घटते वोटर व चुनाव आयोग

Summary :

भारत का चुनाव आयोग जिन 12 राज्यों (तीन केन्द्र प्रशासित क्षेत्र मिलाकर ) में मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण कर रहा था उनके दूसरे दौर का काम पूरा हो चुका है जिसमें इन राज्यों मेंं लगभग 13 प्रतिशत मतदाताओं के नाम सूचियों से कट गये हैं और कुल मतदाताओं की संख्या 50.97 करोड़ से घटकर 44.40 करोड़ की रह गई है । इनमें सबसे ज्यादा मतदाता देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से कटे हैं जहां यह संख्या 15.44 करोड़ से घटकर 12.55 करोड़ रह गई है। इससे यह साबित होता है कि चुनाव आयोग पूरी तरह निष्पक्ष होकर…

भारत का चुनाव आयोग जिन 12 राज्यों (तीन केन्द्र प्रशासित क्षेत्र मिलाकर ) में मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण कर रहा था उनके दूसरे दौर का काम पूरा हो चुका है जिसमें इन राज्यों मेंं लगभग 13 प्रतिशत मतदाताओं के नाम सूचियों से कट गये हैं और कुल मतदाताओं की संख्या 50.97 करोड़ से घटकर 44.40 करोड़ की रह गई है । इनमें सबसे ज्यादा मतदाता देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से कटे हैं जहां यह संख्या 15.44 करोड़ से घटकर 12.55 करोड़ रह गई है। इससे यह साबित होता है कि चुनाव आयोग पूरी तरह निष्पक्ष होकर गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण का कार्य कर रहा है और ऐसे सभी मतदाताओं को सूचियों से हटा रहा है जिन्होंने अपना निवास स्थान बदल लिया है अथवा जिनकी मृत्यु हो चुकी है या जिनके नाम एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत हैं।

अभी तक विपक्षी दल यह आरोप लगा रहे थे कि चुनाव आयोग सत्तारूढ़ दल भाजपा के सहयोगी की तरह काम कर रहा है और समाज के कुछ विशेष वर्गों के मतदाताओं के नाम सूची से उड़ा रहा है। उत्तर प्रदेश में जिस प्रकार 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम काटे गये हैं उससे सत्तारूढ़ दल समेत विपक्षी पार्टियां भी हैरत में हैं कि आखिरकार किन लोगों के वोट कट रहे हैं क्योंकि इनमें सभी दलों के समर्थक शामिल हो सकते हैं। मगर असली सवाल यह है कि मतदाता सूचियों का पूरी तरह शुद्धिकरण हो और इनमें एक भी फर्जी मतदाता शामिल न रहे। चुनाव आयोग मतदाता सूची बनाने के लिए संविधानतः पूर्ण अधिकृत है और यह अपना कार्य सीधे संविधान से शक्ति लेकर करता है। उसके किसी भी काम में कोई भी सराकार आड़े नहीं आती क्योंकि वह एक स्वतन्त्र व गैर राजनीतिक निष्पक्ष संस्था है।

एक ओर जब चुनाव आयोग अपने गहन पुनरीक्षण का काम कर रहा है तो उसके इसी अधिकार को विपक्षी दलों की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है, जिसमें दलील दी गई है कि आयोग किसी मतदाता की नागरिकता की जांच नहीं कर सकता। यह प्रश्न बहुत गंभीर है मगर बहुत सामान्य ढंग से इसका उत्तर दिया जा सकता है क्योंकि जब संविधान यह कहता है कि केवल भारत में रहने वाला वही व्यक्ति मतदाता हो सकता है जो भारत का वैध नागरिक हो तो उसकी नागरिकता की भी जांच करने का अधिकार चुनाव आयोग के हाथ में आ जाता है। दरअसल विपक्षी दलों की दलील है कि गहन पुनरीक्षण का काम असंवैधानिक है। सर्वोच्च न्यायालय में इसी मुद्दे पर सुनवाई चल रही है जिस पर चुनाव आयोग की तरफ से कहा गया है कि उसे नागरिकता की जांच करने का पूरा अधिकार संविधान ही देता है।

भारत का 1955 का नागरिकता कानून उसे ऐसा करने का पूरा अधिकार देता है और 1946 का विदेशी नागरिकता कानून इसमें आड़े नहीं आता जिसमें विदेशी नागरिकों की जांच करने का अधिकार केन्द्र सरकार को दिया गया है। खैर यह उन कानूनविदों व अधिवक्ताओं का काम है जो सर्वोच्च न्यायालय में इस विषय पर पक्ष-विपक्ष में बहस कर रहे हैं मगर सामान्य नागरिक की सामान्य बुद्धि की हैसियत से यही कहा जा सकता है कि चुनाव आयोग का यह कर्त्तव्य बनता है कि वह केवल भारत के नागरिकों को ही मतदाता बनाये। इस सवाल के साथ भारत के लोकतन्त्र की पवित्रता का भी सीधा सवाल जुड़ा हुआ है क्योंकि यदि मतदाता सूची ही शुद्ध नहीं होगी तो लोकतन्त्र किस प्रकार शुद्ध रह सकता है जबकि चुनाव आयोग का गठन ही हमारे संविधान निर्माताओं ने देश में लोकतन्त्र की मूलभूत आधारशिला रखने के लिए किया था।

अतः मतदाता सूचियों से यदि अवांछित व अनधिकृत लोगों के नाम हटाये जा रहे हैं तो उनका आंख मून्दकर केवल राजनैतिक हितों की वजह से विरोध नहीं किया जा सकता और इसे चुनाव आयोग की अनाधिकार चेष्टा नहीं कहा जा सकता। देश के सभी राजनैतिक दलों को गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए कि जिस देश में चार करोड़ के लगभग फर्जी राशन कार्ड पाये गये हों वहां मतदाता सूचियों में फर्जी लोगों के नाम दर्ज क्यों नहीं हो सकते। अतः चुनाव आयोग जब लोगों से आवश्यक कागजाती सबूत मांगने के बाद ही मतदाता सूचियों को ठीक कर रहा हो तो उसका विरोध किस आधार पर हो सकता है? जिन 12 राज्यों उत्तर प्रदेश , प.बंगाल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, केरल, छत्तीसगढ़, गोवा, पुडुचेरी, अंडमान निकोबार व लक्षद्वीप में गहन पुनरीक्षण का कार्य हुआ उन सभी में मतदाता सूचियों में भारी गड़बडि़यां पाई गईं और प्रत्येक में पाया गया कि पहले से पंजीकृत मतदाताओं की अच्छी खासी संख्या एक स्थान से दूसरे स्थान को पलायन कर चुकी है।

इनमें ऐसे मतदाता भी थे जिनकी मृत्यु हो चुकी है मगर उनके नाम मतदाता सूचियों में विद्यमान थे। अकेले उत्तर प्रदेश में ही 14 प्रतिशत मतदाता ऐसे पाये गये जो अपने दिये गये पते पर नहीं रहते और उन्होंने अपना स्थायी निवास बदल लिया है। लगभग तीन प्रतिशत मतदाताओं की मृत्यु हो चुकी है और 1.65 प्रतिशत मतदाताओं के नाम एक से अधिक स्थानों पर मतदाता सूचियों में पाये गये। अतः ऐसे मतदाताओं के नाम बदस्तूर जारी रख कर हम किस प्रकार के लोकतन्त्र की तरफ अग्रसरित होंगे। चुनाव आयोग ने इन केवल तीन आधारों पर ही मतदाताओं के नाम पूरी निष्पक्षता के साथ यदि काटे हैं तो उस पर भारी शोर-शराबा करके चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को कटघरे में खड़ा करने का क्या उद्देश्य हो सकता है और इसे वोट चोरी की संज्ञा देने का तात्पर्य क्या हो सकता है? गौर करने वाली बात यह है कि लक्षदीप जैसे छोटे से केन्द्र प्रशासित क्षेत्र में जहां कुल मतदाता संख्या 57 हजार 813 है वहीं अगर डेढ़ हजार से ऊपर मतदाता फर्जी मिलते हैं तो करोड़ों की जनसंख्या वाले बड़े राज्यों में इनकी मिकदार क्या हो सकती है?

अतः उत्तर प्रदेश व तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों में यदि क्रमशः 18.69 प्रतिशत व 15.18 प्रतिशत मतदाता कम होते हैं तो आश्चर्य की क्या बात है। अगले वर्ष जिन राज्यों केरल, तमिलनाडु, प. बंगाल मेंं चुनाव होने हैं और इनमें मतदाताओं की घटी संख्या को किसी एक विशेष दल के पक्ष में नहीं कहा जा सकता है।

Aditya Chopra

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