हिन्दू-मुस्लिम सद्भाव के लिए संवाद जरूरी

Summary :

साझा विरासत और गंगा जमुनी परंपरा का देश है भारत, जहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, बौद्ध आदि सभी धर्मों के अनुयायियों की शताब्दियों से धर्म स्थली और कर्म स्थली है भारत, जहां हिंदू-मुस्लिम ऐसे ही घुल-मिल कर रहते चले आए हैं, जैसे दूध में शक्कर और इस प्रकार से एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते, जैसे नाख़ून से गोश्त। सदियों से एक ही समाज में हिंदू अपने आराध्यों की उपासना और मुस्लिम अपनी इबादतें करते चले आए हैं। शुरू में हिंदू-मुस्लिम समस्या थी ही नहीं। यह तो अंग्रेजों ने अपना उल्लू साधने और गांठने के लिए इन संप्रदायों…

साझा विरासत और गंगा जमुनी परंपरा का देश है भारत, जहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, बौद्ध आदि सभी धर्मों के अनुयायियों की शताब्दियों से धर्म स्थली और कर्म स्थली है भारत, जहां हिंदू-मुस्लिम ऐसे ही घुल-मिल कर रहते चले आए हैं, जैसे दूध में शक्कर और इस प्रकार से एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते, जैसे नाख़ून से गोश्त। सदियों से एक ही समाज में हिंदू अपने आराध्यों की उपासना और मुस्लिम अपनी इबादतें करते चले आए हैं।
शुरू में हिंदू-मुस्लिम समस्या थी ही नहीं। यह तो अंग्रेजों ने अपना उल्लू साधने और गांठने के लिए इन संप्रदायों के बीच अविश्वास और दुश्मनी का बीज डाला, वरना सर सैयद अहमद खां, संस्थापक, एएमयू तो हिंदुओं और मुसलमानों को हिंदुस्तान नामी दुल्हन की दो खूबसूरत आंखें कहा करते थे। यह आज भी ऐसे ही हैं, मगर वोट बैंक की सियासत ने इस आपसी स्नेह और भाईचारे को खंडेर कर दिया, स्वाहा कर दिया।
हमें यह भी समझना होगा कि किन लोगों के कारण ऐसा हुआ है। वास्तव में ये वे लोग हैं, जिन पर जनता इस बात का विश्वास करके सत्ता के गलियारों में स्थान देती है कि सिस्टम चलाने में वे उनकी सेवा करेंगे। जब ये लोग जीत कर किसी भी गद्दी पर विराजमान होते हैं तो केवल चंद लोग जिनकी संख्या ऐसे ही होती है, जैसे आटे में नमक या ऊंट के मुंह में राई, सभी जनता की सेवा करने के अपनी निजी सेवा में व्यस्त हो जाते हैं, जिसके कारण भारत विश्व गुरु नहीं बन पा रहा है। ऐसे लोग पक्ष-विपक्ष, सभी दलों में होते हैं। भारत का इतिहास गौरव और पीड़ा—दोनों का साक्षी है। लेकिन इतिहास का उपयोग वर्तमान को ज़हरीला बनाने के लिए नहीं होना चाहिए। बीते युगों की गलतियों का बोझ आज की पीढ़ियों पर लादना न तो न्यायसंगत है, न ही व्यावहारिक। सद्भाव का तक़ाज़ा है कि हम इतिहास से सीख लें, पर उसमें कैद न रहें। भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि अनेक आस्थाओं, परम्पराओं और विश्वासों का साझा घर है। यहां मंदिर की घंटियों, मस्जिद की अज़ान, गुरुद्वारे के कीर्तन और, बौद्ध मठों की पूजा, चर्च की प्रार्थनाएं—सदियों से एक-दूसरे के साथ गूंजती रही हैं। यही सह-अस्तित्व भारत की आत्मा है। परन्तु विडम्बना यह है कि आज इसी विविधता को विभाजन का कारण बनाया जा रहा है। ऐसे समय में अन्तर्धर्म सद्भाव और संवाद केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि सामाजिक अस्तित्व की अनिवार्यता बन चुका है। संवाद का अर्थ केवल अपनी बात मनवाना नहीं, बल्कि दूसरे की भी धैर्य से सुनना है। सद्भाव का अर्थ: सहमति नहीं, सम्मान है। अन्तर्धर्म सद्भाव का अर्थ यह नहीं कि सभी एक-दूसरे के धार्मिक विश्वासों से सहमत हों। इसका मूल भाव है, असहमति के बावजूद सम्मान। प्रत्येक धर्म अपने अनुयायियों को नैतिकता, करुणा और सत्य का पाठ पढ़ाता है। जब धर्म नफ़रत का माध्यम बनता है, तब वह अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है। यह घोर अन्याय होगा, यदि संघ व हिंदुओं और मुसलमानों के मध्य सद्भावना की बयार चलने वाली “इंटर फेथ हार्मनी फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया का ज़िक्र न हो, जो 2005 से यह काम कर रही है, और जिसके अध्यक्ष ख्वाजा इफ्तिखार अहमद को शाबाशी न दी जाए, जिसके परिणाम आज देखने को मिल रहे हैं। संगठन मानता है कि जहां संवाद समाप्त होता है, वहीं से टकराव शुरू होता है। दुर्भाग्य से, आज सोशल मीडिया और राजनीतिक बयानबाज़ी ने संवाद की जगह आरोप-प्रत्यारोप को बढ़ावा दिया है। अन्तर्धर्म संवाद का अर्थ है। सुनने की इच्छा, समझने का धैर्य और अपनी धारणाओं की ईमानदार समीक्षा। संवाद डर को कम करता है, भ्रांतियों को तोड़ता है और विश्वास की नींव रखता है। जनता को दोनों ओर से ऐसे स्वयंभू नेताओं और हमदर्दों से दूरी बनाकर रखनी चाहिए और परहेज़ करना चाहिए, जो अपनी क़ैम की वकालत इस प्रकार से कार्य हैं, कि उसका सुप्रभाव के बजाय कुप्रभाव पड़ता है, संवाद केवल भाषणों से नहीं आता। इसके लिए शिक्षा व्यवस्था में संवैधानिक मूल्य, आलोचनात्मक सोच और बहुलतावाद को मज़बूत करना होगा। नागरिक के रूप में हमारी पहचान धार्मिक पहचान से ऊपर हो, यही लोकतंत्र की बुनियाद है। आज संघ के सरसंघ चालक, डॉ. मोहन भागवत और उसके वरिष्ठ वरिष्ठ नेताओं के अतिरिक्त प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी वी उनकी टीम के महत्वपूर्ण सदस्य, जैसे अमित शाह और अजीत डोभाल साम्प्रदायिक सद्भाव बढ़ाने के लिए कृतसंकल्प हैं। प्रायः देखा गया है कि किसी भी आतंकवादी घटना के बाद मुस्लिम डरे, सहमे से हो जाते हैं कि कहीं उनसे देशभक्त होने का प्रमाण पत्र नहीं मांग लिया जाए। हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक समस्या आज की नहीं, सैकड़ों साल पुरानी है और इन संवादों से एक दिन में नहीं जाएगी, मगर एक दिन अवश्य जाएगी, अगर दोनों ओर सच्चाई और ईमानदारी से विचार और उसके बाद के आचार से इसका निदान हो सकता है।आज समझौते से अधिक, समझ की बात करने की आवश्यकता है, ठीक ऐसे ही, जैसे, ध्रुवीकरण नहीं, संवाद को बढ़ावा देने की आवश्यकता होती है।
इसी प्रकार से धर्म नहीं, मानवता को केंद्र में रखते हुए संवाद किया जा रहा है। आज हमें महात्मा गांधी, केशव बलिराम हेडगेवार और मौलाना आज़ाद की एक साथ ज़रूरत है, ताकि डेढ़ सौ करोड़ के पूर्ण समाज को एकजुट रखा जा सके। अन्तर्धर्म संवाद और सद्भाव कोई तात्कालिक नारा नहीं, बल्कि निरन्तर अभ्यास है, संवाद का, संयम का और सह-अस्तित्व का। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने-अपने विश्वासों पर गर्व करते हुए भी दूसरे के विश्वास का सम्मान करना सीखें। क्योंकि जब धर्म मानवता से जुड़ता है, तब समाज मज़बूत होता है और जब मानवता छूट जाती है, तब धर्म भी खोखला हो जाता है।

Team Desk