‘किसी भी देश के विकास और आर्थिक प्रगति का सबसे बड़ा पैमाना यह होता है कि उस देश के किसान की क्या स्थिति है और खेती करने वाले लोगों की उस देश में औसत संख्या कितनी है। भाईयों जिस देश में लोग खेती में ज्यादा लगे हों वह देश होगा गरीब और जिसमें कम लोग लगे होंगे वह देश होगा अमीर। अमेरिका में वहां की कुल आबादी के मुश्किल से सात प्रतिशत लोग खेती में लगे हुए हैं और वह आज दुनिया का सबसे अमीर मुल्क है और भारत में साठ प्रतिशत से ज्यादा लोग इसमें लगे हुए हैं तो यह दुनिया के गरीब मुल्कों में 131वें नम्बर पर खड़ा हुआ है। भारत की प्रगति तभी हो सकती है जब यहां के किसान और खेत मजदूरों की संख्या में लगातार कमी होती जाये। एेसा तभी होगा जब किसान की आमदनी में पक्का इजाफा इस तरह करने के इंतजाम किये जायें कि वह भी अपनी नई पीढ़ियों को उच्च शिक्षा देकर इंजीनियर, डाक्टर, प्रोफेसर और उद्यमी बना सके और इसके समानान्तर खेती करने के तरीकों और साधनों को आधुनिकतम बना कर खेतों की पैदावार को बढ़ाया जा सके और किसानों के बढ़ते परिवारों की वजह से जमीन के होने वाले बंटवारे से खेतों की कम होने वाली जोत को रोका जा सके।
यह काम तभी हो सकता है जब परिवार का एक बेटा ही खेती में लगे और बाकी सभी दूसरे धन्धों में जायें। यह तभी हो सकता है जब खेती से होने वाली आमदनी इतनी हो कि किसान अपने पूरे परिवार का पालन-पोषण किसी भी अन्य खाते-पीते परिवार की तरह कर सके और अपने बच्चों को उनकी योग्यता व क्षमता के अनुसार पढ़ा- लिखा सके। भाईयों तब जाकर यह देश विकसित बनने की तरफ चलना शुरू करेगा, जिसमें खेती में लगे लोगों की संख्या कम होगी और अन्य उद्योग-धन्धों में लगे लोगों की संख्या ज्यादा होगी मगर खेतों की पैदावार लगातार बढ़ती जायेगी जैसा कि अमेरिका में है’’ यह कथन स्व. चौधरी चरण सिंह के उस भाषण का अंश है जो उन्होंने 1984 के लोकसभा चुनावों के समय टूंडला (उ.प्र) की जनसभा में दिया था। हकीकत है कि चौधरी साहब से बड़ा किसान नेता अभी तक इस देश में कोई दूसरा नहीं हुआ है। उन्होंने आज से 34 वर्ष पूर्व ही अन्दाजा लगा लिया था कि यदि कृषि क्षेत्र की तरफ ध्यान नहीं दिया गया तो सर्वाधिक रोजगार का जरिया बने ग्रामीण व कृषि क्षेत्र की हालत बद से बदतर होती जायेगी जिसका निशाना अन्ततः किसान को ही बनना पड़ेगा। दुखद यह है कि आज एेसे हालात बन चुके हैं कि कर्जे से पीडि़त हजारों किसानों को आत्महत्या जैसा रास्ता अख्तियार करना पड़ा।
इसकी मुख्य वजह यही है कि खेती करना लगातार घाटे का सौदा बनता चला गया है। राजधानी दिल्ली में आज देश के हर क्षेत्र के किसानों ने एकत्र होकर मांग की है कि संसद का विशेष अधिवेशन बुलाकर कृषि क्षेत्र की समस्याआ का एकमुश्त हल इस तरह खोजा जाये जिससे उन्हें कम से कम मानव निर्मित त्रासदी का शिकार तो न होना पड़े। किसान प्राकृतिक आपदा का भी शिकार होते हैं। बाढ़ या सूखे से उनकी फसलें तबाह हो जाती हैं। इसका मुआवजा देने की घोषणाएं भारत के आजाद होने के बाद से ही होती रही हैं। सरकारी योजनाएं कसौटी पर खरी नहीं उतरी। हुआ यह कि इससे बीमा कम्पनियों के तो पौ बारह हो गये और किसानों का बुरा हाल हो गया। मजेदार कहानी यह है कि सरकारी खजाने से धन भी किसानों के नाम पर निकला मगर वह बीमा कम्पनियों के खातों में आराम से खो गया। क्या इससे बड़ा अपमान हम धरती के अन्नदाता और कुछ कर सकते हैं कि उसकी खराब हुई फसल का मुआवजा उसे दो रुपये से लेकर बीस रुपये तक के चेकों में दें। बीमा कम्पनियों ने महाराष्ट्र में एेसा ही किया।
इसके साथ ही उसकी उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करके सरकार यह सुनिश्चित करती है कि उसे उसी के अनुरूप भुगतान होगा। मगर बाजार में उसकी फसल पहुंचते ही मंडी में बैठे धन्ना सेठ ‘मांग व आपूर्ति’ का अर्थशास्त्र लगा कर उसे मनमाफिक दर पर भुगतान पाने के लिए मजबूर कर देते हैं और सरकार खरीद केन्द्र तब भंडारण क्षमता के अभाव का सहारा लेकर उसे व्यापारियों के ही रहमोकरम पर ही छोड़ देते हैं। मगर डिजीटाइजेशन ने किसानों की समस्या और बढ़ा दी है। पहले उनकी फसल का भुगतान हाथोंहाथ नकद रोकड़ा में पूरा हो जाता था मगर अब पूरी फसल बेचने पर उन्हें केवल दस हजार रु. पकड़ा कर कह दिया जाता है कि बाकी रकम उनके आधारकार्ड से जुड़े बैंक खाते में जायेगी और यह रकम बैंक के खाते में आते-जाते हफ्तों गुजर जाते हैं। इसका प्रमाण मध्यप्रदेश की अनाज मंडियां हैं। मगर दिल्ली में हो रहा किसानों का प्रदर्शन कुछ बड़े आधारभूत मुद्दों को लेकर है।
इनमें सबसे प्रमुख यह है कि किसानों की उपज का लाभप्रद मूल्य हमेशा के लिये तय करने के लिये एक कानून बनाया जाये जिससे उन्हें हर हालत में लागत पर 50 प्रतिशत अधिक मूल्य मिल सके और दूसरा यह कि एक बार सभी किसानों का बैंक कर्ज माफ किया जाये। ये दोनों ही मांगंे व्यावहारिक हैं। इसकी वजह यह है कि आर्थिक मन्दी के दौर में केन्द्र की सरकारें उद्योगों को लाखों-करोड़ रुपये की कर छूट देती रही हैं जिससे घरेलू उद्योग अपने पैरों पर खड़े रह सकें और उनमें लगे लोगों के रोजगार पर असर न पड़ सके। बैंकों में जिस तरह बट्टे खाते में लाखों करोड़ रुपये डाल कर आगे वित्तीय कारोबार जारी रखा जाता है उसी प्रकार किसानों का एक बारगी कर्ज माफ करके सरकार पूरे कृषि क्षेत्र को अपने पैरों पर मजबूती से खड़ा रहने में सहायता प्रदान कर सकती है। यदि इस प्रकार के दो निजी विधेयक ससंद के दोनों सदनों में विचाराधीन हैं तो उन पर पूरी संसद को विचार करने की जरूरत है।
आखिरकार यह देश की साठ प्रतिशत जनता से जुड़ा हुआ गंभीर मसला है। इस मुद्दे पर राजनीति की भी ज्यादा गुंजाइश नहीं है क्योंकि किसान का बेटा ही फौज में जाकर जवान बनता है और सीमा पर देश की सुरक्षा के लिए लड़ता है। उसकी राष्ट्रभक्ति को कोई भी पार्टी चुनौती नहीं दे सकती है। एक बात जो सबसे महत्वपूर्ण है कि किसान न हिन्दू होता है न मुसलमान होता है और न सिख होता है, वह केवल धरती पुत्र अन्नदाता होता है। अतः उसकी जय बोले बिना भगवान भी खुश नहीं हो सकते।
अतः भारत की लोकथाओं से लेकर लोकोक्तियों और लोकरंजक ज्ञानवर्धक लोकचर्चा में यह तथ्य हमेशा चमकता रहता है कि राम को अगर भीतर के चक्षु से ढूंढ़ो तो,
वह खेत में मिलेगा, खलिहान में मिलेगा।
भगवान तो ए बन्दे इन्सान में मिलेगा।।


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