दमादम मस्त कलंदर, शायर सिद्दीकी और अयूब खां

Summary :

वैसे इकबाल, फैज़, मंटो के मुल्क में भी कई शायर अंधेरे में ही रहे। ऐसा ही यह शायर था सागर सिद्दीकी। विश्वभर में लगभग 300 से अधिक गायकों ने उसका लिखा एक गीत गाया। उसके गायकों में नूरजहां भी थी, रूना लैला भी। वह जन्मा था वर्तमान हरियाणा के शहर अम्बाला छावनी में। उसी शहर में एक मौहल्ला है ‘लालकुर्ती’। उसी मौहल्ले में पहली बार, ‘दमादम मस्त कलंदर’ का विश्व-प्रसिद्ध गीत लिखने वाले शायर सिद्दीकी ने 14 अगस्त 1928 में जन्म लिया था। उसकी मातृभाषा पंजाबी थी मगर 16 वर्ष की उम्र में ही उर्दू के शायर बन गए। उसी…

वैसे इकबाल, फैज़, मंटो के मुल्क में भी कई शायर अंधेरे में ही रहे। ऐसा ही यह शायर था सागर सिद्दीकी। विश्वभर में लगभग 300 से अधिक गायकों ने उसका लिखा एक गीत गाया। उसके गायकों में नूरजहां भी थी, रूना लैला भी। वह जन्मा था वर्तमान हरियाणा के शहर अम्बाला छावनी में। उसी शहर में एक मौहल्ला है ‘लालकुर्ती’। उसी मौहल्ले में पहली बार, ‘दमादम मस्त कलंदर’ का विश्व-प्रसिद्ध गीत लिखने वाले शायर सिद्दीकी ने 14 अगस्त 1928 में जन्म लिया था। उसकी मातृभाषा पंजाबी थी मगर 16 वर्ष की उम्र में ही उर्दू के शायर बन गए। उसी मौहल्ले में कुछ वर्ष मंटो ने भी गुजारे थे। उनसे इस शायर को भी मिलवाया गया, तब मंटो ने कहा था, ‘अरे कोई और ढंग का काम करो, बाप का सहारा बनो। यह कलम वलम तो सिर्फ दिमाग खराब करती है।’
मगर सागर सिद्दीकी नहीं रुका। उसकी शायरी के तीखे तेवरों को देखते हुए उसे लुधियाना, जालंधर, अमृतसर और सहारनपुर के मुशायरों में बुलाया जाने लगा।
1947 में देश विभाजन के वक्त उनकी उम्र 19 साल थी। वे हिन्दुस्तान छोड़कर पाकिस्तान चला गया और लाहौर में सड़कों पर जि़न्दगी गुज़ारने लगा। उनकी हालत इतनी ख़स्ता थी कि वे दो-दो रुपए में अपनी गज़़लें लोगों को बेच दिया करता था। वे लोग आगे उन गज़़लों को अपने नाम से छपवा लिया करते थे।
उन दिनों ही मुम्बई से पाकिस्तान गए फिल्म जगत के कुछ लोगों ने मिलकर फिल्म ‘लाल मिर्जा’ का निर्माण किया। फिल्म के निर्देशन का भार संगीतकार मास्टर आशिक हुसैन ने अपने ऊपर ले लिया। वे सागर सिद्दीकी को जानते थे। उन्होंने सागर सिद्दीकी से फिल्म के लिए गाना लिखने की फरमाइश की और सागर सिद्दीकी ने 20 साल की उम्र में ‘दमादम मस्त कलन्दर’ लिखकर मास्टर आशिक़ हुसैन को दे दिया। वैसे इस गीत के मूल रूप की पंक्तियां अमीर खुसरो व बुल्ले शाह के नाम पर भी दर्ज हंै, मगर उसे प्रभावी रूप में व परिवर्द्धित रूप में सागर ने स्वयं भी गाया और एक फिल्म के लिए भी दिया। गीत के बदले उन्हें बीस रुपए दिए गए थे। फिर आशिक़ हुसैन ने इस गीत की धुन बनाई और गायिका नूरजहां से यह गीत गवाया। इसी गीत को गाने के बाद नूरजहां बेहद लोकप्रिय गायिका बन गईं और यहीं से उनका फिल्मों के लिए गायन के क्षेत्र में प्रवेश हुआ। बाद में धीरे-धीरे यह गीत इतना लोकप्रिय हुआ कि सारी दुनिया में छा गया। दुनिया भर के तीन सौ से अधिक गायकों ने यह गीत गाया है लेकिन गीत का रचयिता और संगीतकार दोनों गऱीब ही रहे। सागर सिद्दीकी भिखारियों के साथ ही सड़क पर रहने लगा। उसे भांग, चरस और गांजे जैसे नशों की आदत पड़ गई थी और वह भीख मांग कर गुज़ारा करते थे और सड़क पर ही रहा करता था। घोर सर्दियों की रात में वे कूड़ा जला कर अपनी ठण्ड भगाया करता था। 19 जुलाई 1974 को सुबह-सवेरे लाहौर में एक दुकान के सामने सड़क पर उसका शव पाया गया था।
उधर मास्टर आशिक़ हुसैन नई इक्कीसवीं सदी में भी जि़न्दा थे। संगीतकार के रूप में उनकी कोई पूछ नहीं थी। अपने निधन से एक दिन पहले तक वे सड़क पर पकौड़े बनाकर बेचने का ठेला लगाते थे और उसी से अपनी जीविका चलाते थे।
अमृतसर वाले दिनों में सागर ने लकड़ी की कंघी बनाने वाली एक दुकान पर मुलाज़मत कर ली और कंघियां बनाने का फन भी सीख लिया। इस दौरान शेर.गोई का सिलसिला शुरू हो चुका था। शुरू में क़लमी नाम नासिर हिजाज़ी था लेकिन जल्द ही बदलकर सागऱ सिद्दीक़ी कर लिया। सागऱ अपने अशआर बेतकल्लुफ दोस्तों को सुनाने लगे। 1944 में अमृतसर में एक ऑल इंडिया मुशायरा मुनअकि़द हुआ जिसमें शिरकत के लिए लाहौर के अनेक शायर भी मदऊ थे। सागऱ की आवाज़ में बला का सोज़ था, तरन्नुम की रवानी थी जिससे उन्होंने उस मुशायरे में सबका दिल जीत लिया। इस मुशायरे ने उसे रातों-रात शोहरत की बुलन्दी तक पहुंचा दिया। उसके बाद सागऱ को लाहौर और अमृतसर के मुशायरों में बुलाया जाने लगा। शायरी सागऱ के लिए ‘वजह-ए-शोहरत’ के साथ- साथ ‘वसीला-ए-रोजग़ार’ भी बन गई और यूं नौजवान शायर ने कंघियों का काम छोड़ दिया।
विभाजन के बाद सागऱ अमृतसर से लाहौर चले गए। सागऱ ने इस्लाह के लिए लतीफ़ अनवर गुरदासपुरी की तरफ रुजूअ किया और उनसे बहुत फ़ैज़ पाया। 1947 से लेकर 1952 तक का ज़माना सागऱ के लिए सुनहरा दौर साबित हुआ। उसी अरसे में कई रोजऩामों, माहवार अदबी जरीदों और हफ़्तावार रिसालों में सागऱ का कलाम बड़े सम्मान के साथ प्रकाशित होता रहा। फिल्मी दुनिया ने सागऱ की मक़बूलियत देखी तो कई फिल्म प्रोड्यूसरों ने उनसे गीत लिखने की फरमाइश की और उन्हें माक़ूल मुआवज़ा देने की यक़ीन-दहानी कराई। मगर कभी किसी ने वादा नहीं निभाया। वर्ष 1952 के बाद सागऱ की जि़ंदगी खऱाब सोहबत की बदौलत हर तरह के नशे का शिकार हो गई। वो भंग, शराब, अफय़ून और चरस वग़ैरह इस्तेमाल करने लगे। उसी आलम-ए-मदहोशी में भी मश्क़-ए-सुखऩ जारी रहती और सागऱ गज़़ल, नज़्म, क़तआ और फिल्मी गीत हर शैली ए सुखऩ में शाहकार तख़लीक़ करता रहा।
उसकी कृतियों में ‘ज़हर ए आरज़ू’, ‘ग़म ए बहार’, ‘शब ए आगाही’, ‘तेशा ए दिल’, ‘लौह ए जुनूं’, ‘सब्ज़ गुंबद’, ‘मक़तल ए गुल’, ‘कुल्लियात ए सागऱ’ शामिल हैं। जनवरी 1975 को वह पक्षाघात का शिकार हो गया। उसकी वजह से उनका दायां हाथ हमेशा के लिए बेकार हो गया। फिर कुछ दिन बाद मुंह से ख़ून आने लगा, जिस्म सूख कर हड्डियों का ढांचा रह गया। सागऱ सिद्दीक़ी का आखिऱी वक्त दाता दरबार के सामने पायलट होटल के फुटपाथ पर गुजऱा और उसकी मृत्यु 19 जुलाई 1974 की सुबह को उसी फुटपाथ पर हुई। उन्हें म्यानी साहब के क़ब्रिस्तान में दफनाया गया।

Dr. Chander Trikha