भारत में चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर जिस प्रकार का सन्देहास्पद वातावरण पिछले कुछ समय से तैयार किया गया है, वह किसी भी रूप में लोकतन्त्र के हित में नहीं है, क्योंकि भारत का लोकतन्त्र लोक सहभागिता का लोकतन्त्र है जिसमें सामान्य मतदाता की सत्ता में सीधी भागीदारी होती है। भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1928 में देश के प्रत्येक वयस्क मतदाता को वोट का अधिकार देने की बात कही थी तो पूरी दुनिया के लोगों ने आश्चर्य व्यक्त किया था और कहा था कि अनपढ़ और गरीबी के भार से झुका भारत किस प्रकार ऐसी व्यवस्था को लागू करके प्रजातन्त्र के रास्ते पर आगे बढ़ सकता है, मगर आजादी के बाद के 78 वर्षों ने सिद्ध कर दिया है कि व्यस्क मताधिकार के बूते पर बनी लोगों की सरकारों के माध्यम से भारत अपना चहुंमुखी विकास कर सकता है और इसके अनपढ़ समझे जाने वाले लोग राजनीतिक तन्त्र के गूढ़ पेचों को खोलने की क्षमता रखते हैं, किन्तु इस मताधिकार मूलक लोकतन्त्र को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी हमारे संविधान निर्माताओं ने स्वतन्त्र चुनाव आयोग का गठन करके दी और सुनिश्चित किया कि भारत के प्रत्येक मतदाता के वोट की कीमत एक समान हो और झोपड़ी से लेकर महलों तक रहने वाले लोगों के अधिकार एक समान हों।
इन एक समान अधिकारों का स्रोत वोट का समान अधिकार माना गया और इसे राजनीतिक स्वतन्त्रता का नाम दिया गया। अतः चुनाव आयोग की जिम्मेदारी लोकतन्त्र में बहुत बड़ी जिम्मेदारी मानी गई और इसके माध्यम से तय किया गया कि भारत के लोगों की राजनीतिक इच्छा शक्ति का सम्मान देश का प्रत्येक संवैधानिक संस्थान करें। हमारे संविधान निर्माताओं ने चुनाव आयोग को सरकार का अंग नहीं बनाया और इसे संविधान से शक्ति लेकर अपना कार्य स्वतन्त्र रूप से करने की छूट दी और साथ ही इसे राजनीतिक दलों के मामले में कुछ न्यायिक अधिकार भी दिये। भारत की प्रशासनिक व्यवस्था चुनावों के माध्यम से राजनीतिक दलों के हाथों में ही रहती है जिनका अपना अलग–अलग सिद्धान्त होता है, मगर किसी भी राजनीतिक दल को भारत के संविधान के दायरे में ही अपने सिद्धान्त तय करने होते हैं। इन दलों का एकमात्र लक्ष्य भारत और इसके लोगों का विकास होता है जिसका फलक बहुत व्यापक होता है।
विकास घरेलू स्तर से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर के क्षेत्र तक में होता है अतः भारत में राष्ट्रीय व क्षेत्रीय दलों का वर्गीकरण भी किया जाता है जो चुनाव आयोग ही करता है। चुनाव आयोग का कार्य केवल स्वतन्त्र व निष्पक्ष चुनाव करा कर गहरी नींद लेना नहीं होता है, बल्कि उसे यह भी देखना होता है कि कोई भी राजनीतिक दल संविधान से बाहर से न जा सके और इसी के नियमों व कायदों के भीतर रहते हुए भारत के लोगों के क्षेत्रीय विकास से लेकर राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय विकास की बातें राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखकर करे, लेकिन भारत में यदि चुनाव आयोग की ही विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किये जाने लगेंगे तो लोकतन्त्र किस प्रकार पावन रह सकता है। इस सिलसिले में देश के 12 राज्यों में मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण का कार्य जो चुनाव आयोग कर रहा है। उसपर देश के विपक्षी दल सड़क से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक सवालिया निशान लगा रहे हैं।
सवाल खड़ा किया जा रहा है कि किसी भी भारतीय की नागरिकता जांचने का काम चुनाव आयोग का नहीं है, जबकि संविधान में साफ लिखा हुआ है कि केवल भारत का नागरिक ही मतदाता बन सकता है। इस तर्क से देखा जाये तो चुनाव आयोग को यदि यह पता चले कि अमुक मतदाता भारत का नागरिक ही नहीं है तो उसे मताधिकार से वंचित करने का उसका पूरा अधिकार है। इसके साथ ही मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण का अधिकार भी उसे संविधान ही देता है, क्योंकि भारत का लोकतन्त्र केवल शुद्ध मतदाता सूची के आधार पर ही शुद्ध रह सकता है। यदि ऐसा न होता तो भारत में मतदाता सूचियों को बनाने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग को क्यों दी जाती। चुनाव आयोग को देखना होता है कि भारत का कोई भी मतदाता केवल एक स्थान से एक बार ही वोट डाल सके।
यदि इसमें दोहर होती है तो पूरी चुनाव प्रक्रिया पर ही दूषित होने का खतरा पैदा हो जाता है। बेशक समय–समय पर 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने पर नये मतदाताओं को जोड़ना भी चुनाव आयोग का परम कर्तव्य है, परन्तु ऐसे मतदाताओं के नाम सूची से काटने का भी उसे अधिकार है जिनकी या तो मृत्यु हो चुकी है अथवा जो एक शहर या गांव से किसी दूसरे शहर, गांव या राज्य को पलायन कर गये हैं। भारत में जिस गति से शहरी करण बढ़ रहा है और एक राज्य के विकास में दूसरे राज्य के लोग अपना योगदान दे रहे हैं उससे भारी संख्या में मतदाताओं की भी अदला- बदली हो रही है। इसका एक उदाहरण ही काफी है कि पंजाब व दिल्ली जैसे राज्यों में अन्य उत्तर भारतीय राज्यों के लोगों की जनसंख्या में हर वर्ष वृद्धि दर्ज हो जाती है। इसका मूल कारण यह है कि ये राज्य पूंजी निवेश व रोजगार का केन्द्र बने हुए हैं अतः ऐसे स्थानों पर अन्य स्थानों से पलायन करके आने वाले लोगों की संख्या में भी बढ़ाैत्तरी होना स्वाभाविक है।
हम अक्सर सुनते रहते हैं कि बिहार से अन्य राज्यों में रोजी–रोटी की तलाश में जाने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यहां तक कि दक्षिण के राज्यों तक में भी बिहारी मजदूर व कामगार अच्छी-खासी संख्या में जाने लगे हैं। इससे मतदाताओं की प्रत्येक राज्य की सूचियों पर भी प्रभाव पड़ना लाजिमी है। अतः बिहार में विगत वर्ष के अक्तूबर महीने में हुई मतदाता सूची पुनरीक्षण में यदि 65 लाख मतदाता कम हुए तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। इसी प्रकार देश के 12 राज्यों में (तीन केन्द्र प्रशासित क्षेत्रों को मिलाकर) जारी पुनरीक्षण प्रक्रिया में पांच करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम कटते हैं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि इन सभी प्रदेशाें की जनसंख्या 50 करोड़ के आसपास है। इसमें अकेले उत्तर प्रदेश से ही दो करोड़ 69 लाख मतदाताओं के नाम कम हुए हैं। यह देश का सबसे बड़ा आबादी वाला राज्य है जिसकी जनसंख्या 20 करोड़ से भी ऊपर है।
इतनी बड़ी आबादी वाले राज्य में जब मतदाता सूची का सख्ती से शुद्धिकरण होगा तो कई प्रकार की अनियमितताएं पाई जाने की स्वाभाविक हैं, मगर चुनाव आयोग की इस कार्रवाई को दोषपूर्ण मान लेना पूरी तरह इकतरफा कहा जायेगा क्योंकि यह अपना काम राजनीतिक पूर्वाग्रहों को त्याग कर ही करता है। इस सन्दर्भ में यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि पिछले मुख्य चुनाव आयुक्त श्री राजीव कुमार ने मतदाता सूची को सीधे आधार कार्ड से जोड़ने का प्रस्ताव रखा था, मगर देश के विपक्षी दलों ने इसका भी विरोध किया था। इसकी मूल वजह यह मानी गई थी कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं होता है। इसके साथ ही देश में फर्जी आधार कार्डों की संख्या भी बताई जाती है। अतः चुनाव आयोग के पास एकमात्र रास्ता यही बचता था कि वह पारंपरिक तरीके से घर-घर बीएलओ भेजकर मतदाताओं की पुख्ता पहचान कराये और मतदाता सूचियों को पूरी तरह दुरुस्त करें।
इस प्रक्रिया में बेशक व्यावहारिक खामियां हो सकती हैं, मगर नीयत पर सवाल खड़ा नहीं किया जा सकता है। आज ही मुम्बई महानगर निगम व महाराष्ट्र के अन्य 29 नगर निगमों के चुनाव सम्पन्न होने के बाद नतीजे आये हैं जिनमें राज्य में भाजपा नीत महायुति गठबन्धन को अच्छी विजय मिली है, मगर मुम्बई के चुनावों में विपक्षी दलों द्वारा चुनाव आयोग पर आरोप लगाया गया कि वोट देने के बाद मतदाता की अंगुली पर जो स्याही लगाई जाती है वह आसानी से मिट जाती है मगर इसे पूरी तरह बेबुनियाद पाया गया। ऐसे आरोप लगाकर हम केवल भारत के लोकतन्त्र को ही कमजोर करते हैं।
इसके साथ यह भी बेहिचक कहा जा सकता है कि भारत में चुनाव सुधारों की सख्त जरूरत है, क्योंकि चुनावों में जिस प्रकार धन का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है और चुनावों से पहले मतदाताओं को मुफ्त रेवड़ियां बांटने की जो नई परंपरा शुरू हुई है। उससे भारत का लोकतन्त्र ही अशुद्ध हो रहा है। चुनाव आयोग की इस मामले में सीमित भूमिका ही है असली कार्य देश के राजनीतिक दलों को ही करना है, क्योंकि चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष दोनों ही चुनाव के मौके पर मतदाता को मुफ्त सौगात देने का वादा करने लगे हैं।






















