 9-10 जनवरी को भी शाह जयपुर में थे, दरअसल भाजपा शीर्ष जानता है कि पूरे हिंदी पट्टी में राजस्थान ही एक ऐसा राज्य है जहां आज भाजपा सबसे कमजोर स्थिति में है। पार्टी के अंदर ही इतने गुट बने हुए हैं कि विपक्षियों से कहीं ज्यादा अपने ही पार्टी का अहित कर रहे हैं। खास कर राज्य में नेतृत्व को लेकर भी लगातार असंतोष बना हुआ है। सूत्रों की मानें तो जैसे ही भजनलाल सरकार अपने दो साल का कार्यकाल पूरा करेगी, वहां नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें हैं। राज्य की प्रभावशाली नेता वसुंधरा राजे को अंता उपचुनाव जिताने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, जिसमें वो फेल रहीं। खास कर उनकी कार्यशैली को लेकर भी कैडर में असंतोष था, क्योंकि उन्होंने अपने पुत्र दुष्यंत को ही अंता का चुनाव प्रभारी बना दिया था। सो, लगता नहीं कि महारानी पर यह बड़ा नेता शीर्ष एकबारगी फिर से इतना भरोसा कर पाएगा।
प्रियंका हो सकती हैं कांग्रेस अध्यक्ष?
Summary :
‘अब मुझसे यह धूप का नाज़ और उठाया नहीं जाता मेरी राह में भी तो कोई छांव वाला मजबूत दरख्त हो’ हौले सियासी दस्तकों से अपनी नई पारी का रोड मैप तैयार करने की तैयारियों में जुट गई हैं कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी। गांधी परिवार से जुड़े विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि इस 6 जनवरी को अमेरिका की अपनी निजी यात्रा पर रवाना होने से चंद रोज पहले ही प्रियंका व राहुल गांधी में वन-टू-वन एक लंबी बातचीत हुई, जिसमें कांग्रेस के लिए भविष्य की रणनीति, इसका चेहरा-मोहरा बदलने की कवायद जैसे मुद्दों पर खुल कर चर्चा हुई। कहते हैं…


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