2007 से यानि 18 साल से भारत और यूरोपीय संघ में चली आ रही मुक्त व्यापार समझौते के लिए वार्ता अंततः सम्पन्न हो गई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जहां एक ओर दुनिया भर के देशों को टैरिफ की नई धमकियां देते हुए डराने में लगे हुए हैं तो वहीं भारत लगातार इन धमकियों को धुआं-धुआं उड़ाते हुए आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत और यूरोपीय संघ के बीच एफटीए समझौते की घोषणा करते हुए कहा कि दुनिया के लोग इस समझौते की चर्चा मदर ऑफ आॅल डील्स के रूप में कर रहे हैं। यह समझौता भारत के 140 करोड़ लोगों और यूरोपीय देशों के करोड़ों लोगों के लिए बहुत बड़ा अवसर लेकर आया है। यूरोपीय संघ के एक प्रतिनिधिमंडल ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ बैठक की, जिसके बाद प्रधानमंत्री ने देशवासियों को इसकी जानकारी दी। यूरोपीय उद्योग की अध्यक्षा उर्सुला वॉन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष कोस्टा ने सोमवार को गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होकर भारत की सैन्य शक्ति, शौर्य और सांस्कृतिक विविधता को देखा। इन दोनों का गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होना भारत और यूरोपीय संघ के मजबूत हो रहे रिश्तों को प्रदर्शित करता है। यह डील केवल व्यापार के महत्व को ही नहीं दिखाती बल्कि यह प्रदर्शित करती है कि वैश्विक कूटनीति में भारत की स्थिति कितनी मजबूत है आैर भारत पावर प्ले में शामिल हो चुका है।
भारत ने अमेरिका का गुलाम बनना स्वीकार नहीं किया। ट्रंप नई दिल्ली को अपमानित कर व्यापार समझौता करना चाहते थे आैर वह भी अपनी शर्तों पर। प्रधानमंत्री मोदी को यह स्वीकार्य न था। उनकी राष्ट्रवादी नीतियां भी इसकी अनुमति नहीं देती थी। इसलिए भारत अमेरिका व्यापार वार्ता किसी तार्किक निष्कर्ष पर नहीं पहुंची। भारतीय हितों के साथ िकसी भी तरह का समझौता देशवासियों को भी स्वीकार्य नहीं होगा। जिस तरह से ट्रंप ने डेनमार्क के ग्रीनलैंड को लेकर धमकियां दीं उससे स्थिति पूरी तरह से बदल गई। यूरोप चारों तरफ से मुश्किलों में घिरा है। रूस की आक्रामकता, चीन का दबाव और अपनी कई कमजोरियां। ऊपर से अमेरिका की ओर से छोड़े जाने की चिंताएं अब वाशिंगटन के डराने-धमकाने के डर में बदल गई हैं। इसके उलट भारत स्थिरता का प्रतीक है। यह एक ऐसा बाजार प्रदान करता है जो लगातार बढ़ रहा है। भारत कोई बड़ा खतरा पैदा नहीं करता। हो सकता है कि नई दिल्ली जलवायु या यूक्रेन जैसे मुद्दों पर यूरोप की राजधानियों से पूरी तरह सहमत न हो। लेकिन, कम से कम वह उन्हें धमकाने, उनकी संपत्ति छीनने या अपमानित करने की कोशिश नहीं करता। ट्रंप के टैरिफ का मुकाबला करने के लिए भारत को एक के बाद एक व्यापार समझौते करना आदर्श तरीका लगा। यूरोप के साथ डील करना समय की मांग थी। ट्रंप को भी यह सोचने के लिए विवश होना पड़ेगा कि भारत के पास अब कई विकल्प मौजूद हैं। भारत जानता है कि इस डील से ट्रंप को मिर्ची लगेगी, अमेरिका ने चेतावनी दी है कि भारत के साथ एफटीए पर हस्ताक्षर करके यूरोप ने अपने ही खिलाफ रूसी जंग को फंडिंग दे रहा है। न तो भारत ने और न ही यूरोप ने अमेरिका की प्रतिक्रिया को गम्भीरता से लिया है। अगर मदर ऑफ ऑल डील्स की प्रकृति की बात करें तो इससे दोनों पक्षों को बड़ा फायदा होगा। वित्त वर्ष 2025 में भारत यूरोपीय संघ का व्यापार 136 अरब डालर से अधिक हो चुका है। िजसमें भारत का निर्यात 76 अरब डालर और आयात लगभग 60 अरब डालर रहा है। इस तरह यूरोपीय संघ व्यापार में भारत का सबसे बड़ा साझेदार बना हुआ है। इस डील से 90 प्रतिशत से ज्यादा सामानों पर टैरिफ कम किया जा सकता है या इसे हटाया जा सकता है। इससे खासतौर पर कपड़े, फार्मा, इंजीनियरिंग प्रोडक्टस और आईटी सर्विसेज समेत कई सैक्टर्स को बड़ा लाभ होगा। इस डील से भारत के लिए यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों वाले बाजार तक अधिक पहुंच बनेगी। ईयू में करीब 45 करोड़ उपभोक्ता हैं और डील से भारतीय कंपनियों को सीधे यूरोपीय बाजार में एंट्री आसान होगी। ईयू भारत का बड़ा ट्रेड पार्टनर है और एफटीए से 90 प्रतिशत से ज्यादा सामान पर टैक्स हटने से भारत का निर्यात बढ़ेगा। निवेश (एफडीआई) में उछाल आएगा, यूरोपीय कंपनियां भारत में तमाम सैक्टर्स में अपना निवेश बढ़ा सकती हैं। निर्यात-निवेश बढ़ने से रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, वहीं सप्लाई चेन में सुधार से चीन पर निर्भरता में भी कमी आएगी।
दोनों पक्ष एक रक्षा ढांचा समझौता और रणनीतिक एजेंडे पर भी आगे बढ़ेंगे। इससे यूरोपीय कम्पनियों के लिए भारत का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। भारतीय कम्पनियों को यूरोपीय संघ के सुरक्षित कार्यक्रम में भागीदारी का अवसर मिलेगा जो 150 अरब यूरो का रक्षा वित्तीय तंत्र है। यूरोप के लिए भी इलैक्ट्रोनिक्स उत्पाद, मशीनरी उपकरण, विमानों के पुर्जे, दवाइयां, वाइन आदि उत्पादों के लिए भारत का बाजार मिलेगा। रणनीतिक रूप से यूरोपीय संघ अपनी सप्लाई चेन को विविध करना चाहता है ताकि वह चीन पर अपनी अत्याधिक निर्भरता को कम कर सके। यूरोपीय संघ भारत के यात्री वाहन बाजार में बेहतर पहुंच चाहता है। जहां वर्तमान में आयात शुल्क 100 से 125 प्रतिशत लगाया जाता है। एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौता ईयू के साथ भारत की व्यापारिक स्थिति को काफी मजबूत कर सकता है। इस समझौते से वित्त वर्ष 2031 तक यूरोपीय संघ के साथ भारत का ट्रेड सरप्लस 50 अरब डॉलर से अधिक बढ़ सकता है। इससे भारत के कुल निर्यात में ईयू संघ की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2025 के 17.3 प्रतिशत की तुलना में बढ़कर लगभग 22-23 प्रतिशत हो सकती है, जिससे भारत की निर्यात वृद्धि को जबरदस्त बढ़ावा मिलेगा। ट्रंप ने अन्तर्राष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करते हुए जिस तरह से टैरिफगिरी दिखाई उसका जवाब तो उन्हें मिल गया है। इस वर्ष भारत की नजर अहम आर्थिक आैर वैश्विक घटनाओं पर टिकी रहेगी। भारत को वित्तीय बाजार के घटनाक्रम पर नजर रखनी होगी और साथ ही मुक्त व्यापार समझौतों को जमीनी स्तर पर कारगर बनाने के लिए बड़े कदम उठाने होंगे और घरेलू बाजार की प्रतिक्रिया का आकलन भी करना होगा। फिलहाल दो बड़ी अर्थव्यवस्थाअों का मिलन हो गया है।
भारत-यूरोप मिलन
Summary :
2007 से यानि 18 साल से भारत और यूरोपीय संघ में चली आ रही मुक्त व्यापार समझौते के लिए वार्ता अंततः सम्पन्न हो गई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जहां एक ओर दुनिया भर के देशों को टैरिफ की नई धमकियां देते हुए डराने में लगे हुए हैं तो वहीं भारत लगातार इन धमकियों को धुआं-धुआं उड़ाते हुए आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत और यूरोपीय संघ के बीच एफटीए समझौते की घोषणा करते हुए कहा कि दुनिया के लोग इस समझौते की चर्चा मदर ऑफ आॅल डील्स के रूप में कर रहे हैं। यह समझौता भारत के…


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